भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 453

३३६ राजतरंगिणी अथ योगेश्वरी काचिद्भट्टाख्या रजनीमुखे । कृत्वा कान्ताकृतिं काम्यामुपतस्थे विशां पतिम् ॥ ३३१॥ ३३१. किसी समय रजनी मुख¹ काल मे कोई भट्टा नाम्नी योगेश्वरी² कमनीय कान्त आकृति धारण कर विशांपति (राजा)³ के समीप पहुँची। तया मनोहरैस्तैस्तैर्वचनैर्लपितस्मृतिः । स यागोत्सवमाहात्म्यं द्रष्टुं हृष्टो न्यमन्त्रयत ॥ ३३२ ॥ ३३२. अपने मनोहर तन्-तन् वचनों द्वारा नष्ट स्मृति एवं प्रसन्न राजा को यागोत्सव माहात्म्य देखने के लिये, उसने निमन्त्रित किया। पुत्रपौत्रशतोपेतः प्रातस्तत्र ततो गतः । चक्रवर्ती तया निन्ये देवीचक्रोपहारताम् ॥ ३३३ ॥ ३३३. तदुपरान्त, अपने शत पुत्र-पौत्रों सहित प्रातः काल वहाँ गये, चक्रवर्ती को उसने देवी चक्र¹ पर उपहार चढ़ा दिया।


सीताराम पण्डित अनुवाद में ६३ वर्ष १३ दिन देते हैं। किन्तु श्री एस. पी. पण्डित के लेख को ओरनजीत ने परिशिष्ट 'ए' पृष्ठ ५८१ पर उद्धृत किया है। उसके अनुसार राज्य काल केवल ६३ वर्ष आता है। तेरह दिन कम दिया है। कल्हण के पाठ का अनुवाद ही मैने यहाँ दिया है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३३१ में 'दृब्भट्टा' का पाठभेद 'दृट्ठा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३१ (१) रजनीमुख—यहाँ पर रजनीमुख शब्द का प्रयोग कल्हण ने सायंकाल अर्थात् रात्रि के प्रारम्भ काल के लिये किया है। (२) योगेश्वरी : इसका शाब्दिक अर्थ दुर्गा होता है। योग विद्या में प्रवीण मह्या के विशेषण रूप में योगेश्वरी शब्द का यहाँ प्रयोग किया गया है। साधारण योग सम्पन्न स्त्रियों को योगिनी कहते हैं उनमें श्रेष्ठ के लिये विशेषण योगेश्वरी लगाया जाता है—आठ विशेष देवियाँ योगिनी कही गयीं हैं— ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, नारायणी, वाराही, इन्द्राणी चामुंडा तथा महालक्ष्मी। (३) विशांपति : काश्मीर के राज्य संगठन का प्रकार समय समय पर बदलता रहा है। प्रथम इकाई देश थी। उसके पश्चात्, राज्य तत्पश्चात् विश्व का सबसे छोटा इकाई ग्राम था। राजा को यहाँ विशांपति कहा गया है। उसके नीच कर्मों के कारण कल्हण ने उसे राजा किंवा नृपति न कहकर विश्व का स्वामी कहा है। वह उससे बड़ा स्थान उसे नहीं देना चाहता है। विश्र्व तथा विषय का पदलालित्य के कारण यहाँ पर कल्हण ने अनुप्रास स्वरूप प्रयोग किया है। राजा को विषयपति न कहकर विश्वपति कहा है। दोनों क्रमशः मूर्धन्य ष तथा तालव्य श हैं इसके उच्चारण में भेद है। यदि शीघ्रता से कहा जाय तो उनका भेद समझना कठिन हो जाता है। विषय काश्मीर में परगना को कहते हैं। विश्: राज्य का एक प्रकार है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३३२ में 'र्लंपति' का 'ग्लपित' तथा 'म्यमन्त्रयत का' न्यमन्त्रयत् तथा 'न्यसंतयन' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३३ (१) देवीचक्र : मातृ चक्र का उल्लेख टिप्पणी १ : १२२ पृष्ठ पर किया गया है। यहाँ पर