भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 471

Taking into account the split columns on the page, here is the text line by line.

३५० राजतरंगिणी सूनुर्नरेन्द्रादित्योऽस्य खिखिलान्याभिधोऽभवत् । भूतेश्वरप्रतिष्ठानामक्षयिण्याश्च कारकः ॥ ३४७ ॥ नरेन्द्रादित्य (खिखिल)¹: ३४७. उसका पुत्र नरेन्द्रादित्य उपनाम खिखिल² हुआ । वह भूतेश्वर³ प्रतिष्ठानों और अक्षयिणी⁴ का संस्थापक था । दक्षिण भारत में पश्चिमी समुद्रतट पर है । गोकर्ण उमामहेश्वर, श्री ब्रह्मोश्वर, शंकेतको, श्नोभैरव, को 'दक्षिण काशी' भी कहते है । श्रीक्षेत्र-गोकर्ण थी क्षेत्रपाल, श्रीनरसिंह, श्रीकृष्ण, श्रीकेतको त्रिस्थलो में से एक क्षेत्र है। भास्कर क्षेत्रो में विनायक, श्री सिद्धेश्वर, श्रीमल्लिकर्जुन, श्री चक्रतीर्थ, इसकी गणना की जाती है । श्रो नागेश्वर, श्री मणिनाग, श्रोरामतीर्थ, श्रीकपिल- पौराणिक गाथा है कि महादेव गाय के कर्ण तीर्थ, श्री वैतरणी, श्री सरखती, श्रो सोमतीर्थ, से उत्पन्न हुए थे । जिस स्थान पर गाय के कान से आदि अनेक स्थान कश्मीर के देवस्थानों के समान रूद्र प्रकट हुए थे उस स्थान का नाम 'गोकर्ण' यहाँ बने मिलेंगे । किंवा 'रुद्रयोनि' पड़ गया था। महाप्रलय काल मे स्थान गन्दा है। बहुत गरीबी है। गोकर्ण पृथ्वी जलमग्न हो जायगी तो 'गोकर्णक्षेत्र' का स्थान का लिंग ऊपर निकला नही है। एक छोटा कुण्ड आदर्श सदृश दिखाई पडता रहेगा । अतएव उसको है । जलसे भरा रहता है। उसमे हाथ डालने पर संज्ञा 'वर्णावर्त' उस समय दी जायगी । गोकर्क के एक छोटे लिंग का स्पर्श होता है। कथा है कि दूसरे चारो ओर योजन पर्यन्त भूमि को 'गोकर्णमण्डल' लिंग के नीचे अन्य लिंग है। पार्श्वमे महाबलेश्वर कहा जाता है। की मूर्ति एक उठे स्तम्भ पर है । 'रुद्रभूमि' गोकर्ण को कहते है। यहाँ मरने पर गोकर्ण के मुख्य मन्दिर की परिक्रमा मे आदि- मुक्ति होती है। दिवंगत को शिव का सानिध्य गोकर्ण की मूर्ति भूमिस्तर से नीचे जल में मुझे प्राप्त होता है। मैने गोकर्ण क्षेत्र की यात्रा १२ दिखाई दी । मन्दिर के पृष्ठ भाग में ताम्र गंगा है । अगस्त सन् १९६५ को की थी । स्थान समुद्र यह एक पक्का छोटा कुण्ड है। इसमें अस्थि प्रवाह तटपर है। मन्दिर प्राचीन नही मालूम होता । किया जाता है। जल गंधा है । कुण्ड गन्दा लगा । समुद्र की लहरो के कारण तट कट गया है। पेड की पत्तियां गिर कर पड़ती रहती है । श्मशान से गोकर्ण में जगत्-पूजित आत्मलिंग वैवस्वत मन्व- अस्थिचयन कर यहाँ पर अस्थियां डाल दी जाती है। न्तर के २३वें, त्रेतायुग में शरत् काल कार्तिक बाहर से भी लोग अस्थि लाकर इसमे डालते हैं। शुक्ल प्रतिपद व्यतिपात योग, तुला मास, विशाखा आश्चर्य की बात यह है अस्थियो कुछ ही दिनो नक्षत्र, दिन रविवार, लग्न मीन, के मंगल मुहूर्त में में गलकर जल मे घुल जाती है। यहाँ के जल में स्थापित हुआ था। रावण आत्मलिंग को उखाड़ना रासायनिक पदार्थ कुछ है। जिनके कारण अस्थियाँ चाहता था। किन्तु असफल रहा। यहा महा- गल जाती है। अन्यथा अस्थियाँ जलमे या भूमि में बलेश्वर, महागणपति श्रीबलंकुलेश्वर, श्री ताम्र- सैकड़ों वर्ष पड़ी रहती है । गौरी, श्री वेंकटरमण, श्री भद्रकाली, कालीह्रद, पाठभेद : श्री गङ्गातीर्थ, श्री दुर्गाकुण्ड, श्री शन्नशृंग, श्री कोटि- श्लोकसंख्या ३४७ मे 'कारकः' का 'कारसः' तीर्थ, श्री विष्णुयती, श्री विष्णुपदाभ्यली, श्री रुद्र- पाठभेद मिलता है । पाद, श्री शंकर नारायण, श्री पट्टविनायक, श्री

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास) · पृष्ठ 471, कुल 984 में से · BharatKosha