भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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३४४ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ] गोपाद्रि गिर, गोपकार, तख्त-ए-सुलेमान, शंकराचार्य पर्वत, ज्येष्ठेश्वर आदि सब एक ही पर्वत के नाम हैं। गुपकर गांव उत्तर-पूर्व पर्वत के मूल में और डल के तट पर है। (रा० त० ८:११०४, १०)। पर्वत श्रीनगर के पूर्व दिशा में है। राजतरंगिणी (१:१२४) से मालूम होता है। अत्यन्त प्राचीनकाल से ज्येष्ठेश्वर शिव की पूजा यहाँ होती रही है। इस समय जेवर में देवस्थान है। वहाँ पूजा होती है। वह इस पर्वत के समीप है। ज्येष्ठेश्वर का जो वर्णन राजा गोपादित्य के सन्दर्भ में किया गया है, वह निसन्देह इसी पवित्र स्थान से सम्बन्ध रखता है। यह वही स्थान है, जहाँ इस समय शंकराचार्य पर्वत पर, शंकर का मन्दिर स्थित है। मन्दिर में इस समय विशाल शिव लिंग स्थापित है। मैं इस स्थान की कई बार यात्रा कर चुका हूँ। श्री फरगुसन ने ठीक ही कहा है 'वर्तमान मन्दिर बहुत बाद का निर्माण है।' (पृष्ठ २८२।) मन्दिर का ऊंचा अधिष्ठान तथा सीढियां, निसन्देह कल्हण द्वारा देखी हुई गोपादित्य के मन्दिर की निर्माण हैं। इस पर्वत पर इस मन्दिर के अतिरिक्त और कोई प्राचीन निर्माण अथवा किसी प्रकार का ध्वंसावशेष नहीं रह गया है। मेरी जानकारी में यहाँ अभी तक कोई प्राचीन वस्तु नहीं मिली है। एक बड़े निर्माण के लिए इस पर्वत पर यही एक उपयुक्त स्थान है। जहां बड़े पैमाने पर कुछ बनाया जा सकता था। ज्येष्ठ का अर्थ सबसे बड़ा होता है। यह पर- मेश्वर के लिये भी प्रयुक्त किया गया है। यह सामगान का एक प्रकार भी है। मलमास, अधिक- मास तथा ज्येष्ठमास तीन वर्ष के पश्चात् पड़ने वाले अधिक चन्द्रमास के लिये प्रयोग किया जाता है। ज्येष्ठा नक्षत्रयुक्त पूर्णमासी अर्थात् ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के लिये भी ज्येष्ठ शब्द का प्रयोग किया


[दायाँ स्तम्भ] गोपाचल ग्वालियर के समीप भी एक पर्वत है। ग्वालियर का एक नाम गोपा है। गोप का प्राचीन अर्थ रक्षक किंवा रक्षा करने वाला होता है। शंकराचार्य मन्दिर का सबसे पुराना फोटो कर्नल कोल की पुस्तक में (पृष्ठ १-८८) छपा है। उस समय (सन् १८८६ ई०) मन्दिर पर पेड़ तथा घास जम गये थे। मन्दिर की मरम्मत नहीं हुई थी। मन्दिर का बाह्य आकार जैसा उस समय था वैसा ही इस समय भी है। मन्दिर श्रीनगर के भूमितल से १००० फुट ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। कोल का कहना है कि परम्प- रागत गाथा के अनुसार यह मन्दिर राजा जालुक ने ईसापूर्व २२०' में निर्माण कराया होगा। मार्शल का मत है कि कश्मीर के अन्य हिन्दू मन्दिरों का जो काल है, वही इस मन्दिर का है। मन्दिरों पर लोग अपना नाम तथा निर्माण काल खुदवा दिया करते हैं। श्री फरगुसन को प्रारम्भ में भ्रम हो गया था। उसने मन्दिर पर हिजरी १०६९ लिखा देखा था। अतएव उन्होंने धारणा बना ली—मन्दिर जहांगीर के काल में बनाया गया था। यह भ्रम है। इसी प्रकार मन्दिर के अन्दर दक्षिण पश्चिम स्तम्भ पर लिखा है। एक साहूकार 'हाजो हुश्ती' ने संवत् ५४ में शिव का निर्माण किया'। उस समय इस्लाम धर्म का उदय नहीं हुआ था। उसी स्तम्भ के नीचे एक जगह लिखा है 'ख्वाजा रुकन वल्द पीर जान ने मन्दिर बनवाया।' इसमें संवत् अथवा हिजरी सन् नहीं दिया गया है। कल्हण के अनुसार गोपादित्य ने मन्दिर का निर्माण ईसा पूर्व ३६८-३०८ वर्ष में किया था। किसी विशेष प्रमाण के अभाव में मूलमन्दिर का निर्माण काल यह मान लिया जा सकता है। राजा अभिनव गुप्त (सन् ६९३-१०१५ ई०) के समय की किंवदंती प्रचलित है। शंकराचार्य के एक शिष्य का यहां आगमन हुआ था। वह वेदान्ती थे। शक्ति में उसका विश्वास नहीं था। एक दिन