भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 472

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प्रथम तरंग ३५१ दिव्यानुग्रहभागुग्राभिधौ यस्य गुरुर्व्यधात् । उग्रेशं मातृचक्रं च प्रभावोद्ग्राविग्रहः ॥ ३४८ ॥ ३४८. दैवी शक्ति प्राप्त, प्रभावोत्कृष्ट एवं विग्रह युक्त, उग्र १ नामक उसके गुरु ने उग्रेश २ एवं मातृ ३ चक्र स्थापित किया।


[पादटिप्पणियाँ - बायाँ स्तम्भ]

पादटिप्पणियाँ : ३४७. (१) नरेन्द्रदित्य : आइने अकबरी ने 'नुकुन्द्र' नाम दिया है। उसका राज्यकाल ३६ वर्ष ३ मास १० दिन माना है । कल्हण की गणना के अनुसार स्कीन राज्या- भिषेक का समय लौकिक संवत् २८२५ वर्ष पाँचवाँ मास उन्नीसवें दिन देते हैं। श्री एस. पी. पण्डित समय ईसा पूर्व २५३ वर्ष रखते हैं । हसनके अनुसार अपने बापके मरने के बाद राजा नरेन्द्रदित्य रौनके बख्श सल्तनत हुआ। राजा ३६ वरस हकूमत करके गुजर गया । (२) खिखिल : एक मुद्रा 'देव शाहो 'खिगिल'—अंकित प्राप्त हुई है। इसे नरेन्द्रदित्य प्रथम की मुद्रा कहा जाता है। इस मुद्रा की शैलो इफ्येलाइट शासको अर्थात् हूणों की शैलो की है। वह मुद्रा राजा लपन ( लक्ष्मण ) ( रा० त० ३ : २८३ ) के ढंग की है। एक दूसरी मुद्रा मिलती है उस पर—'श्रीनरेन्द्र'—अंकित है। यह मुद्रा 'किदार' शैली की है। सम्भव है कि यह मुद्रा इसी नाम के बाद में हुए किसी राजा की मुद्रा रही हो । यह मुद्रा सम्भवतः ५वीं ६ठवी शताब्दी की प्रतीत होती है। किन्तु कल्हण के अनुसार ईसा पूर्व २५०-२१४ वर्ष की है। कल्हण के अनुसार खिखिल श्रीनन्द तृतीय के पश्चात् उन्नीसवाँ राजा हुआ था। खिखिल नाम भारतीय नहीं प्रतीत होता अतएव इसे हूण वंशीय मानने की ओर विद्वानों का झुकाव है। किन्तु कल्हण के काल तथा मुद्रा काल में ६ शताब्दियों का अन्तर समस्या उत्पन्न कर देता है । (३) भूतेश्वर : हरमुकुट पर्वत के समीप यह स्थान


[पादटिप्पणियाँ - दायाँ स्तम्भ]

हैं। अशोक के वर्णन में इसका उल्लेख किया जा चुका है। पृष्ठ १४९ तथा टिप्पणी 'भूतेश' पृष्ठ २०१ द्रष्टव्य है । (४) अक्षयिणी : ब्राह्मणो के भोजन निमित्त अक्षयिणी क्षेत्र किंवा सदावर्त है। कश्मीर के पर्वतीय भागो मे इस प्रकार के दानो को 'मच्छिन्या' कहते हैं। श्रीवर ने ( ६:४०८ ) जैनुल आंवदीन बादशाह द्वारा दिये गये एक दान का वर्णन शूरपुर अर्थात् हूरपुर के पास पीर पंतशाल मार्ग पर किया है । यहाँ यात्री बिना किसी भेदभाव के भोजन प्राप्त करते थे। उसने यहाँ 'अन्नसत्र अविच्छिन्ना' शब्द का प्रयोग किया है। अक्षयिणी का अर्थ होता है कि जहाँ सदावर्त अथवा दान निरन्तर किया जाता है। वह इतना होता है कि कभी कमी नहीं पड़ती । कोई हताश होकर लौटता नहीं। अक्षय भाण्डार तुल्य आवश्यकता पूर्ति करता है। अच्छिन्नेनान्नसत्रेण द्विजवेश्वरवासिनाम् । उदरे मेदुरे सिद्धः प्रणामो यत्नतो विभोः ॥ १:५:२१ नासिक की गुफा में तथा अन्य स्थानों पर इस प्रकार के दान के लिए 'अक्षयनिधि' शब्द का प्रयोग किया गया है। जम्मू के रघुनाथ मन्दिर मे यह 'सदावर्त' नाम से प्रसिद्ध है । डोगरा राजाओ के काल में बनिहाल पास तथा झेलम की सड़क वुनयार पर साधु तथा तीर्थ यात्रियों को इस प्रकार का दान दिया जाता था । श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अक्षयिणी को देवी माना है। उन्होंने 'अक्षायिणी देवी के मन्दिर की स्थापना की' इस प्रकार अनुवाद किया है। मैं इसे ठीक मानने में असमर्थ हूँ। (पृष्ठ : ५८३) ३४८ (१) उग्र : इनका उल्लेख वहीं और अभी