भारतकोश
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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

प्रथम तरंग ३४१ जुगोप गोपादित्योऽथ क्ष्मा साद्वीपां तदात्मजः । वर्णाश्रमप्रत्यवेक्षादर्शितादियुगोदयः ॥३३६॥ गोपादित्य— उनके आत्मज गोपादित्य ने सद्वीप पृथ्वी की रक्षा की, जिसने वर्णाश्रम परिपालन द्वारा आदि युग का उदय दिखा दिया था ।

अचवल का विकास आधुनिक ढंग पर हुआ है । नगर का यथेष्ट विकास हो गया है । नगर में मस्जिदें काफी हैं । बाग के सम्मुख वाम भाग में एक शिव मन्दिर है । आधुनिक मन्दिर है । मैं मन्दिर में पूजा करने गया था । एक महिला 'जय जगदीश हरे' मधुर लय मे गा रही थी । एक प्रौढ ब्राह्मण सांगोपाग पूजन कर रहे थे । मन्दिर तथा पूजा देखकर काशी की याद आती थी । पूजा में कोई भेद नहीं था । मन्दिर के बाहर भी एक लिंग था उसकी भी पूजा की जाती है । मैं प्रातः काल घूमने निकला । सडक पर पहुँचा । चौराहे पर मुझे एक मृत्तिका पात्र कसोरा में आटा, दाल, लाल मिर्चा रखा मिला । मैं खड़ा हो गया । उत्तर भारत मे इसे 'उतारा पुतारा' कहते हैं । यह प्रथा किसी न किसी रूप में समस्त भारत में प्रचलित मिलेगी । भारत में प्रायः चौराहों पर प्रेत बाधा, महामारी तथा कष्ट निवारणार्थ श्वेत कूष्माण्ड काटकर फूल अक्षत के साथ रखा जाता है । धार अर्थात् जल में कुछ पदार्थ मिलाकर स्त्रिया रात्रि किंवा ब्राह्म मुहूर्त में चौराहा पर जल गिरा कर हाथ जोडती है । इस प्रकार का संस्कार प्रायः समस्त भारत मे मिलेगा । यह एक ही जन जीवन एवं संस्कृति का परिचायक है । यहाँ से कुछ दूर पर उमा देवी का मन्दिर है । अचवल से लगभग १ मील दूर एक स्वामी जी का आश्रम है । स्वामी जी बंगाली हैं । आश्रम का नाम रामकृष्ण सम्मेलन आश्रम है । स्वामी जी ने अपने हाथों सब कुछ बनाया है । उनकी कुटी के ऊपर एक सुन्दर मन्दिर बना है । उसमे श्री रामकृष्ण परमहंस देव की तस्वीर गर्भगृह में पूजा निमित्त रखी है । अचवल में हिन्दू धर्म की एक छाया तथा आश्रम यही देखने को मिला । प्रसन्नता हुई । यहाँ कभी वेद की ऋचाओं का उद्घोष होता था । यज्ञ की वेदियों से पवित्र धूम्र ज्योति उद्भूत होती गगन को ओर बढती, मानव मे आध्यात्मिकता का संचार करती थी । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३९ में "प्रत्यवेक्षा" का पाठभेद 'प्रत्यवीक्षा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३९ (१) : आइने अकबरी में नाम 'कुवोत' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष ६ दिन दिया है । राजा ने बुद्धिमानीपूर्वक न्याय पूर्ण राज्य किया था । उसने विजय भी बहुत की थी । उसके राज्य में जीव-हत्या वर्जित थी । राजादेश के अनुसार मास भक्षण निषेध था । सुलेमान ( शंकराचार्य ) पर्वत पर जो मन्दिर खड़ा है, वह इसी राजा के वजीर का निर्माण कराया है । श्री स्टीन राजा गोपादित्य का राज्याभिषेक लौकिक संवत् २७०७ वर्ष छठवा मास तेरहवें दिन देते हैं । श्री एस० पं० पण्डित वह समय ईसा पूर्व ३७१ वर्ष मानते हैं । हसन : 'राजा गोपादित्य बाप की वफात के बाद क० २६७४ में मुल्क हाकिम होकर कश्मीर की तमाम सरहदें अपने कब्जा एकदार में ले आया । रैयत परवरी और इन्साफ से काम लेने में लासानी था । मौजा खुली नार व उद में बाग बेरह में हाथ गाम करधन में इस्कूरूह पुर बागल और दागिस में

३४२ राजतरंगिणी सखोलखागिकाहाडिग्रामस्कन्दपुराभिधान् । शमाङ्गासमुखांश्चाग्रहारान् यः प्रत्यपादयत् ॥ ३४० ॥ जिसने खोल¹ सहित, खागिका², हाडा ग्राम³, स्कन्दपुर⁴, शमांगगादि⁵ मुख्य अग्रहारों को दिया था । इसकी यादगारों में से है। बेशुमार ग्राम बरहमनों और फकीरों को बख्श दिये और कई मन्दिर भी आबाद किये । जेष्ठेश्वर का मन्दिर जो 'काह गुले- मान' पर वाका है उसकी अजसरेनव तामीर व मरम्मत कराई । मौजा गोपकार और बछपारा बतौर लंगर इस 'बूतखाना' के लिये वक्फ कर दिये । अपनी कलमरो किसी को भी जानकर मारने की इजाजत नही देता था । साठ बरस ६ माह हुक्मरानो करके मर गया । पाठभेद : श्लोक संख्या ३४० में 'खोल' का 'खिला', 'हाडिग्राम' का 'हाडियामे' और 'शमाङ्गान' का 'शमाङ्गादि,' 'शमाजासा' तथा 'शमाजास' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४० (१) खोल : वर्तमान ग्राम खूली है। डलर परगना में है। खोल का अर्थ विकलाग तथा शिरस्त्राण होता है। खोलक का अर्थ ग्राम अथवा पुरवा होता है। (२) खागिका : वर्तमान खागी अर्थात् खाग ग्राम है। उल्लेख पृ० १२५ पर किया गया है। खागि, खागिक, खाग एक ही नामवाचक शब्द है। नीलमत में एक खाग नाग का उल्लेख आया है। स्वर्गः शिशिरवासी च आवासः श्रीधरः खगः । लाङ्गली बलभद्रश्च स्वरूपः पञ्चहस्तकः ॥ ९०५ : १०७१, १०७२ (३) हाडी ग्राम : वर्तमान आडग्राम है। आजकल इसे आरगोम गाव कहते है। नागाम परगना में है। इसका उल्लेख ( रा०त० ८.६७२, १५८६ तथा २१९६ ) कह्ण ने किया है। पं० काशीराम को सन् १८९१ में यहाँ कुछ मन्दिरों के भग्नावशेष मिले थे । इस समय यहाँ दो चार पत्थरों के और कुछ विशेष सामग्री मुझे नहीं मिल सकी । यह शब्द लौकिक तथा स्थानीय प्रचलित नाम मालूम होता है । (४) स्कन्दपुर : वर्तमान गांव खोंम्फर है। यह एक बड़ा गांव कुयर परगना में है। तेलवान तथा नौगाम के बीच मे पड़ता है। नीलमत पुराण में स्कन्दायतन, स्कन्देश्वर तथा स्कन्द तीर्थ का उल्लेख आया है। श्री स्टीन ने यहाँ की यात्रा सन् १८९१ ई० मे की थी। इसके विषय में उन्होंने कुछ लिखा नहीं है। मुझे इस स्थान पर कुछ विशेष सामग्री उल्लेखनीय नहीं मिली। इस समय अच्छा ग्राम है। कश्यप नील समागम तीर्थ वर्णन के प्रसंग में स्कन्द के निवास स्थान का उल्लेख मिलता है। सुवर्णबिन्दुस्तत्रैव हरस्यायतन शुभम् । स्कन्दस्यायतनं तत्र सर्वपापप्रिसूदनम् ॥ 112 : १५५ ॥ नीलमत में वितस्ता माहात्म्य के सम्बन्ध में स्कन्द तीर्थ का उल्लेख किया गया है। स्नात्वा तु मद्रतीर्थे च स्कन्दतीर्थे च मानवः । तथा सुरेश्वरीतीर्थे स्वर्गलोके महीयते ॥ 1388 : १५३२ ॥ नीलमत में देवायतन कीर्तन के प्रसंग में स्कन्देश्वर का वर्णन मिलता है। उनका स्थान मालि वन में माना गया है।

प्रथम तरंग ३४३ ज्येष्ठेश्वरं प्रतिष्ठाप्य गोपाद्रावार्यदेशजाः । गोपाग्रहारान्कृतिना येन स्वीकारिता द्विजः ॥ ३४१ ॥ ३४१. गोपाद्रि पर ज्येष्ठेश्वर¹ की प्रतिष्ठा कर, कृती जिस राजा ने आर्यदेशीय द्विजों से गोप अग्रहारों³ को स्वीकृत कराया । भाल्ये वने गौतद्देशं विश्वामित्रेश्वरं तथा मौनासिकं वसिष्ठेशं भारद्देशं सुरेश्वरम् ॥ 966 : १।६७ स्कन्देश्वरं वशिष्ठेशं पौलस्त्यमपरं तथा । दृष्ट्वा कुमारमेकैकं फलं गोदानजं लभेत् ॥ 997 : १।६८ ॥ (५) शामांगांस : वर्तमान सांगम है। यहाँ पर षड्दस्त कार्त्तिकेय अर्थात् स्कन्द की मूर्ति पांचवीं शताब्दी की मिली है। एक और मूर्ति अर्धनारीश्वर के साथ अवन्तीपुर के ध्वंसावशेष से प्राप्त हुई है। कार्त्तिकेय की पूजा चैत्र में होती थी। यह पूजा कश्मीर के शिशुओं एवं कुमारो के कल्याण हेतु की जाती थी। ३४१ (१) ज्येष्ठेश्वर और गोपाद्रि : गोपा पर्वत शंकराचार्य पर्वत है। गोपा अर्थात् गुपकर ग्राम इस पर्वत तथा डल लेक के मध्य इस समय भी मौजूद है। मुसलमान लोग शंकराचार्य पर्वत को 'तख्त-ए- सुलेमान' कहते हैं। इसी प्रकार साइरेस (कुरु) महान, जिसने मोडिया जीता था तथा जिसकी मृत्यु सन् ५६६ ई० पू० हुई थी, उसकी राजधानी की अधित्यका को भी 'तख्त ए-सुलेमान' कहते हैं। साइरेश का संस्कृत नाम 'कुरु' कहा जाता है। इस महान् सम्राट् की समाधि को मुसलमान लोग 'हजरत सुलेमान' की माता की मसजिद कहते हैं। हजरत सुलेमान मुसलमान नहीं बल्कि यहूदी थे। मुस्लिम धर्म के उत्पन्न होने के हजारों वर्ष पूर्व हुए थे। यहाँ पर वन्ध्या स्त्रियाँ, पुत्र तथा सन्तान निमित्त मन्नतें मानती हैं। फर्गहान के एक बौद्ध स्मारक को भी 'तख्त-ए-सुलेमान' कहा जाता है। शंकराचार्य के वर्तमान मन्दिर का कई बार जीर्णोद्धार किया जा चुका है। अकबर, जहाँगीर और औरंगजेव के समय में यह भग्नावस्था में पड़ा था। इसका अरबी आलेख जिस समय कश्मीर के लोग प्रायः मुसलमान हो चुके थे, उस समय लिखा गया था। बरनियर ने अपने यात्रा वृत्तान्त में लिखा है। यहां एक छोटी मस्जिद थी। औरंगजेब के समय पुनः मन्दिरो के तोड़ने की हवा बह चली थी। उस समय रिवाज हो गया था। जहाँ हिन्दुओं का तीर्थ स्थान या बड़ा मन्दिर होता था, वहां मस्जिद तथा जियारतें बना दी जाती थी। गोपा पर्वत से डल लेक का मनोमुग्धकारी दृश्य दिखाई देता है। मुसलमान इतिहासकार मोइजुद्दीन कहता है 'तख्त-ए-सुलेमान' पर एक मन्दिर अथवा स्तूप बनाया गया था। उसमें प्रचं- लित किंवदन्ती के अनुसार प्रभु 'ईसामसीह' की अस्थियां रखी गयी थी। रफीउद्दीन कहता है 'सिकन्दर वुत शिकन ने इसको नष्ट करवा दिया था।' श्री नारायण कोल के समय मन्दिर मौजूद था। बरनियर ने इसका उल्लेख किया है। फोस्टर इसका उल्लेख नहीं करता। कहता है—'इस पर्वत के दूसरी तरफ एक दूसरा पहाड़ है। वहाँ एक छोटी मस्जिद है। उसमें बगीचा भी है। एक बहुत पुरानी इमारत है। वह एक मूर्ति का मन्दिर प्रतीत होता है।

३४४ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ] गोपाद्रि गिर, गोपकार, तख्त-ए-सुलेमान, शंकराचार्य पर्वत, ज्येष्ठेश्वर आदि सब एक ही पर्वत के नाम हैं। गुपकर गांव उत्तर-पूर्व पर्वत के मूल में और डल के तट पर है। (रा० त० ८:११०४, १०)। पर्वत श्रीनगर के पूर्व दिशा में है। राजतरंगिणी (१:१२४) से मालूम होता है। अत्यन्त प्राचीनकाल से ज्येष्ठेश्वर शिव की पूजा यहाँ होती रही है। इस समय जेवर में देवस्थान है। वहाँ पूजा होती है। वह इस पर्वत के समीप है। ज्येष्ठेश्वर का जो वर्णन राजा गोपादित्य के सन्दर्भ में किया गया है, वह निसन्देह इसी पवित्र स्थान से सम्बन्ध रखता है। यह वही स्थान है, जहाँ इस समय शंकराचार्य पर्वत पर, शंकर का मन्दिर स्थित है। मन्दिर में इस समय विशाल शिव लिंग स्थापित है। मैं इस स्थान की कई बार यात्रा कर चुका हूँ। श्री फरगुसन ने ठीक ही कहा है 'वर्तमान मन्दिर बहुत बाद का निर्माण है।' (पृष्ठ २८२।) मन्दिर का ऊंचा अधिष्ठान तथा सीढियां, निसन्देह कल्हण द्वारा देखी हुई गोपादित्य के मन्दिर की निर्माण हैं। इस पर्वत पर इस मन्दिर के अतिरिक्त और कोई प्राचीन निर्माण अथवा किसी प्रकार का ध्वंसावशेष नहीं रह गया है। मेरी जानकारी में यहाँ अभी तक कोई प्राचीन वस्तु नहीं मिली है। एक बड़े निर्माण के लिए इस पर्वत पर यही एक उपयुक्त स्थान है। जहां बड़े पैमाने पर कुछ बनाया जा सकता था। ज्येष्ठ का अर्थ सबसे बड़ा होता है। यह पर- मेश्वर के लिये भी प्रयुक्त किया गया है। यह सामगान का एक प्रकार भी है। मलमास, अधिक- मास तथा ज्येष्ठमास तीन वर्ष के पश्चात् पड़ने वाले अधिक चन्द्रमास के लिये प्रयोग किया जाता है। ज्येष्ठा नक्षत्रयुक्त पूर्णमासी अर्थात् ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के लिये भी ज्येष्ठ शब्द का प्रयोग किया


[दायाँ स्तम्भ] गोपाचल ग्वालियर के समीप भी एक पर्वत है। ग्वालियर का एक नाम गोपा है। गोप का प्राचीन अर्थ रक्षक किंवा रक्षा करने वाला होता है। शंकराचार्य मन्दिर का सबसे पुराना फोटो कर्नल कोल की पुस्तक में (पृष्ठ १-८८) छपा है। उस समय (सन् १८८६ ई०) मन्दिर पर पेड़ तथा घास जम गये थे। मन्दिर की मरम्मत नहीं हुई थी। मन्दिर का बाह्य आकार जैसा उस समय था वैसा ही इस समय भी है। मन्दिर श्रीनगर के भूमितल से १००० फुट ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। कोल का कहना है कि परम्प- रागत गाथा के अनुसार यह मन्दिर राजा जालुक ने ईसापूर्व २२०' में निर्माण कराया होगा। मार्शल का मत है कि कश्मीर के अन्य हिन्दू मन्दिरों का जो काल है, वही इस मन्दिर का है। मन्दिरों पर लोग अपना नाम तथा निर्माण काल खुदवा दिया करते हैं। श्री फरगुसन को प्रारम्भ में भ्रम हो गया था। उसने मन्दिर पर हिजरी १०६९ लिखा देखा था। अतएव उन्होंने धारणा बना ली—मन्दिर जहांगीर के काल में बनाया गया था। यह भ्रम है। इसी प्रकार मन्दिर के अन्दर दक्षिण पश्चिम स्तम्भ पर लिखा है। एक साहूकार 'हाजो हुश्ती' ने संवत् ५४ में शिव का निर्माण किया'। उस समय इस्लाम धर्म का उदय नहीं हुआ था। उसी स्तम्भ के नीचे एक जगह लिखा है 'ख्वाजा रुकन वल्द पीर जान ने मन्दिर बनवाया।' इसमें संवत् अथवा हिजरी सन् नहीं दिया गया है। कल्हण के अनुसार गोपादित्य ने मन्दिर का निर्माण ईसा पूर्व ३६८-३०८ वर्ष में किया था। किसी विशेष प्रमाण के अभाव में मूलमन्दिर का निर्माण काल यह मान लिया जा सकता है। राजा अभिनव गुप्त (सन् ६९३-१०१५ ई०) के समय की किंवदंती प्रचलित है। शंकराचार्य के एक शिष्य का यहां आगमन हुआ था। वह वेदान्ती थे। शक्ति में उसका विश्वास नहीं था। एक दिन

प्रथम तरंग ३४५ उसको बहुत भूख लगी। मार्ग में एक स्त्री को दूध लिये जाते देखा। दूध मांगा। स्त्री ने कहा। पर्वत से नीचे उतरिए। दूध दूँगी। उत्तर मिला। शक्ति नहीं है जो पर्वत से उतर सकूं। स्त्री ने उत्तर दिया। शक्ति कैसे होगी। तुम शक्ति में विश्वास नहीं करते। वेदान्ती को बात लग गयी। शक्ति में विश्वास करने लगे। 'सौन्दर्य लहरी' जैसे प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना शक्ति की प्रशंसा एवं स्तुति में की। मन्दिर पतला है। इसका अधिष्ठान २० फुट ऊँचा है। यह १३ परत शिलाखण्डों का बना है। बारो कोणों पर तीन कोणाकार अधिष्ठान बना है। बौद्ध शैली के आधार पर बौद्ध लोग इसे अपना पवित्र मन्दिर मानते हैं। यही मन्दिर का बाह्य रूप है। कोणाकार रूप के कारण जो बौद्ध स्तूपों में पाया जाता है, कुछ लोगों का मत है यह बौद्ध मन्दिर था। मन्दिर का बाहरी चौतरा ३३ फुट चौड़ा है। उसपर मुंडेरा तुल्य बनावट मन्दिर के अष्टभुजीय रूप को प्रकट करता है। मन्दिर के चबूतरे पर पहुँचने के लिए तीन वर्गों में पत्थर सीढ़ियों की बनी हैं। पहला ६, दूसरा ७ तथा तीसरा १८ सीढ़ियों का बना है। अट्ठारह सीढ़ियों वाली चढ़ान दोनों ओर से दिवालों द्वारा बन्द हैं। इसके पश्चात् १० सीढ़ियो से चढ़ने पर मन्दिर के द्वार तक पहुँचा जा सकता है। मन्दिर का गर्भगृह गोलाकार है। अर्चा में एक बड़ा लिंग है। मन्दिर का शिखर २५ फुट ऊंचा है। यह चबूतरे में ५ फीट ऊंचाई पर है। चबूतरे का परिवेश १०० फुट होगा। मन्दिर का व्यास १४ फिट है। छत ११ फुट ऊंचाई से आरम्भ होती है। छत के आधार तुल्य चारों कोनों पर चार अठपहले स्तम्भ है। दिवाल ७१/२ फुट मोटी है। सम्पूर्ण मन्दिर शिलाखण्डो अर्थात् पत्थर का बना है। मन्दिर की शिल्पकला का नाम कश्मीरी हिन्दू कला दिया जा सकता है। यह मन्दिर बंगाल के मन्दिरों के शिल्पकला के आकार तथा रूप से कुछ मिलता है। कर्नल कोल ने मन्दिर का प्लान पृष्ठ १-८८ पर दिया है। शिव लिंग के चारो तरफ लपटे हुए सर्प की बात कही गयी है। मुझे सर्प तुल्य कोई वस्तु लिंग से लिपटी हुई नहीं दिखाई पड़ी। सम्भव है। प्राचीन शिवलिंग के स्थान पर नवीन शिव लिंग की स्थापना मन्दिर के जीर्णोद्धार के समय की गयी है। कैप्टन श्री नाइट लिखता है : (सन् १८६१ ई०) यह भूमि से एक हजार फुट ऊँचा है। कहा जाता है कि अशोक के पुत्र जलोक ने इसका निर्माण कराया था- इस मन्दिर का प्लान अठपहला अर्थात् अष्टकोणीय है। प्रत्येक पहल १५ फिट लम्बा है। मन्दिर में १५ सीढ़ियां चढ़कर पहुँचा जाता है। प्रत्येक सीढ़ी आठ फिट चौड़ी है। उसके दोनों तरफ बालुआ दीवालें है। मन्दिर की दीवाल आठ फुट चौड़ी है। यह एक सब से बड़ा प्रमाण है कि वह मन्दिर बहुत पुराना था। (एपिएडिक्स ए. पृष्ठ ३५४ (१८६१) वह मन्दिर के विषय में लिखता है- मन्दिर इस समय दो हिन्दू साधुओं की संरक्षता में है। यहां मैने दो बड़े गन्दे फकीरो अथवा धार्मिक साधुओं को देखा। उनमें एक सो रहा था। उसका पैर धूल तथा भस्म में पड़ा था, दूसरा अविचल बैठा था। उसकी एक भी मांस- पेशियाँ तक हिल नहीं रही थीं। वह प्रातःकालीन सूर्य में धूप खा रहा था। दोनों प्रायः नंगे थे। उनके शरीर पर तथा मुख पर राख पुती हुई थी। उनके बाल लम्बे और जटा का रूप ले लिये थे। वे दोनों जगत् से जैसे सम्बन्ध तोड़ चुके थे। मै वहां पर था। परन्तु उनमें से किसी ने मेरी तरफ न तो देखा और न ध्यान दिया। उन्हें मेरी उपस्थिति का जैसे ज्ञान भी नहीं था। यद्यपि मैने उनमें से एक का स्केच किया। दोनों की तरफ बहुत देर तक इस प्रकार ध्यान पूर्वक देखता रहा जैसे किसी विड़ियाघर में कोई नया जानवर आया हो परन्तु उन्हें जैसे इन सबका कोई ज्ञान ही नहीं था। ४४

[Page Header] ३४४ राजतरंगिणी

[Left Column] गोपाद्रि गिर, गोपकार, तख्त-ए-सुलेमान, शंकराचार्य पर्वत, ज्येष्ठेश्वर आदि सब एक ही पर्वत के नाम हैं। गुप्तकर गांव उत्तर-पूर्व पर्वत के मूल में और डल के तट पर है। (रा० त० ८:११०४, १०)। पर्वत श्रीनगर के पूर्व दिशा में है। राजतरंगिणी (१:१२४) से मालूम होता है। अत्यन्त प्राचीनकाल से ज्येष्ठेश्वर शिव की पूजा यहाँ होती रही है। इस समय जेकर में देवस्थान है। वहाँ पूजा होती है। वह इस पर्वत के समीप है। ज्येष्ठेश्वर का जो वर्णन राजा गोपादित्य के सन्दर्भ में किया गया है, वह निस्सन्देह इसी पवित्र स्थान से सम्बन्ध रखता है। यह वही स्थान है, जहाँ इस समय शंकराचार्य पर्वत पर, शंकर का मन्दिर स्थित है। मन्दिर में इस समय विशाल शिव लिंग स्थापित है। मैं इस स्थान की कई बार यात्रा कर चुका हूँ। श्री फरगुसन ने ठीक ही कहा है 'वर्तमान मन्दिर बहुत बाद का निर्माण है।' (पृष्ठ २८२।) मन्दिर का ऊंचा अधिष्ठान तथा सीढियां, निस्संदेह कल्हण द्वारा देखी हुई गोपादित्य के मन्दिर की निर्माण है। इस पर्वत पर इस मन्दिर के अतिरिक्त और कोई प्राचीन निर्माण अथवा किसी प्रकार का ध्वंसावशेष नहीं रह गया है। मेरी जानकारी में यहाँ अभी तक कोई प्राचीन वस्तु नहीं मिली है। एक बड़े निर्माण के लिए इस पर्वत पर यही एक उपयुक्त स्थान है। जहां बड़े पैमाने पर कुछ बनाया जा सकता था। ज्येष्ठ का अर्थ सबसे बडा होता है। यह पर- मेश्वर के लिये भी प्रयुक्त किया गया है। यह सामगान का एक प्रकार भी है। मलमास, अधिक- मास तथा ज्येष्ठमास तीन वर्ष के पश्चात् पडने वाले अधिक चन्द्रमास के लिये प्रयोग किया जाता है। ज्येष्ठा नक्षत्रयुक्त पूर्णमासी अर्थात् ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के लिये भी ज्येष्ठ शब्द का प्रयोग किया जाता है।

[Right Column] गोपाचल ग्वालियर के समीप भी एक पर्वत है। ग्वालियर का एक नाम गोपा है। गोप का प्राचीन अर्थ रक्षक किंवा रक्षा करने वाला होता है। शंकराचार्य मन्दिर का सबसे पुराना फोटो कर्नल कोल की पुस्तक में (पृष्ठ १-८८) छुपा है। उस समय (सन् १८६९ ई०) मन्दिर पर पेड़ तथा घास जम गये थे। मन्दिर की मरम्मत नहीं हुई थी। मन्दिर का बाह्य आकार जैसा उस समय था वैसा ही इस समय भी है। मन्दिर श्रीनगर के भूमितल से १००० फुट ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। कोल का कहना है कि परम्प- रागत गाथा के अनुसार यह मन्दिर राजा जालुक ने ईसापूर्व २२०' में निर्माण कराया होगा। मार्शल का मत है कि कश्मीर के अन्य हिन्दू मन्दिरों का जो काल है, वही इस मन्दिर का है। मन्दिरों पर लोग अपना नाम तथा निर्माण काल खुदवा दिया करते हैं। श्री फरगुसन को प्रारम्भ में भ्रम हो गया था। उसने मन्दिर पर हिजरी १०६९ लिखा देखा था। अतएव उन्होंने धारणा बना ली—मन्दिर जहांगीर के काल में बनाया गया था। यह भ्रम है। इसी प्रकार मन्दिर के अन्दर दक्षिण पश्चिम स्तम्भ पर लिखा है। एक साहूकार 'हाजी हुश्ती' ने संवत् ५४ में शिव का निर्माण किया' । उस समय इस्लाम धर्म का उदय नहीं हुआ था। उसी स्तम्भ के नीचे एक जगह लिखा है 'ख्वाजा रुकन वल्द पीर जान ने मन्दिर बनवाया।' इसमें संवत् अथवा हिजरी सन् नहीं दिया गया है। कल्हण के अनुसार गोपादित्य ने मन्दिर का निर्माण ईसा पूर्व ३६८-३०८ वर्ष में किया था। किसी विशेष प्रमाण के अभाव में मूलमन्दिर का निर्माण काल यह मान लिया जा सकता है। राजा अभिनव गुप्त (सन् ६९३-१०१५ ई०) के समय की किवदंती प्रचलित है। शंकराचार्य के एक शिष्य का यहां आगमन हुआ था। वह वेदान्ती थे। शक्ति में उसका विश्वास नहीं था। एक दिन

[Page Header] प्रथम तरंग ३४५

[Left Column] उसको बहुत भूख लगी। मार्ग में एक स्त्री को दूध लिये जाते देखा। दूध मांगा। स्त्री ने कहा। पर्वत से नीचे उतरिए। दूध दूंगी। उत्तर मिला। शक्ति नहीं है जो पर्वत से उतर सकूं। स्त्री ने उत्तर दिया। शक्ति कैसे होगी। तुम शक्ति में विश्वास नहीं करते। वेदान्ती को बात लग गयी। शक्ति में विश्वास करने लगे। 'सौन्दर्य लहरी' जैसे प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना शक्ति की प्रशंसा एवं स्तुति में की। मन्दिर पतला है। इसका अधिष्ठान २० फुट ऊँचा है। यह १३ परत शिलाखण्डों का बना है। चारो कोणों पर तीन कोणाकार अधिष्ठान बना है। बौद्ध शैली के आधार पर बौद्ध लोग इसे अपना पवित्र मन्दिर मानते हैं। यहां मन्दिर का बाह्य रूप है। कोणाकार रूप के कारण जो बौद्ध स्तूपों में पाया जाता है, कुछ लोगों का मत है यह बौद्ध मन्दिर था। मन्दिर का बाहरी चौतरा ३३ फुट चौड़ा है। उसपर मुंडेरा तुल्य बनावट मन्दिर के अष्टभुजीय रूप को प्रकट करता है। मन्दिर के चबूतरे पर पहुंचने के लिए तीन वर्गों में पत्थर सीढ़ियां की बनी हैं। पहला ६, दूसरा ७ तथा तीसरा १८ सीढ़ियो का बना है। अट्ठारह सीढ़ियो वाली चढ़ान दोनो ओर से दिवालों द्वारा बन्द है। इसके पश्चात् १० सीढ़ियों से चढ़ने पर मन्दिर के द्वार तक पहुँचा जा सकता है। मन्दिर का गर्भगृह गोलाकार है। अर्घा में एक बड़ा लिंग है। मन्दिर का शिखर २५ फुट ऊँचा है। यह चबूतरे में ५ फीट ऊँचाई पर है। चबूतरे का परिवेश १०० फुट होगा। मन्दिर का व्यास १४ फिट है। छत ११ फुट ऊँचाई से आरम्भ होती है। छत के आधार तुल्य चारों कोनों पर चार अठपहले स्तम्भ है। दिवाल ७½ फुट मोटी है। सम्पूर्ण मन्दिर शिलाखण्डों अर्थात् पत्थर का बना है। मन्दिर की शिल्पकला का नाम कश्मीरी हिन्दू कला दिया जा सकता है। यह मन्दिर बंगाल के ४४

[Right Column] मन्दिरों के शिल्पकला के आकार तथा रूप से कुछ मिलता है। कर्नल कोल ने मन्दिर का प्लान पृष्ठ १-८८ पर दिया है। शिव लिंग के चारों तरफ लपटे हुए सर्प की बात कही गयी है। मुझे सर्प तुल्य कोई वस्तु लिंग से लिपटी हुई नहीं दिखाई पड़ी। सम्भव है। प्राचीन शिवलिंग के स्थान पर नवीन शिव लिंग की स्थापना मन्दिर के जीर्णोद्धार के समय की गयी है। कैप्टन थी नाइट लिखता है : (सन् १८६१ ई०) यह भूमि से एक हजार फुट ऊँचा है। कहा जाता है कि अशोक के पुत्र जलोक ने इसका निर्माण कराया था- इस मन्दिर का प्लान अठपहला अर्थात् अष्टकोणीय है। प्रत्येक पहल १५ फिट लम्बा है। मन्दिर में १५ सीढ़ियां चढ़कर पहुंचा जाता है। प्रत्येक सीढ़ी आठ फिट चौड़ी है। उसके दोनो तरफ बाजूआ दीवालें है। मन्दिर की दीवाल आठ फुट चौड़ी है। यह एक सब से बड़ा प्रमाण है कि वह मन्दिर बहुत पुराना था। (एपिएिडक्स ए. पृष्ठ ३५४ (१८६१) वह मन्दिर के विषय में लिखता है-मन्दिर इस समय दो हिन्दू साधुओं की संरक्षता में है। यहां मैने दो बड़े गन्दे फकीरों अथवा धार्मिक साधुओं को देखा। उनमें एक सो रहा था। उसका पैर धूल तथा भस्म में पड़ा था, दूसरा अविचल बैठा था। उसकी एक भी मांस- पेशियां तक हिल नहीं रही थीं। वह प्रातःकालीन सूर्य में धूप खा रहा था। दोनों प्रायः नंगे थे। उनके शरीर पर तथा मुख पर राख पुती हुई थी। उनके बाल लम्बे और जटा का रूप ले लिये थे। वे दोनों जगत् से जैसे सम्बन्ध तोड़ चुके थे। मैं वहाँ पर था। परन्तु उनमें से किसी ने मेरी तरफ न तो देखा और न ध्यान दिया। उन्हें मेरी उपस्थिति का जैसे ज्ञान भी नहीं था। यद्यपि मैने उनमें से एक का स्केच किया। दोनों की तरफ बहुत देर तक इस प्रकार ध्यान पूर्वक देखता रहा जैसे किसी चिड़ियाघर • में कोई नया जानवर आया हो परन्तु उन्हें जैसे इन सबका कोई ज्ञान ही नहीं था।

३४६ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ] थो बाइन अपने ट्रेवेल पृष्ठ १०,११ में लिखते है। तख्त-सुलेमान एक पुराना हिन्दू मन्दिर है। यह तेजस्वी सुलेमान का तख्त कहा जाता है। यह प्राकेट दाक्षिणवासी इन्द्रजालिक, जिन्हें प्रत्येक पवित्र मुसल- मान विश्वास करता है कि वह आराम से उस सिंहासनपर आये थे जो दैविस तथा एरिट लेकर आए थे। जिन्हें भगवान् ने सुलेमान का सेवक बना दिया था। श्री डब्लू, वोस्फीहट लिखते हैं—'मैं नहीं जानता कि तख्त सुलेमान नाम क्यों पड़ा। निश्चय रूप से कहा जा सकता है कि बाइबिल का ख्यातिप्राप्त व्यक्ति (सुलेमान) क्या यहाँ आकर पर्वत पर अपना तख्त बनाया था। किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं होता। यह विचित्र बात है कि पूर्व में अपने पवित्र इतिहास से सम्बन्धित व्यक्तियों का नाम जिनसे हम परिचित हैं यहाँ की स्थानीय गाथाओं, साहित्य तथा यथार्थ सच्चाई में मिलते हैं जैसे कि हजरत नूह तथा उसके पुत्र की मजारें फैजाबाद के समीप अयोध्या में हैं। एशिया के इस भाग में दो नामों की प्रसिद्धि इन संज्ञाओं के कारण हुई है। क्यों और किस प्रकार तख्त ए सुलेमान इस ऊँचे पर्वत का सुलेमान के नाम पर नाम पड़ा कहना कठिन है। यहाँ की स्थानीय जन कथाओं में कोई ऐसी कथा नहीं मिली। जिससे मालूम होता कि हज़रत सुलेमान ने यहाँ आसपास आश्चर्यजनक काम किया था। यहाँ के अच्छे मुसलमान कहते हैं कि यहाँपर हजरत सुलेमान ने ठहर कर कश्मीर उपत्यका का जल जिन्नों को आज्ञा देकर निकलवाया था। जिन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने सुलेमान के आधीन कर दिया था। 'हिन्दू लोग इसे सिर-ई-शूर-अर्थात् शिवका शिर कहते हैं ··············अष्टकोणीय चबूतरा पर जो १२ फिट ऊँचा है उसपर ३० फिट ऊँचा कोणीय मन्दिर बना है। इसमें चूने के पत्थर की सीढ़ियाँ पूर्व दिशा में है जो भूमिस्तर से मन्दिर के गर्भ-गृहमें पहुँचाती हैं। चूने के पत्थर पर खूब पालिश की गयी

[दायाँ स्तम्भ] है। यही पत्थर सम्पूर्ण मन्दिर की रचना में लगाया गया है। मन्दिर का गर्भगृह वृत्ताकार अर्थात् गोला है। उसका व्यास १४ फिट है। छत समतल है। यह चार खम्बों पर आधारित है। मध्यमें एक चोंटूंदा अधिष्ठान है। उसके ऊपर काले पत्थर का शिव लिंग है। उससे प्रकट होता है कि इस दिवार के अन्दर विभिन्न समयों में कितने विभिन्न धर्मों का अनुसरण किया गया होगा। मूलतः यह बौद्ध मन्दिर था। कालान्तर में मुसलिम काल में मसजिद बना दिया गया। तदनन्तर हिन्दुओं द्वारा शिव मन्दिर का रूप पहन लिया। पृ०-१०-११ महाराज मैसूर ने मन्दिर के शिखर पर बिजली लगवायी है। यह बिजली रात भर जलती है। उसका प्रकाश कश्मीर उपत्यका के किसी भी भाग में दिखाई देता है। राजा ने बिजली के खर्च के लिए रुपया जमा कर दिया है। उसी से बिजली का खर्च दिया जाता है। रात्रि में मन्दिर पर तथा शिखर पर प्रखर ज्योति जलती है। कश्मीर उपत्यका में वह जैसे भगवान् का स्मरण दिलाती है। भगवान् कश्मीर की उपत्यका की रक्षा दिवा संरक्षण कर रहे हैं। उस रोशनी को देखकर मन को एक प्रकार का आध्यात्मिक संतोष तथा शान्ति मिलती है। मन्दिर के उत्तर-पूर्व एक चबूतरा है। जहाँ सम्भवतः पहले कोई इमारत बनी रही होगी। मन्दिर के उत्तर पार्श्व के समीप एक अलंकृत कमरा चूने के पत्थर का बना है। कमरा ११ फुट वर्गाकार तथा ८ १/२ फुट ऊँचा है। मन्दिर के दक्षिण तरफ ४० फुट दूर पर एक हौज है। वह अलंकृत पत्थर का बना है। यह ११ फुट वर्गाकार और ९ फुट गहरा है। शिखर पर जल की कठिनाई है। पर्वत मूल से आदमी जल लेकर ऊपर आता है। इस हौज में बर्फ तथा वर्षा का जो जल एकत्रित होता है। इससे मन्दिर की पूजा तथा अर्चना होती है।

प्रथम तरंग ३४७ भूक्षीरवाटिकायां यो निर्वास्य लशुनाशिनः । खासटायां व्यधाद्विप्रान् निजाचारविवर्जितान् ॥ ३४२ ॥ ३४२. उसने लहसुनभोजी १ विप्रों को भूक्षीर वाटिका २ तथा निज आचारहीन ब्राह्मणों को खासटा से ३ निर्वासित कर दिया ।

राजतरंगिणी के अनुसार राजा गोपादित्य ने (ईसा पूर्व ३६८-३०८) में इस मन्दिर का निर्माण कराया था । राजा ललितादित्य सन् ७०१-७३७ ई० ने मन्दिर का जीर्णोद्धार, मन्दिर निर्माण के लगभग एक हजार वर्ष पश्चात् कराया था। कश्मीर के बड़शाह जैनुल आवदीन (सन् १४२०-१४७० ई०) ने मन्दिर की छत की मरम्मत करवायी थी। छत भूकम्प के कारण प्रायः नष्ट हो गयी थी। सिख राज्यपाल शेखगुलाम मोहिउद्दीन ने शिखर की ईंटो से मरम्मत करवायी थी। डांगरा राजाओ ने ईंटों के स्थान पर पत्थर का शिखर, जैसा पूर्व मन्दिर का था, बनवा दिया है।

पूर्वकाल में झेलम नदी के सुघादधार घाट से मन्दिर तक सीड़ियां बनी थीं। वे अब नष्ट हो गया हैं। सुना जाता है। मन्दिर की इन सीढ़ियों के पत्थरों से नूरजहाँ ने श्रीनगर में पत्थर मस्जिद का निर्माण कराया है। पत्थर मस्जिद वितस्ता के वाम तट पर स्थित है। यह मुगल स्थापत्य शैली पर बनी है। मस्जिद मे कोई नमाज़ नही पड़ता। मस्जिद का इसलिए त्याग कर दिया गया कि नूरजहा की जूतों की कीमत मात्र मस्जिद निर्माण की कीमत आंकी गयी थी। अतएव वह अपवित्र मानकर त्याग दी गयी। मैने इस मस्जिद को देखा है। मस्जिद मे एक बड़ा अहाता है। सूना पड़ा है। इसमे बच्चे खेलते हैं।

शंकराचार्य पर्वत का नाम तख्त सुलेमान 'बाण भट्ट' का रखा हुआ है।

(२) आर्य देशीय : श्री रणजीत सीताराम पण्डित के अनुसार कल्हण ने यहा गंगा और यमुना के भूखरा्ड को माना है। किन्तु उत्तरी भारतवर्ष को यदि आर्य्यावर्त मान लेते है तो यह शब्द आर्यदेश के अर्थके अधिक समीचीन होगा । कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है गोप या गुपकर में आर्यदेशीय ब्राह्मणों के निवास निमित्त राजा ने अग्रहार दिया था । डललेक के तट पर ब्राह्मणों के आवाद करने का यह प्रथम उदाहरण मिलता है । उक्त विवरण से स्पष्ट प्रकट होता है। कश्मीर के ब्राह्मणो को मान्यता खान-पान की परम्परा न पालन करने कारण समाप्त हो गयी थी। उनके स्थान पूर्ति निमित्त आचारवान ब्राह्मणों को बाहर से लाकर आचार रक्षा निमित्त बसाया गया था। (३) गोपा अग्रहार : गोपा अग्रहार गुपकर ग्राम में स्थित फलवाले बगीचों आदि का स्थान रहा होगा। श्रीनगर में जिस तेजी के साथ आबादी बढ़ रही है, उससे यह भाग भी नष्ट होकर, आबादी तथा मकानों के समूह का रूप ले लेगा। पाठभेद :

  • श्लोकसंख्या ३४२ में 'व्यधाद्वि' का 'व्यथानिव' 'व्ययार्वि', 'बुधान्वि' तथा 'व्यधान्वि' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४२. (१) लहसुनभोजी : मनुस्मृति लहसुन का प्रयोग द्विजों के लिए वर्जित करती है। लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डुं कवकानि च । अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवाणि च। ५५। लहसुन तथा प्याज का भोजन ब्राह्मणों एवं द्विजों के लिये वर्जित माना गया है। उच्च वर्ण के लोग उनका व्यवहार कुछ दिन पूर्व नही करते थे। मेरे घरमे अबतक लहसुन प्याज का प्रवेश नही हो सका

३४८ राजतरंगिणी अन्यांश्चानीय देशेभ्यः पुण्येभ्यो वश्चिकादिषु । पावनानग्रहारेषु ब्राह्मणान्स न्यरोपयत् ॥ ३४३ ॥ ३४३. उसने पुण्यदेशों¹ से अन्य पवित्र ब्राह्मणों² को लाकर वश्चिक³ आदि अग्रहारों में बसाया। उत्तमो लोकपालोऽयमिति लब्ध प्रशस्तिषु । यः प्राप्तवान्विना यशं चक्षमे न पशुक्षयम् ॥ ३४४ ॥ ३४४. जिसने प्रशस्तियों¹ में यह 'उत्तम लोकपाल है', उपाधि प्राप्त की थी। यश के अतिरिक्त पशु क्षय² यह सहन नहीं कर सकता था। हैं। मैं स्वयं नहीं खाता। सनातनी ब्राह्मण गण आज भी लहसुन प्याज का भक्षण नहीं करते। उन्हें अभक्ष्य माना गया है। वैष्णव तथा वैश्य वर्ग में एक बहुत बड़ा समाज लहसुन तथा प्याज से परहेज करता है। मारवाड़ी भाषा में अबतक प्याज एवं लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता। (२) भूक्षीर वाटिका : वर्तमान बूछो थोर प्राचीन भूक्षीर वाटिका स्थान है। यह पतला भूखण्ड है। शंकराचार्य पर्वत के मूल में उत्तर- पश्चिम स्थान से डल के एक भाग गगरी बल तक फैला है। 'वीर' शब्द संस्कृत वाटिका का अपभ्रंश है। भूका अर्थ भूमि, क्षीर का अर्थ दूध, तथा वाटिका का अर्थ छोटा उद्यान होता है। शुद्ध संस्कृत नाम। सम्भव है यहाँ पर ऐसे वृक्ष हैं जिनके पत्ते या डंठल तोड़ने पर गूलर, वटादि की तरह दूध निकलता रहा हो। (३) खासटा : इस स्थान को सुदर बल के समीप होना चाहिए। निश्चयात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता कि वास्तव में यह स्थान कहाँ पर था। पृष्ठ ११० सुदर बल टिप्पणी द्रष्टव्य है। ३४३ (१) पुण्यदेश : यहाँ पर पुण्यदेश का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है। राजा सम्भवतः कश्मीर को पुण्यदेश इसलिये नहीं समझता था कि वहीं के ब्राह्मणादि आचारभ्रष्ट हो गये थे। कई बार वहांके ब्राह्मणों के सुधार की चेष्ट की गयी। कितनी ही बार ब्राह्मण बाहर से लाकर कश्मीर में बसाये गये परन्तु प्रतीत होता है कालान्तर में आने वाले ब्राह्मण भी स्थानीय ब्राह्मणों से मिलकर आचार का त्याग कर देते थे। अतएव राजा कश्मीर के बाहर 'पुण्यदेश' उत्तरी भारत के तीर्थस्थानों आदि से लाकर ब्राह्मण कश्मीर में बसाये। (२) पवित्र ब्राह्मण : कश्मीर की तुलना में पुण्यदेश के ब्राह्मणों को पवित्र कहा गया है। पवित्र ब्राह्मण का यहाँ अर्थ-विद्वान्, आचार- नियम स्वाध्यायप्रिय, पठन-पाठन-यज्ञादि कर्मकाण्ड में पारंगत ब्राह्मणों से है। (३) वश्चिकफ : यह वर्तमान गांव उच्चो है। रामब्यार नदी की पूर्व दिशा में अधोभाग में है। सन् १८९१ में पं० काशीराम को यहाँ कुछ खण्डित मूर्तियाँ मिली थीं। उनके अनुसार स्थान विशेष प्राचीन महत्व नहीं रखता था। मात्र एक देवस्थान रूप में स्थित था। इसके पूर्व में नदी कुछ दूर पर पड़ेगी। उत्तर में रामब्यार नदी है। पश्चिम में दुरबाग तथा सपनगर है। दक्षिण में अलनी है। यह विजयेश्वर के पश्चिम पड़ता है। ३४४. (१) प्रशस्ति : निःसन्देह गोपादित्य ऐतिहासिक व्यक्ति था। उसके नाम से सम्बन्धित गोपाद्रि पर्वत, गोपकुर (गोपा अग्रहार) तथा अनेक स्थान हैं। शंकराचार्य पर्वत पर स्थित मन्दिर इस राजा का निर्माण था। यहाँ पर,

प्रथम तरंग सषड्दिनां वर्षषष्टिं पालयित्वा स मेदिनीम् । भोक्तुं पुण्यपरीपाकं लोकान्सुकृतिनामगात् ॥ ३४५ ॥ ३४५. उसने साठ वर्ष छह दिन¹ मेदिनी का पालन करके, पुण्य परिपाक भोग हेतु, सुकृ- तियों के लोक में प्रस्थान किया । गोकर्णस्तत्सुतः क्षोणीं गोकर्णेश्वरकृद्वृधे । अष्टपञ्चाशतं वर्षांस्त्रिंशत्याऽह्नां विवर्जितान् ॥ ३४६ ॥ गोकर्ण:¹ ३४६. गोकर्णेश्वर२ का निर्माता उसके पुत्र गोकर्ण ने तीस दिन कम अट्ठावन वर्ष३ पृथ्वी पर शासन किया ।

प्रतीत होता है, कल्हण ने गोपादित्य सम्बन्धी श्री एस पी० पण्डित ने भी ६० वर्ष ६ दिन राज्य- प्रशस्तियों से अपनी लेखन सामग्री ली थी । काल माना है प्रशस्ति के लिये टिप्पणी पृ० १३ 'प्रशस्ति पाठभेद : पट्ट' द्रष्टव्य है । श्लोक संख्या ३४६ में 'क्षोणी' का 'क्षोणीं', (२) पशुक्षय— यज्ञ में पशुहत्या विहित थी । वृधे" का 'हृदे'; 'त्याऽह्नां' का 'त्यह्नां' तथा 'विवर्जि- अतएव राजा ने पशुहत्या यज्ञ के अतिरिक्त सब तान्' का 'विवर्जनात्' पाठभेद मिलता है । स्थानों पर बन्द करवा दी । कश्मीर शीत प्रधान पादटिप्पणियाँ : देश है । तथापि उसने धर्म भावना से प्रेरित होकर ३४६ (१) गोकर्ण : आइने अकबरी में राजा पशुहत्या वर्जित कर दी । प्रतीत होता है । गोकर्ण को 'कुरेन' तथा उसका राज्यकाल ५७ वर्ष राजा धर्मभीरु था । सुधारक था । ११ दिन दिया गया है । हसन लिखता है-क. २७३४ पाठभेद : में उसके (गोपादित्यके) बेटे राजा गोकर्न ने इकबाल- श्लोक संख्या ३४५ में 'सषड्दिनां' का 'सपञ्चमासा' मन्दी का ताज सर पर रखकर अठावन बरस सल्तनत तथा 'परीपाकं' का पाठभेद 'परिपाकं' तथा 'परो किया । पाकं' मिलता है । श्री स्टीन राज्याभिषेक का समय कल्हण की पादटिप्पणियाँ : गणनानुसार लौकिक संवत् २७६७ वर्ष छठवां ३४५. (१) छह दिन : कुछ विद्वानो का मत है मास तथा उन्नीसवां दिन देते हैं । श्री एस० कि 'छह दिन' के स्थान पर 'छह मास' होना पी० पण्डित ने यह काल ईसा पूर्व ३११ वर्ष माना चाहिए । श्री स्टीन तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित है । श्री जनरल कनिंघम के अनुसार राजा गोकर्ण दोनों ने ही ६ दिन ही पाठ ठीक माना है । पाठ दोनों का नाम किदार शैलो की मुद्रा पर टंकित मिला है । ही मिलते हैं । अतएव मैंने प्रचलित पाठ के अनुसार परन्तु बादमें उस मुद्रा के प्रति सन्देह प्रकट किया गया '६ दिन' ही दिया है । किसी गणना पर इसका है कि वास्तव में वह गोकर्ण की थी । श्री देवसेन निश्चय करना कठिन है । श्री स्टीन ने ठीक लिखा श्री कनिंघम के मत का खण्डन करते हैं । है कि राजा युधिष्ठिर का राज्य काल नही (२) गोकर्णेश्वर : गोकर्णेश्वर महादेव का कहाँ दिया गया है । अतएव गणना करना कठिन है । स्थान था अभी तक पता नही चला है । गोकर्ण क्षेत्र

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

३४८ राजतरङ्गिणी अन्यांश्चानीय देशेभ्यः पुण्येभ्यो वश्चिकादिषु । पावनानग्रहारेषु ब्राह्मणान्स न्यरोपयत् ॥ ३४३ ॥ ३४३. उसने पुण्यदेशों¹ से अन्य पवित्र ब्राह्मणों² को लाकर वश्चिक³ आदि अग्रहारों में बसाया। उत्तमो लोकपालोऽयमिति लक्ष्म प्रशस्तिषु । यः प्राप्तवान्विना यज्ञं चक्षमे न पशुक्षयम् ॥३४४॥ ३४४. जिसने प्रशस्तियों¹ में यह 'उत्तम लोकपाल है', उपाधि प्राप्त की थी। यज्ञ के अतिरिक्त पशु क्षय² वह सहन नहीं कर सकता था। है। मैं स्वयं नहीं खाता। सनातनी ब्राह्मण गण आज भी लहसुन प्याज का भक्षण नहीं करते। उन्हें अभक्ष्य माना गया है। वैष्णव तथा वैश्य वर्ग में एक बहुत बड़ा समाज लहसुन तथा प्याज से परहेज करता है। मारवाड़ी बासा में अबतक प्याज एवं लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता। (२) भूक्षीर वाटिका: वर्तमान बुछो और प्राचीन भूक्षीर वाटिका स्थान है। यह पतला भूखण्ड है। शंकराचार्य पर्वत के मूल में उत्तर- पश्चिम स्थान से डल के एक भाग गगरी बल तक फैला है। 'वोर' शब्द संस्कृत वाटिका का अपभ्रंश है। भूका अर्थ भूमि, क्षीर का अर्थ दूध, तथा वाटिका का अर्थ छोटा उद्यान होता है। शुद्ध संस्कृत नाम। सम्भव है वहाँ पर ऐसे वृक्ष हैं जिनके पत्ते या डंठल तोड़ने पर गूलर, वटादि की तरह दूध निकलता रहा हो। (३) खासटा : इस स्थान को सुदर बल के समीप होना चाहिए। निश्चयात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता कि वास्तव में यह स्थान कहाँ पर था। पृष्ठ १९० सुदर बल टिप्पणी द्रष्टव्य है। ३४३ (१) पुण्यदेश : यहाँ पर पुण्यदेश का प्रयोग महत्वपूर्ण है। राजा सम्भवतः कश्मीर को पुण्यदेश इसलिये नहीं समझता था कि वहाँ के ब्राह्मणादि आचारभ्रष्ट हो गये थे। कई बार वहाके ब्राह्मणो के सुधार की चेष्ट की गयी। कितनी ही बार ब्राह्मण बाहर से लाकर कश्मीर में बसाये गये परन्तु प्रतीत होता है कालान्तर मे आने वाले ब्राह्मण भी स्थानीय ब्राह्मणों से मिलकर आचार का त्याग कर देते थे। अतएव राजा कश्मीर के बाहर 'पुण्यदेश' उत्तरी भारत के तीर्थस्थानों आदि से लाकर ब्राह्मण कश्मीर में बसाये। (२) पवित्र ब्राह्मण : कश्मीर की तुलना में पुण्यदेश के ब्राह्मणों को पवित्र कहा गया है। पवित्र ब्राह्मण का यहाँ अर्थ—विद्वान्, आचार- नियम स्वाध्यायप्रिय, पठन-पाठन-यज्ञादि कर्मकाण्ड में पारंगत ब्राह्मणों से है। (३) वश्चिक : यह वर्तमान गांव उची है। रामख्यार नदी की पूर्व दिशा मे अधोभाग मे है। सन् १८९१ में पं० काशीराम को यहाँ कुछ खण्डित मूर्तियां मिली थीं। उनके अनुसार स्थान विशेष प्राचीन महत्व नहीं रखता था। मात्र एक देवस्थान रूप में स्थित था। इसके पूर्व में नदी कुछ दूर पर पड़ेगी। उत्तर मे रामख्यार नदी है। पश्चिम मे दुरवाग तथा सपनगर हैं। दक्षिण मे अवन्ती है। यह विजयेश्वर के पश्चिम पड़ता है। ३४४. (१) प्रशस्ति : निसन्देह गोपादित्य ऐतिहासिक व्यक्ति था। उसके नाम से सम्बन्धित गोपाद्रि पर्वत, गोपपुर (गोपा अग्रहार) तथा अनेक स्थान हैं। शंकराचार्य पर्वत पर स्थित मन्दिर इस राजा का निर्माण था। यहाँ पर,

प्रथम तरंग ३४९ षड्दिनां वर्षषष्टिं पालयित्वा स मेदिनीम् । भोक्तुं पुण्यपरीपाकं लोकान्सुकृतिनामगात् ॥ ३४५ ॥ ३४५. उसने साठ वर्ष छह दिन¹ मेदिनी का पालन करके, पुण्य परिपाक भोग हेतु, सुकृ- तियों के लोक में प्रस्थान किया । गोकर्णस्तत्सुतः क्षोणीं गोकर्णेश्वरकृद्बधे । अष्टपञ्चाशतं वर्षांस्त्रिंशत्याऽह्नां विवर्जितान् ॥ ३४६ ॥ गोकर्ण:¹ ३४६. गोकर्णेश्वर² का निर्माता उसके पुत्र गोकर्ण ने तीस दिन कम अट्ठावन वर्ष³ पृथ्वी पर शासन किया । प्रतीत होता है, कल्हण ने गोपादित्य सम्बन्धी प्रशस्तियों से अपनी लेखन सामग्री ली थी । प्रशस्ति के लिये टिप्पणी पृ० १३ 'प्रशस्ति पट्ट' द्रष्टव्य हैं। (२) पशुह्वय-- यज्ञ में पशुहत्या विहित थी । अतएव राजा ने पशुहत्या यज्ञ के अतिरिक्त सब स्थानों पर बन्द करवा दी । कश्मीर शीत प्रधान देश है। तथापि उसने धर्म भावना से प्रेरित होकर पशुहत्या वर्जित कर दी । प्रतीत होता है । राजा धर्मभीरु था । सुधारक था । पाठभेद : श्लोक संख्या ३४५ में 'सपद्दिनां' का 'सपण्मासा' तथा 'परीपाकं' का पाठभेद 'परिपाकं' तथा 'परो पार्क' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४५. (१) छह दिन : कुछ विद्वानो का मत है कि 'छह दिन' के स्थान पर 'छह मास' होना चाहिए। श्री स्टीन तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित दोनों ने ही ६ दिन हो पाठ ठीक माना है। पाठ दोनों ही मिलते है । अतएव मैने प्रचलित पाठ के अनुसार '६ दिन' ही दिया है। किसी गणना पर इसका निश्चय करना कठिन है। श्री स्टीन ने ठीक लिखा है कि राजा युधिष्ठिर का राज्य काल नहीं दिया गया है। अतएव गणना करना कठिन है। श्री एस पी. पण्डित ने भी ६० वर्ष ६ दिन राज्य- काल माना है पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'क्षोणी' का 'क्षौणी', दृधे' का 'दधे'; 'त्याऽह्नां' का 'त्यह्ना' तथा 'विवर्जि- तान्' का 'विवर्जनात्' पाठभेद मिलता हैं। पादटिप्पणियाँ : ३४६ (१) गोकर्ण : आइने अकबरी में राजा गोकर्ण को 'कुरेन' तथा उसका राज्यकाल ५७ वर्ष ११ दिन दिया गया है। हसन लिखता है-क. २०३४ में उसके (गोपादित्यके) बेटे राजा गोकर्ण ने इकबाल- मन्दी का ताज सर पर रखकर अठावन वरस सल्तनत किया। श्री स्टीन राज्याभिषेक का समय कल्हण की गणनानुसार लौकिक संवत् २७६७ वर्ष छठवीं मास तथा उन्नीसवीं दिन देते है। श्री एस० पी० पण्डित ने यह काल ईसा पूर्व ३११ वर्ष माना है। श्री जनरल कनिंघम के अनुसार राजा गोकर्ण का नाम किदार शैलो की मुद्रा पर टंकित मिला है। परन्तु बादमें उस मुद्रा के प्रति सन्देह प्रकट दिया गया है कि वास्तव में वह गोकर्ण की थी । श्री देवसेन श्री कनिंघम के मत का खण्डन करते हैं । (२) गोकर्णेश्वर : गोकर्णेश्वर महादेव का कहाँ स्थान था अभी तक पता नहीं चला है । गोकर्ण क्षेत्र

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३५० राजतरंगिणी सूनुर्नरेन्द्रादित्योऽस्य खिखिलान्याभिधोऽभवत् । भूतेश्वरप्रतिष्ठानामक्षयिण्याश्च कारकः ॥ ३४७ ॥ नरेन्द्रादित्य (खिखिल)¹: ३४७. उसका पुत्र नरेन्द्रादित्य उपनाम खिखिल² हुआ । वह भूतेश्वर³ प्रतिष्ठानों और अक्षयिणी⁴ का संस्थापक था । दक्षिण भारत में पश्चिमी समुद्रतट पर है । गोकर्ण उमामहेश्वर, श्री ब्रह्मोश्वर, शंकेतको, श्नोभैरव, को 'दक्षिण काशी' भी कहते है । श्रीक्षेत्र-गोकर्ण थी क्षेत्रपाल, श्रीनरसिंह, श्रीकृष्ण, श्रीकेतको त्रिस्थलो में से एक क्षेत्र है। भास्कर क्षेत्रो में विनायक, श्री सिद्धेश्वर, श्रीमल्लिकर्जुन, श्री चक्रतीर्थ, इसकी गणना की जाती है । श्रो नागेश्वर, श्री मणिनाग, श्रोरामतीर्थ, श्रीकपिल- पौराणिक गाथा है कि महादेव गाय के कर्ण तीर्थ, श्री वैतरणी, श्री सरखती, श्रो सोमतीर्थ, से उत्पन्न हुए थे । जिस स्थान पर गाय के कान से आदि अनेक स्थान कश्मीर के देवस्थानों के समान रूद्र प्रकट हुए थे उस स्थान का नाम 'गोकर्ण' यहाँ बने मिलेंगे । किंवा 'रुद्रयोनि' पड़ गया था। महाप्रलय काल मे स्थान गन्दा है। बहुत गरीबी है। गोकर्ण पृथ्वी जलमग्न हो जायगी तो 'गोकर्णक्षेत्र' का स्थान का लिंग ऊपर निकला नही है। एक छोटा कुण्ड आदर्श सदृश दिखाई पडता रहेगा । अतएव उसको है । जलसे भरा रहता है। उसमे हाथ डालने पर संज्ञा 'वर्णावर्त' उस समय दी जायगी । गोकर्क के एक छोटे लिंग का स्पर्श होता है। कथा है कि दूसरे चारो ओर योजन पर्यन्त भूमि को 'गोकर्णमण्डल' लिंग के नीचे अन्य लिंग है। पार्श्वमे महाबलेश्वर कहा जाता है। की मूर्ति एक उठे स्तम्भ पर है । 'रुद्रभूमि' गोकर्ण को कहते है। यहाँ मरने पर गोकर्ण के मुख्य मन्दिर की परिक्रमा मे आदि- मुक्ति होती है। दिवंगत को शिव का सानिध्य गोकर्ण की मूर्ति भूमिस्तर से नीचे जल में मुझे प्राप्त होता है। मैने गोकर्ण क्षेत्र की यात्रा १२ दिखाई दी । मन्दिर के पृष्ठ भाग में ताम्र गंगा है । अगस्त सन् १९६५ को की थी । स्थान समुद्र यह एक पक्का छोटा कुण्ड है। इसमें अस्थि प्रवाह तटपर है। मन्दिर प्राचीन नही मालूम होता । किया जाता है। जल गंधा है । कुण्ड गन्दा लगा । समुद्र की लहरो के कारण तट कट गया है। पेड की पत्तियां गिर कर पड़ती रहती है । श्मशान से गोकर्ण में जगत्-पूजित आत्मलिंग वैवस्वत मन्व- अस्थिचयन कर यहाँ पर अस्थियां डाल दी जाती है। न्तर के २३वें, त्रेतायुग में शरत् काल कार्तिक बाहर से भी लोग अस्थि लाकर इसमे डालते हैं। शुक्ल प्रतिपद व्यतिपात योग, तुला मास, विशाखा आश्चर्य की बात यह है अस्थियो कुछ ही दिनो नक्षत्र, दिन रविवार, लग्न मीन, के मंगल मुहूर्त में में गलकर जल मे घुल जाती है। यहाँ के जल में स्थापित हुआ था। रावण आत्मलिंग को उखाड़ना रासायनिक पदार्थ कुछ है। जिनके कारण अस्थियाँ चाहता था। किन्तु असफल रहा। यहा महा- गल जाती है। अन्यथा अस्थियाँ जलमे या भूमि में बलेश्वर, महागणपति श्रीबलंकुलेश्वर, श्री ताम्र- सैकड़ों वर्ष पड़ी रहती है । गौरी, श्री वेंकटरमण, श्री भद्रकाली, कालीह्रद, पाठभेद : श्री गङ्गातीर्थ, श्री दुर्गाकुण्ड, श्री शन्नशृंग, श्री कोटि- श्लोकसंख्या ३४७ मे 'कारकः' का 'कारसः' तीर्थ, श्री विष्णुयती, श्री विष्णुपदाभ्यली, श्री रुद्र- पाठभेद मिलता है । पाद, श्री शंकर नारायण, श्री पट्टविनायक, श्री

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

प्रथम तरंग ३५१ दिव्यानुग्रहभागुग्राभिधौ यस्य गुरुर्व्यधात् । उग्रेशं मातृचक्रं च प्रभावोद्ग्राविग्रहः ॥ ३४८ ॥ ३४८. दैवी शक्ति प्राप्त, प्रभावोत्कृष्ट एवं विग्रह युक्त, उग्र १ नामक उसके गुरु ने उग्रेश २ एवं मातृ ३ चक्र स्थापित किया।


[पादटिप्पणियाँ - बायाँ स्तम्भ]

पादटिप्पणियाँ : ३४७. (१) नरेन्द्रदित्य : आइने अकबरी ने 'नुकुन्द्र' नाम दिया है। उसका राज्यकाल ३६ वर्ष ३ मास १० दिन माना है । कल्हण की गणना के अनुसार स्कीन राज्या- भिषेक का समय लौकिक संवत् २८२५ वर्ष पाँचवाँ मास उन्नीसवें दिन देते हैं। श्री एस. पी. पण्डित समय ईसा पूर्व २५३ वर्ष रखते हैं । हसनके अनुसार अपने बापके मरने के बाद राजा नरेन्द्रदित्य रौनके बख्श सल्तनत हुआ। राजा ३६ वरस हकूमत करके गुजर गया । (२) खिखिल : एक मुद्रा 'देव शाहो 'खिगिल'—अंकित प्राप्त हुई है। इसे नरेन्द्रदित्य प्रथम की मुद्रा कहा जाता है। इस मुद्रा की शैलो इफ्येलाइट शासको अर्थात् हूणों की शैलो की है। वह मुद्रा राजा लपन ( लक्ष्मण ) ( रा० त० ३ : २८३ ) के ढंग की है। एक दूसरी मुद्रा मिलती है उस पर—'श्रीनरेन्द्र'—अंकित है। यह मुद्रा 'किदार' शैली की है। सम्भव है कि यह मुद्रा इसी नाम के बाद में हुए किसी राजा की मुद्रा रही हो । यह मुद्रा सम्भवतः ५वीं ६ठवी शताब्दी की प्रतीत होती है। किन्तु कल्हण के अनुसार ईसा पूर्व २५०-२१४ वर्ष की है। कल्हण के अनुसार खिखिल श्रीनन्द तृतीय के पश्चात् उन्नीसवाँ राजा हुआ था। खिखिल नाम भारतीय नहीं प्रतीत होता अतएव इसे हूण वंशीय मानने की ओर विद्वानों का झुकाव है। किन्तु कल्हण के काल तथा मुद्रा काल में ६ शताब्दियों का अन्तर समस्या उत्पन्न कर देता है । (३) भूतेश्वर : हरमुकुट पर्वत के समीप यह स्थान


[पादटिप्पणियाँ - दायाँ स्तम्भ]

हैं। अशोक के वर्णन में इसका उल्लेख किया जा चुका है। पृष्ठ १४९ तथा टिप्पणी 'भूतेश' पृष्ठ २०१ द्रष्टव्य है । (४) अक्षयिणी : ब्राह्मणो के भोजन निमित्त अक्षयिणी क्षेत्र किंवा सदावर्त है। कश्मीर के पर्वतीय भागो मे इस प्रकार के दानो को 'मच्छिन्या' कहते हैं। श्रीवर ने ( ६:४०८ ) जैनुल आंवदीन बादशाह द्वारा दिये गये एक दान का वर्णन शूरपुर अर्थात् हूरपुर के पास पीर पंतशाल मार्ग पर किया है । यहाँ यात्री बिना किसी भेदभाव के भोजन प्राप्त करते थे। उसने यहाँ 'अन्नसत्र अविच्छिन्ना' शब्द का प्रयोग किया है। अक्षयिणी का अर्थ होता है कि जहाँ सदावर्त अथवा दान निरन्तर किया जाता है। वह इतना होता है कि कभी कमी नहीं पड़ती । कोई हताश होकर लौटता नहीं। अक्षय भाण्डार तुल्य आवश्यकता पूर्ति करता है। अच्छिन्नेनान्नसत्रेण द्विजवेश्वरवासिनाम् । उदरे मेदुरे सिद्धः प्रणामो यत्नतो विभोः ॥ १:५:२१ नासिक की गुफा में तथा अन्य स्थानों पर इस प्रकार के दान के लिए 'अक्षयनिधि' शब्द का प्रयोग किया गया है। जम्मू के रघुनाथ मन्दिर मे यह 'सदावर्त' नाम से प्रसिद्ध है । डोगरा राजाओ के काल में बनिहाल पास तथा झेलम की सड़क वुनयार पर साधु तथा तीर्थ यात्रियों को इस प्रकार का दान दिया जाता था । श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अक्षयिणी को देवी माना है। उन्होंने 'अक्षायिणी देवी के मन्दिर की स्थापना की' इस प्रकार अनुवाद किया है। मैं इसे ठीक मानने में असमर्थ हूँ। (पृष्ठ : ५८३) ३४८ (१) उग्र : इनका उल्लेख वहीं और अभी

३५२ राजतरंगिणी भूत्वा षट्त्रिंशतं वर्षान् शतं चाह्नां विभुर्भूवः । स दीर्घैरनघांल्लोकानासदत्सुकृतैः कृती ॥ ३४६ ॥ ३४९. उस पुण्यात्मा ने छत्तीस वर्ष सो दिन पृथ्वी का स्वामी रहकर अत्यधिक सुकृतों के कारण पुण्य लोक प्राप्त किया । युधिष्ठिराभिधानोऽभूदथ राजा तदात्मजः । यः सूक्ष्माक्षतया लोकैः कथितोऽन्धयुधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ युधिष्ठिर : ३५०. अनन्तर युधिष्ठिर नामक उसका पुत्र राजा हुआ, जिसे सूक्ष्माक्ष होने के कारण, लोग अन्ध युधिष्ठिर कहते थे¹। तक नहीं मिल सका है। सम्भव है कल्हण के समय तक इनके विषय में कुछ साहित्य प्राप्त रहा हो। कल्हण ने स्वयं इनका इतना संक्षिप्त वर्णन किया है कि कुछ अनुमान लगाना कठिन है। (२) उग्रेश : ऋग्वेद में 'उग्रदेव' का उल्लेख मिलता है। (ऋ० १:३६ : १८; पं०ब्रा. १४: ३ : १७; २३:१६ ११७) इनका पैतृक नाम तैत्तिरीय आरण्यक में राजनि दिया गया है। (तै०- आ०; ५ ४-१२) यहाँ पर सरल अर्थ यही अभिप्रेत है कि उग्र ने अपने नाम पर उग्रेश शिव की स्थापना की। (३) मातृ चक्र : टिप्पणी मातृचक्र पृष्ठ १८१ (१२२) द्रष्टव्य है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'शतं' का 'शति' पाठभेद मिलता है। श्लोक संख्या ३५० में 'सूक्ष्माक्षतया' का पाठभेद 'सूक्ष्माक्षितया' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३५० (१) आइने अकबरी में 'जेवादिस्तर' लिखा है। राज्य काल ४८ वर्ष १० दिन दिया गया है। राजतरंगिणी में इस राजा का राज्य काल नहीं दिया गया है। आइने अकबरी मे युधिष्ठिर के शासन के विषय में लिखा है— राजा युधिष्ठिर ने न्यायपूर्ण शासन आरम्भ किया। किन्तु कालान्तर में यह कामी हो गया, वह इतना क्रूर हो गया था कि हिन्दुस्तान तथा तिब्बत के राजाओ ने उसके खिलाफ मिलकर आवाज उठायी। इससे उत्साहित होकर कश्मीर के सरदारों ने विद्रोह किया। राजा को बन्दी-गृह में डाल दिया। श्री स्टीन इस राजा का राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २९६१ वर्ष भाठवा मास उनतीसवाँ दिन मानते है । धो एस. पी. पण्डित यह समय ईसा पूर्व २१७ वर्ष देते हैं। हसन के अनुसार 'क. २८२८ मे उसका (नरेन्द्रा- दित्य का) बेटा राजा अन्ध युधिष्ठिर बाप का जानशीन हुआ। उसकी आँखें बड़ी छोटी थी। यही वजह था कि यह बीनाई पूरी नही रखता था। इस बिना पर इसे लोगों ने अन्ध यानी कोर का लकब दिया हुआ था। शुरू-शुरू में अदल व इन्साफ सखावत व रैयत परवरी में मसरूफ रहा। लेकिन बिल आखिर कमीनों घोर बदकारों की सुहबत में पड़कर जुल्म और सखती का पेशा अख्तियार कर लिया। हर किस्म के बुरे काम मसलन शराबनोशी और बदकारी अपना शआर बना लिया। लोगों की औरतें और बीवियां जबर्दस्ती ले जाने लगा। अकलमन्दो और सन रसीदा लोगों से नफरत अख्तियार करके कमीनो और आ- वारो को अपना मुसाहब बना लिया। बेरहमी और खूँनरेजी में कोई कसर बाकी न रखी। यह देखकर

प्रथम तरंग ३५३ तेन क्रमागतं राज्यं सावधानेन शासता । अनुजग्मे मितं कालं पूर्वभूपालपद्धतिः ॥३५१॥ ३५१. उसने क्रमागत राज्य का सावधानी पूर्वक शासन करता हुआ कुछ दिन तक पूर्ववर्ती राजाओं की पद्धति १ का अनुकरण किया । काले कियत्यपि ततो यात्यभाग्यवशादसौ । सिषेवे श्रीमदन्नीतो यत्किञ्चनविधायिताम् ॥३५२॥ ३५२. कुछ समय पश्चात् अभाग्य वश श्रीमद से उन्मत्त वह यत्किंचनविधायी १ हो गया । नान्त्वग्रहीदनुग्राह्यान्न संजग्राह धीमतः । न प्रवृत्तोपचाराणां प्रागिवासीत्प्रियंकरः ॥३५३॥ ३५३. वह अनुग्रह पात्रों पर अनुग्रह, धीमानों का संग्रह, तथा सेवारत सेवकों का पूर्ववत् प्रियकर्त्ता नहीं रह गया था । दुर्विद्यपर्षदा सार्कं निर्विशेषं सभाजितैः । परिजहे स दुर्जान्तो जाततेजोवधैर्बुधैः ॥३५४॥ ३५४. दुर्विद्य गण के साथ, निर्विशेष रूप से सम्मानित तथा अपमानित विद्वानों ने उस दुर्जान्त राजा का त्याग कर दिया । सर्वत्र समदृष्टित्वं गुणोऽयं खलु योगिनः । अकीर्त्तिहेतुः स महान्दोषस्तु पृथिवीपतेः ॥३५५॥ ३५५. सर्वत्र समदर्शिता योगियों के लिये गुण है किन्तु वह पृथिवीपति की अकीर्ति का हेतु तथा महान् दोष है । उसकी फ़ौज और रैयत उससे मुतनफ़र हो गयी । पादटिप्पणियाँ : आसपास के हुक्काम जो दिल और जान से राजा के ३५१ (१) पद्धति : यहाँ शासन पद्धति मतोअ और फ़रमांबरदार थे, एक एक करके इसके अर्थ लगाना चाहिए । पूर्ववर्ती राजाओं की शासन बागी होने लगे । हकूमत के अहले हल व अकदौद पद्धति का अनुकरण कुछ दिन तक राजा करता रहा । ज़वान इसकी मजवली पर मुत्तफ़िक हो गये । अहले ३५२ (१) यत्किंचनविधायी : राजा ज़माना की यह बेमुरव्वती देखकर युधिष्ठिर दो-तीन स्वेच्छाचारी, उद्दण्ड, अकर्मण्य, उच्छृंखल, निरंकुश रकीबों के हमराह हिन्दुस्तान की तरफ भाग गया । तथा अविहित, अकरणीय कर्म करने वाला हो गया यहाँ एक राजा ने उसे पकड़कर जान से मार डाला । था । कल्हण का यही तात्पर्य यहाँ प्रकट होता है । इसकी मुद्दत हकूमत बावन बरस और आठ माह पाठभेद : थी ।' पृष्ठ ५० श्लोक संख्या ३५४ में 'परिजहे' का पाठभेद पाठभेद : 'परिजिहे' मिलता है । श्लोक संख्या ३५१ में 'अनुजग्मे' का 'मनुजग्मे' पादटिप्पणियाँ : तथा 'मितं' का पाठभेद 'सितं' मिलता है । ३५५. (१)समदर्शी : योगियों तथा सज्जनों के ४५

३५२ राजतरंगिणी भूत्वा षट्त्रिंशतं वर्षान् शतं चाह्नां विभुर्भूवः । स दीर्घैरनघैर्लोकानासदत्सुकृतैः कृती ॥ ३४६ ॥ ३४९. उस पुण्यात्मा ने छत्तीस वर्ष सौ दिन पृथ्वी का स्वामी रहकर अत्यधिक सुकृतों के कारण पुण्य लोक प्राप्त किया । युधिष्ठिराभिधानोऽभूदथ राजा तदात्मजः । यः सूक्ष्माक्षतया लोकैः कथितोऽन्धयुधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ युधिष्ठिर : ३५०. अनन्तर युधिष्ठिर नामक उसका पुत्र राजा हुआ, जिसे सूक्ष्माक्ष होने के कारण, लोग अन्ध युधिष्ठिर कहते थे१ ।

तक नहीं मिल सका है। सम्भव है कल्हण के समय तक इनके विषय में कुछ साहित्य प्राप्त रहा हो। कल्हण ने स्वयं इनका इतना संक्षिप्त वर्णन किया है कि कुछ अनुमान लगाना कठिन है। (२) उग्रेश : ऋग्वेद में 'उग्रदेव' का उल्लेख मिलता है। (ऋ० १.३६ : १८; पं० ब्रा. १४. ३ : १७; २३:१६ · ११७) इनका पैतृक नाम तैत्तिरीय आरण्यक में राजनि दिया गया है। (तै०- आ०; ५.४-१२) यहाँ पर सरल अर्थ यही अभिप्रेत है कि उग्र ने अपने नाम पर उग्रेश शिव की स्थापना की। (३) मातृ चक्र : टिप्पणी मातृचक्र पृष्ठ १८१ (१ २२) द्रष्टव्य है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'शतं' का 'शति' पाठभेद मिलता है। श्लोक संख्या ३५० में 'सूक्ष्माक्षतया' का पाठभेद 'सूक्ष्माक्षितया' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५० (१) आइने अकबरी में 'जेवादिस्तर' लिखा है । राज्य काल ४८ वर्ष १० दिन दिया गया है। राजतरंगिणी में इस राजा का राज्य काल नहीं दिया गया है। आइने अकबरी में युधिष्ठिर के शासन के विषय में लिखा है-राजा युधिष्ठिर ने न्यायपूर्ण शासन आरम्भ किया । किन्तु कालान्तर में वह कामी हो गया, वह इतना क्रूर हो गया कि हिन्दुस्तान तथा तिब्बत के राजाओं ने उसके खिलाफ मिलकर आवाज उठायी । इससे उत्साहित होकर कश्मीर के सरदारों ने विद्रोह किया। राजा को बन्दी-गृह में डाल दिया । श्री स्टीन इस राजा का राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २९६१ वर्ष आठवां मास उनतीसवां दिन मानते हैं। श्री एस. पी. पण्डित यह समय ईसा पूर्व २१७ वर्ष देते हैं । हसन के अनुसार 'क. २८२८ में उसका (नरेन्द्रा- दित्य का) बेटा राजा अन्ध युधिष्ठिर बाप का जानशीन हुआ । उसकी आँखें बड़ी छोटी थीं। यही वजह था कि वह बोलाई पूरी नही रखता था। इस बिना पर इसे लोगों ने अन्ध यानी कोर का लकब दिया हुआ था। शुरू-शुरू में अदल व इन्साफ सखावत व रँयत परवरी में मसरूफ रहा । लेकिन बिल आखिर कमीनों और बदकारो की सुहबत में पड़कर जुल्म और सख्ती का पेशा अख्तियार कर लिया । हर किस्म के बुरे काम मसलन शराबनोशी और बदकारी अपना शआर बना लिया। लोगों की औरतें और बीवियां जबर्दस्ती ले जाने लगा । अकलमन्दों और सन रसीदा लोगों से नफरत अख्तियार करके कमीनों और आ- वारों को अपना मुसाहब बना लिया। बेरहमी और खूंरेजी में कोई कसर बाकी न रखी । यह देख कर

प्रथम तरंग ३५३ तेन क्रमागतं राज्यं सावधानेन शासता । अनुजग्मे मितं कालं पूर्वभूपालपद्धतिः ॥३५१॥ ३५१. उसने क्रमागत राज्य का सावधानी पूर्वक शासन करता हुआ कुछ दिन तक पूर्ववर्ती राजाओं की पद्धति¹ का अनुकरण किया । काले कियत्यपि ततो यात्यभाग्यवशादसौ । सिषेवे श्रीमदक्षीबो यत्किञ्चनविधायिताम् ॥३५२॥ ३५२. कुछ समय पश्चात् अभाग्य वश श्रीमद से उन्मत्त वह यत्किंचनविधायी¹ हो गया । नान्वग्रहीदनुग्राह्यान्न संजग्राह धीमतः । न प्रवृत्तोपचाराणां प्रागिवासीत्प्रियकरः ॥३५३॥ ३५३. वह अनुग्रह पात्रों पर अनुग्रह, धीमानों का संग्रह, तथा सेवारत सेवकों का पूर्ववत् प्रियकर्त्ता नहीं रह गया था । दुर्विद्यपर्षदा सार्कं निर्विशेषं सभाजितैः । परिजह्रे स दुर्जातो जाततेजोवधैर्बुधैः ॥३५४॥ ३५४. दुर्विद्य गण के साथ, निर्विशेष रूप से सम्मानित तथा अपमानित विद्वानों ने उस दुर्जात राजा का त्याग कर दिया । सर्वत्र समदृष्टित्वं गुणोऽयं खलु योगिनः । अकीर्तिहेतुः स महान्दोषस्तु पृथिवीपतेः ॥३५५॥ ३५५. सर्वत्र समदर्शिता योगियों के लिये गुण है किन्तु वह पृथिवीपति की अकीर्ति का हेतु तथा महान् दोष है ।


[बायाँ स्तम्भ] उसकी फ़ौज और रैयत उससे मुतनफर हो गयी । आसपास के हुक्काम जो दिल और जान से राजा के मतोअ और फरमांबरदार थे, एक एक करके इसके बागी होने लगे । हकूमत के महल हल व अकदीद जवान इसकी मजवली पर मुताफिक हो गये । अह्ल जमाना की यह बेमुरव्वती देखकर युधिष्ठिर दो-तीन रफ़ीकों के हमराह हिन्दुस्तान की तरफ भाग गया । यहाँ एक राजा ने उसे पकड़कर जान से मार डाला । इसकी मुद्दत हकूमत बावन बरस और आठ माह थी ।' पृष्ठ ५० पाठभेद : श्लोक संख्या ३५१ में 'अनुजग्मे' का 'मनुजने' तथा 'मितं' का पाठभेद 'सितं' मिलता है । ४५

[दायाँ स्तम्भ] पादटिप्पणियाँ : ३५१ (१) पद्धति : यहाँ शासन पद्धति अर्थ लगाना चाहिए । पूर्ववर्ती राजाओं की शासन पद्धति का अनुकरण कुछ दिन तक राजा करता रहा । ३५२ (१) यत्किंचनविधायी : राजा स्वेच्छाचारी, उद्दण्ड, अकर्मण्य, उच्छृंखल, निरंकुश तथा अविहित, अकरणीय कर्म करने वाला हो गया था । कल्हण का यही तात्पर्य यहाँ प्रकट होता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३५४ में 'परिजह्रे' का पाठभेद 'परिजह्वे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५५. (१) समदर्शी : योगियों तथा सज्जनों के

३५२ राजतरंगिणी भूत्वा षट्त्रिंशतं वर्षान् शतं चाह्नां विभुर्भूवः । स दीघैरनघाँल्लोकानासदत्सुकृतैः कृती ॥ ३४६ ॥ ३४९. उस पुण्यात्मा ने छत्तीस वर्ष सो दिन पृथ्वी का स्वामी रहकर अत्यधिक सुकृतों के कारण पुण्य लोक प्राप्त किया। युधिष्ठिराभिधानोऽभूदथ राजा तदात्मजः । यः सूक्ष्माक्षतया लोकैः कथितोऽन्धयुधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ युधिष्ठिर : ३५०. अनन्तर युधिष्ठिर नामक उसका पुत्र राजा हुआ, जिसे सूक्ष्माक्ष होने के कारण, लोग अन्ध युधिष्ठिर कहते थे१।


[बायाँ स्तम्भ / Left Column] तक नहीं मिल सका है। सम्भव है कल्हण के समय तक इनके विषय में कुछ साहित्य प्राप्त रहा हो। कल्हण ने स्वयं इनका इतना संक्षिप्त वर्णन किया है कि कुछ अनुमान लगाना कठिन है। (२) उग्रेश : ऋग्वेद में 'उग्रदेव' का उल्लेख मिलता है । (ऋ० १:३६ : १८; पं०ब्रा. १४. ३ : १७; २३.१६ - ११७) इनका पैतृक नाम तैत्तिरीय आरण्यक में राजनि दिया गया है। (तै०- आ०; ५.४-१२ ) यहाँ पर सरल अर्थ यही अभिहित है कि उग्र ने अपने नाम पर उग्रेश शिव की स्थापना की । (३) मातृ चक्र : टिप्पणी मातृचक्र पृ० १८१ ( १.२२ ) द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३४६ में 'शतं' का 'शंति' पाठभेद मिलता है। श्लोक सख्या ३५० में 'सूक्ष्माक्षतया' का पाठभेद 'सूक्ष्माक्षितया' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३५० (१) आइने अकबरी में 'जेवादिस्तर' लिखा है। राज्य काल ४८ वर्ष १० दिन दिया गया है। राजतरंगिणी में इस राजा का राज्य काल नहीं दिया गया है। आइने अकबरी में युधिष्ठिर के शासन के विषय में लिखा है- राजा

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] युधिष्ठिर ने न्यायपूर्ण शासन आरम्भ किया। किन्तु कालान्तर में वह कामी हो गया। वह इतना क्रूर हो गया था कि हिन्दुस्तान तथा तिब्बत के राजाओं ने उसके खिलाफ मिलकर आवाज उठायी। इससे उत्साहित होकर कश्मीर के सरदारों ने विद्रोह किया। राजा को बन्दी-गृह में डाल दिया। श्री स्टीन इस राजा का राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २९६१ वर्ष आठवा मास उनतीसवाँ दिन मानते हैं। प्रो एस. पी. पण्डित यह समय ईसा पूर्व २१७ वर्ष देते हैं। हसन के अनुसार 'फ. २८२८ में उसका (नरेन्द्रा- दित्य का) बेटा राजा अन्ध युधिष्ठिर बाप का जानशीन हुआ। उसकी आँखें बड़ी छोटी थी। यही वजह था कि यह बीनाई पूरी नहीं रखता था। इस बिना पर इसे लोगों ने अन्ध यानी कोर का लकब दिया हुआ था। शुरू-शुरू में अदल व इन्साफ सखावत व रैयत परवरी में मसरूफ रहा। लेकिन बिल आखिर कमीनों और बदकारों की सुहबत में पडकर जुल्म और सख्ती का पेशा अख्तियार कर लिया। हर किस्म के बुरे काम मसलन शराबनोशी ओर बदकारी अपना शआर बना लिया। लोगों की औरतें और बीवियां जबर्दस्ती ले जाने लगा। अकलमन्दो और सल रसीदा लोगों से नफरत अख्तियार करके कमीनों और आ- वारों को अपना मुसाहब बना लिया। बेरहमी और खूंरेजी में कोई कसर बाकी न रखो। यह देखकर