राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३३५ लोकान्तरादिवायातं मेने धर्मं तदा जनः । अभयं च परावृत्तं प्रवासाद्गहनादिव ॥ ३२८ ॥ ३२८. उस समय लोग धर्म १ को लोकान्तर से आया तथा अभय २ को चिर प्रवास से परावृत्त मानते थे । स वकेशं वकश्वभ्रे वकवत्यापगां तथा । कृत्या पुरं परार्ध्यश्रीर्लवणोत्साभिधं व्यधात् ॥ ३२६ ॥ ३२६. उस अतुल श्री सम्पन्न राजा ने वकश्वभ्र में वकेश १ तथा वकावती आपगा २ का निर्माण करके लवणोत्स ३ नगर बनवाया । तत्र त्रिषष्टिर्वर्षाणां सत्रयोदशवासरा । अत्यवाह्यत भूपेन तेन पृथ्वीं प्रशासता ॥३३० ॥ ३३०. उस राजा ने वहाँ पृथ्वी का शासन करते १ तिरसठ वर्ष तेरह दिन व्यतीत किया । १ ३२८ (१) धर्म का अर्थ यहाँ राज्य के विधि से है । जिसका आज कल प्रचलित शब्द कानून है । (२) अभय : शासन का फल अभय है । अभय उस समय जनता मे होता है, जब शासन सुव्यवस्थित होता है। राजदण्ड का भय अवां- च्छनीय तत्त्वो को नियन्त्रण में रखता है । जनता में आन्तरिक तथा बाह्य दोनो प्रकार के भय का अभाव हो जाता है । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२९ में 'वकेशं' का 'वकेशे' तथा 'कवश्वभ्रे' का पाठभेद 'वकः श्वभ्रे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३२९ (१) वकेश तथा वकश्वभ्र : इन दोनों स्थानों का पता अभी तक नहीं चला है। कुछ स्थान मुझे बताये गये किन्तु वे भ्रामक है । ३२९ (२) वकावती आपगा : कल्हण न आपगा शब्द का यहाँ प्रयोग किया है । जिसका अर्थ नदी, सरित्, तरंगिणी, शैवालिनी, तटिनी, किंवा सरिता होता है। आपगेय का अर्थ नदी से उत्पन्न नहरादि होता है। यहाँ आपगा का अर्थ नहर माना जा सकता है । (३) लवणोत्स : श्रीनगर से भारत आने वाले मार्ग पर यह स्थान स्थित है । ( रा० त० ६:४६, ५७; ७:७६२, ७:१५३७, १६५८) । श्रीनगर से पूर्व काल में एक ही पड़ाव में लवणोत्स पहुँचा जा सकता था । पामपुर या पद्मपुर मार्ग में पड़ता था। विजये- श्वर के घेरा के सन्दर्भ में ( रा० त० ७:१५६७ तथा १६५८ ) लवणोत्स का वर्णन कल्हण ने किया है । उससे प्रतीत होता है । विजयेश्वर तथा लवणोत्स में अधिक फासला नहीं था । श्रीनगर में बाहर से आने वाली एक सड़क पर लवणोत्स के होने का उल्लेख है । (रा० त० ५६,५७) । लवणोत्स वास्तव में किस स्थान पर था, अभी तक निश्चय नहीं हो सका है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३० में 'वासरा' का 'वासराम्' 'अत्यवाह्यत' का 'अभ्यवाह्यत' तथा 'अभ्यनाह्यत' और 'प्रशासता' का पाठभेद 'प्रशासता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३० (१) राज्यकाल : राजतरंगिणी राज्य काल ६३ वर्ष तेरह दिन स्पष्ट देती है । श्री रणजोत