भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग ३४७ भूक्षीरवाटिकायां यो निर्वास्य लशुनाशिनः । खासटायां व्यधाद्विप्रान् निजाचारविवर्जितान् ॥ ३४२ ॥ ३४२. उसने लहसुनभोजी १ विप्रों को भूक्षीर वाटिका २ तथा निज आचारहीन ब्राह्मणों को खासटा से ३ निर्वासित कर दिया ।

राजतरंगिणी के अनुसार राजा गोपादित्य ने (ईसा पूर्व ३६८-३०८) में इस मन्दिर का निर्माण कराया था । राजा ललितादित्य सन् ७०१-७३७ ई० ने मन्दिर का जीर्णोद्धार, मन्दिर निर्माण के लगभग एक हजार वर्ष पश्चात् कराया था। कश्मीर के बड़शाह जैनुल आवदीन (सन् १४२०-१४७० ई०) ने मन्दिर की छत की मरम्मत करवायी थी। छत भूकम्प के कारण प्रायः नष्ट हो गयी थी। सिख राज्यपाल शेखगुलाम मोहिउद्दीन ने शिखर की ईंटो से मरम्मत करवायी थी। डांगरा राजाओ ने ईंटों के स्थान पर पत्थर का शिखर, जैसा पूर्व मन्दिर का था, बनवा दिया है।

पूर्वकाल में झेलम नदी के सुघादधार घाट से मन्दिर तक सीड़ियां बनी थीं। वे अब नष्ट हो गया हैं। सुना जाता है। मन्दिर की इन सीढ़ियों के पत्थरों से नूरजहाँ ने श्रीनगर में पत्थर मस्जिद का निर्माण कराया है। पत्थर मस्जिद वितस्ता के वाम तट पर स्थित है। यह मुगल स्थापत्य शैली पर बनी है। मस्जिद मे कोई नमाज़ नही पड़ता। मस्जिद का इसलिए त्याग कर दिया गया कि नूरजहा की जूतों की कीमत मात्र मस्जिद निर्माण की कीमत आंकी गयी थी। अतएव वह अपवित्र मानकर त्याग दी गयी। मैने इस मस्जिद को देखा है। मस्जिद मे एक बड़ा अहाता है। सूना पड़ा है। इसमे बच्चे खेलते हैं।

शंकराचार्य पर्वत का नाम तख्त सुलेमान 'बाण भट्ट' का रखा हुआ है।

(२) आर्य देशीय : श्री रणजीत सीताराम पण्डित के अनुसार कल्हण ने यहा गंगा और यमुना के भूखरा्ड को माना है। किन्तु उत्तरी भारतवर्ष को यदि आर्य्यावर्त मान लेते है तो यह शब्द आर्यदेश के अर्थके अधिक समीचीन होगा । कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है गोप या गुपकर में आर्यदेशीय ब्राह्मणों के निवास निमित्त राजा ने अग्रहार दिया था । डललेक के तट पर ब्राह्मणों के आवाद करने का यह प्रथम उदाहरण मिलता है । उक्त विवरण से स्पष्ट प्रकट होता है। कश्मीर के ब्राह्मणो को मान्यता खान-पान की परम्परा न पालन करने कारण समाप्त हो गयी थी। उनके स्थान पूर्ति निमित्त आचारवान ब्राह्मणों को बाहर से लाकर आचार रक्षा निमित्त बसाया गया था। (३) गोपा अग्रहार : गोपा अग्रहार गुपकर ग्राम में स्थित फलवाले बगीचों आदि का स्थान रहा होगा। श्रीनगर में जिस तेजी के साथ आबादी बढ़ रही है, उससे यह भाग भी नष्ट होकर, आबादी तथा मकानों के समूह का रूप ले लेगा। पाठभेद :

  • श्लोकसंख्या ३४२ में 'व्यधाद्वि' का 'व्यथानिव' 'व्ययार्वि', 'बुधान्वि' तथा 'व्यधान्वि' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४२. (१) लहसुनभोजी : मनुस्मृति लहसुन का प्रयोग द्विजों के लिए वर्जित करती है। लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डुं कवकानि च । अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवाणि च। ५५। लहसुन तथा प्याज का भोजन ब्राह्मणों एवं द्विजों के लिये वर्जित माना गया है। उच्च वर्ण के लोग उनका व्यवहार कुछ दिन पूर्व नही करते थे। मेरे घरमे अबतक लहसुन प्याज का प्रवेश नही हो सका