राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४८ राजतरंगिणी अन्यांश्चानीय देशेभ्यः पुण्येभ्यो वश्चिकादिषु । पावनानग्रहारेषु ब्राह्मणान्स न्यरोपयत् ॥ ३४३ ॥ ३४३. उसने पुण्यदेशों¹ से अन्य पवित्र ब्राह्मणों² को लाकर वश्चिक³ आदि अग्रहारों में बसाया। उत्तमो लोकपालोऽयमिति लब्ध प्रशस्तिषु । यः प्राप्तवान्विना यशं चक्षमे न पशुक्षयम् ॥ ३४४ ॥ ३४४. जिसने प्रशस्तियों¹ में यह 'उत्तम लोकपाल है', उपाधि प्राप्त की थी। यश के अतिरिक्त पशु क्षय² यह सहन नहीं कर सकता था। हैं। मैं स्वयं नहीं खाता। सनातनी ब्राह्मण गण आज भी लहसुन प्याज का भक्षण नहीं करते। उन्हें अभक्ष्य माना गया है। वैष्णव तथा वैश्य वर्ग में एक बहुत बड़ा समाज लहसुन तथा प्याज से परहेज करता है। मारवाड़ी भाषा में अबतक प्याज एवं लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता। (२) भूक्षीर वाटिका : वर्तमान बूछो थोर प्राचीन भूक्षीर वाटिका स्थान है। यह पतला भूखण्ड है। शंकराचार्य पर्वत के मूल में उत्तर- पश्चिम स्थान से डल के एक भाग गगरी बल तक फैला है। 'वीर' शब्द संस्कृत वाटिका का अपभ्रंश है। भूका अर्थ भूमि, क्षीर का अर्थ दूध, तथा वाटिका का अर्थ छोटा उद्यान होता है। शुद्ध संस्कृत नाम। सम्भव है यहाँ पर ऐसे वृक्ष हैं जिनके पत्ते या डंठल तोड़ने पर गूलर, वटादि की तरह दूध निकलता रहा हो। (३) खासटा : इस स्थान को सुदर बल के समीप होना चाहिए। निश्चयात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता कि वास्तव में यह स्थान कहाँ पर था। पृष्ठ ११० सुदर बल टिप्पणी द्रष्टव्य है। ३४३ (१) पुण्यदेश : यहाँ पर पुण्यदेश का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है। राजा सम्भवतः कश्मीर को पुण्यदेश इसलिये नहीं समझता था कि वहीं के ब्राह्मणादि आचारभ्रष्ट हो गये थे। कई बार वहांके ब्राह्मणों के सुधार की चेष्ट की गयी। कितनी ही बार ब्राह्मण बाहर से लाकर कश्मीर में बसाये गये परन्तु प्रतीत होता है कालान्तर में आने वाले ब्राह्मण भी स्थानीय ब्राह्मणों से मिलकर आचार का त्याग कर देते थे। अतएव राजा कश्मीर के बाहर 'पुण्यदेश' उत्तरी भारत के तीर्थस्थानों आदि से लाकर ब्राह्मण कश्मीर में बसाये। (२) पवित्र ब्राह्मण : कश्मीर की तुलना में पुण्यदेश के ब्राह्मणों को पवित्र कहा गया है। पवित्र ब्राह्मण का यहाँ अर्थ-विद्वान्, आचार- नियम स्वाध्यायप्रिय, पठन-पाठन-यज्ञादि कर्मकाण्ड में पारंगत ब्राह्मणों से है। (३) वश्चिकफ : यह वर्तमान गांव उच्चो है। रामब्यार नदी की पूर्व दिशा में अधोभाग में है। सन् १८९१ में पं० काशीराम को यहाँ कुछ खण्डित मूर्तियाँ मिली थीं। उनके अनुसार स्थान विशेष प्राचीन महत्व नहीं रखता था। मात्र एक देवस्थान रूप में स्थित था। इसके पूर्व में नदी कुछ दूर पर पड़ेगी। उत्तर में रामब्यार नदी है। पश्चिम में दुरबाग तथा सपनगर है। दक्षिण में अलनी है। यह विजयेश्वर के पश्चिम पड़ता है। ३४४. (१) प्रशस्ति : निःसन्देह गोपादित्य ऐतिहासिक व्यक्ति था। उसके नाम से सम्बन्धित गोपाद्रि पर्वत, गोपकुर (गोपा अग्रहार) तथा अनेक स्थान हैं। शंकराचार्य पर्वत पर स्थित मन्दिर इस राजा का निर्माण था। यहाँ पर,