राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ] थो बाइन अपने ट्रेवेल पृष्ठ १०,११ में लिखते है। तख्त-सुलेमान एक पुराना हिन्दू मन्दिर है। यह तेजस्वी सुलेमान का तख्त कहा जाता है। यह प्राकेट दाक्षिणवासी इन्द्रजालिक, जिन्हें प्रत्येक पवित्र मुसल- मान विश्वास करता है कि वह आराम से उस सिंहासनपर आये थे जो दैविस तथा एरिट लेकर आए थे। जिन्हें भगवान् ने सुलेमान का सेवक बना दिया था। श्री डब्लू, वोस्फीहट लिखते हैं—'मैं नहीं जानता कि तख्त सुलेमान नाम क्यों पड़ा। निश्चय रूप से कहा जा सकता है कि बाइबिल का ख्यातिप्राप्त व्यक्ति (सुलेमान) क्या यहाँ आकर पर्वत पर अपना तख्त बनाया था। किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं होता। यह विचित्र बात है कि पूर्व में अपने पवित्र इतिहास से सम्बन्धित व्यक्तियों का नाम जिनसे हम परिचित हैं यहाँ की स्थानीय गाथाओं, साहित्य तथा यथार्थ सच्चाई में मिलते हैं जैसे कि हजरत नूह तथा उसके पुत्र की मजारें फैजाबाद के समीप अयोध्या में हैं। एशिया के इस भाग में दो नामों की प्रसिद्धि इन संज्ञाओं के कारण हुई है। क्यों और किस प्रकार तख्त ए सुलेमान इस ऊँचे पर्वत का सुलेमान के नाम पर नाम पड़ा कहना कठिन है। यहाँ की स्थानीय जन कथाओं में कोई ऐसी कथा नहीं मिली। जिससे मालूम होता कि हज़रत सुलेमान ने यहाँ आसपास आश्चर्यजनक काम किया था। यहाँ के अच्छे मुसलमान कहते हैं कि यहाँपर हजरत सुलेमान ने ठहर कर कश्मीर उपत्यका का जल जिन्नों को आज्ञा देकर निकलवाया था। जिन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने सुलेमान के आधीन कर दिया था। 'हिन्दू लोग इसे सिर-ई-शूर-अर्थात् शिवका शिर कहते हैं ··············अष्टकोणीय चबूतरा पर जो १२ फिट ऊँचा है उसपर ३० फिट ऊँचा कोणीय मन्दिर बना है। इसमें चूने के पत्थर की सीढ़ियाँ पूर्व दिशा में है जो भूमिस्तर से मन्दिर के गर्भ-गृहमें पहुँचाती हैं। चूने के पत्थर पर खूब पालिश की गयी
[दायाँ स्तम्भ] है। यही पत्थर सम्पूर्ण मन्दिर की रचना में लगाया गया है। मन्दिर का गर्भगृह वृत्ताकार अर्थात् गोला है। उसका व्यास १४ फिट है। छत समतल है। यह चार खम्बों पर आधारित है। मध्यमें एक चोंटूंदा अधिष्ठान है। उसके ऊपर काले पत्थर का शिव लिंग है। उससे प्रकट होता है कि इस दिवार के अन्दर विभिन्न समयों में कितने विभिन्न धर्मों का अनुसरण किया गया होगा। मूलतः यह बौद्ध मन्दिर था। कालान्तर में मुसलिम काल में मसजिद बना दिया गया। तदनन्तर हिन्दुओं द्वारा शिव मन्दिर का रूप पहन लिया। पृ०-१०-११ महाराज मैसूर ने मन्दिर के शिखर पर बिजली लगवायी है। यह बिजली रात भर जलती है। उसका प्रकाश कश्मीर उपत्यका के किसी भी भाग में दिखाई देता है। राजा ने बिजली के खर्च के लिए रुपया जमा कर दिया है। उसी से बिजली का खर्च दिया जाता है। रात्रि में मन्दिर पर तथा शिखर पर प्रखर ज्योति जलती है। कश्मीर उपत्यका में वह जैसे भगवान् का स्मरण दिलाती है। भगवान् कश्मीर की उपत्यका की रक्षा दिवा संरक्षण कर रहे हैं। उस रोशनी को देखकर मन को एक प्रकार का आध्यात्मिक संतोष तथा शान्ति मिलती है। मन्दिर के उत्तर-पूर्व एक चबूतरा है। जहाँ सम्भवतः पहले कोई इमारत बनी रही होगी। मन्दिर के उत्तर पार्श्व के समीप एक अलंकृत कमरा चूने के पत्थर का बना है। कमरा ११ फुट वर्गाकार तथा ८ १/२ फुट ऊँचा है। मन्दिर के दक्षिण तरफ ४० फुट दूर पर एक हौज है। वह अलंकृत पत्थर का बना है। यह ११ फुट वर्गाकार और ९ फुट गहरा है। शिखर पर जल की कठिनाई है। पर्वत मूल से आदमी जल लेकर ऊपर आता है। इस हौज में बर्फ तथा वर्षा का जो जल एकत्रित होता है। इससे मन्दिर की पूजा तथा अर्चना होती है।