राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३४३ ज्येष्ठेश्वरं प्रतिष्ठाप्य गोपाद्रावार्यदेशजाः । गोपाग्रहारान्कृतिना येन स्वीकारिता द्विजः ॥ ३४१ ॥ ३४१. गोपाद्रि पर ज्येष्ठेश्वर¹ की प्रतिष्ठा कर, कृती जिस राजा ने आर्यदेशीय द्विजों से गोप अग्रहारों³ को स्वीकृत कराया । भाल्ये वने गौतद्देशं विश्वामित्रेश्वरं तथा मौनासिकं वसिष्ठेशं भारद्देशं सुरेश्वरम् ॥ 966 : १।६७ स्कन्देश्वरं वशिष्ठेशं पौलस्त्यमपरं तथा । दृष्ट्वा कुमारमेकैकं फलं गोदानजं लभेत् ॥ 997 : १।६८ ॥ (५) शामांगांस : वर्तमान सांगम है। यहाँ पर षड्दस्त कार्त्तिकेय अर्थात् स्कन्द की मूर्ति पांचवीं शताब्दी की मिली है। एक और मूर्ति अर्धनारीश्वर के साथ अवन्तीपुर के ध्वंसावशेष से प्राप्त हुई है। कार्त्तिकेय की पूजा चैत्र में होती थी। यह पूजा कश्मीर के शिशुओं एवं कुमारो के कल्याण हेतु की जाती थी। ३४१ (१) ज्येष्ठेश्वर और गोपाद्रि : गोपा पर्वत शंकराचार्य पर्वत है। गोपा अर्थात् गुपकर ग्राम इस पर्वत तथा डल लेक के मध्य इस समय भी मौजूद है। मुसलमान लोग शंकराचार्य पर्वत को 'तख्त-ए- सुलेमान' कहते हैं। इसी प्रकार साइरेस (कुरु) महान, जिसने मोडिया जीता था तथा जिसकी मृत्यु सन् ५६६ ई० पू० हुई थी, उसकी राजधानी की अधित्यका को भी 'तख्त ए-सुलेमान' कहते हैं। साइरेश का संस्कृत नाम 'कुरु' कहा जाता है। इस महान् सम्राट् की समाधि को मुसलमान लोग 'हजरत सुलेमान' की माता की मसजिद कहते हैं। हजरत सुलेमान मुसलमान नहीं बल्कि यहूदी थे। मुस्लिम धर्म के उत्पन्न होने के हजारों वर्ष पूर्व हुए थे। यहाँ पर वन्ध्या स्त्रियाँ, पुत्र तथा सन्तान निमित्त मन्नतें मानती हैं। फर्गहान के एक बौद्ध स्मारक को भी 'तख्त-ए-सुलेमान' कहा जाता है। शंकराचार्य के वर्तमान मन्दिर का कई बार जीर्णोद्धार किया जा चुका है। अकबर, जहाँगीर और औरंगजेव के समय में यह भग्नावस्था में पड़ा था। इसका अरबी आलेख जिस समय कश्मीर के लोग प्रायः मुसलमान हो चुके थे, उस समय लिखा गया था। बरनियर ने अपने यात्रा वृत्तान्त में लिखा है। यहां एक छोटी मस्जिद थी। औरंगजेब के समय पुनः मन्दिरो के तोड़ने की हवा बह चली थी। उस समय रिवाज हो गया था। जहाँ हिन्दुओं का तीर्थ स्थान या बड़ा मन्दिर होता था, वहां मस्जिद तथा जियारतें बना दी जाती थी। गोपा पर्वत से डल लेक का मनोमुग्धकारी दृश्य दिखाई देता है। मुसलमान इतिहासकार मोइजुद्दीन कहता है 'तख्त-ए-सुलेमान' पर एक मन्दिर अथवा स्तूप बनाया गया था। उसमें प्रचं- लित किंवदन्ती के अनुसार प्रभु 'ईसामसीह' की अस्थियां रखी गयी थी। रफीउद्दीन कहता है 'सिकन्दर वुत शिकन ने इसको नष्ट करवा दिया था।' श्री नारायण कोल के समय मन्दिर मौजूद था। बरनियर ने इसका उल्लेख किया है। फोस्टर इसका उल्लेख नहीं करता। कहता है—'इस पर्वत के दूसरी तरफ एक दूसरा पहाड़ है। वहाँ एक छोटी मस्जिद है। उसमें बगीचा भी है। एक बहुत पुरानी इमारत है। वह एक मूर्ति का मन्दिर प्रतीत होता है।