राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ राजतरंगिणी तत्रापि पूर्वसंस्कारादुक्तत्रासं दधे जनः। श्मशानविहिते लोलावेश्मनीय नृपास्पदे ॥ ३२६ ॥ ३२६. श्मशान में बने लोलावेश्म सदृश पूर्व संस्कार के कारण उसके सिंहासन के सम्मुख भी लोग उक्त त्रास की आशंका से भय त्रस्त रहते थे। अतिसंतापदाज्जातं स जनाह्लादकोऽभवत् । जलौघा जलदश्यामाच्चापात्ययदिनादिव ॥ ३२७ ॥ ३२७. अति संतापदायी से उत्पन्न१ यह जन आल्हादक, उसी प्रकार हुआ, जैसे जलद द्वारा श्याम ग्रीष्मान्त दिन से उत्पन्न वृष्टि।
पर इसके आशनाओ और क़रीबी रिश्तेदारों समेत जय़ाफ़त पर ले गयी थी। इस औरत ने जादू के ज़ोर से उन तमाम को मार डाला। सिर्फ़ एक लड़का खिसो नन्द नाम का ज़िन्दा रहा। मुद्दत हुकूमत बासठ बरस ९ महीने।' (पृष्ठ ४९)। (२) पौरों द्वारा राज्याभिषेक : कल्हण इस स्थान पर नागरिकों द्वारा राजा चुनने की बात करता है। मालूम होता है कि मिहिरकुल के पुत्रों से किसी सदाचारी पुत्र को लोगों ने राजा बनाने का निश्चय कर उसे राजा बनाया। अन्यथा कल्हण यहाँ पर केवल यही लिखता कि मिहिरकुल का पुत्र उसके पश्चात् राजा हुआ। काश्मीर में प्रायः राजा का निर्वाचन प्राचीन काल में होता रहा है। राजतरंगिणी में वर्णन आता है कि यशस्कर ब्राह्मण को काश्मीर की परिषद् ने राजा चुना था। (रा० त० ५ : ४६९, ४७७)। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२६ में 'दुरुन्त्रासं' का 'मुक्तत्रास' 'दुक्ता त्रास' 'मुक्ता सन्द', मुक्त लासं', 'दुत्त्रांसं स' तथा दुरुन्त्रात्रासं' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३२६ (१) नृपास्पद : यहाँ कल्हण ने सिंहा- सन नहीं 'नृपास्पद' शब्द का प्रयोग किया है। श्री स्तोम तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित आदि ने सिंहासन ही 'नृपास्पद' का अर्थ लगाया है। नृप+आस्पद मिलकर नृपास्पद शब्द बना है। नृप का अर्थ राजा और आस्पद का अर्थ स्थान, अधिष्ठान, इत्यादि होता है। यहाँ राजस्थान तथा राजा के बैठने की जगह अर्थात् अधिष्ठान भी हो सकता है। यहाँ पर सिंहासन की अपेक्षा राजा के स्थान करना अथवा उनके बैठकों के आसपास अर्थ अधिक कल्हण के समीप होगा। नृपास्पद शब्द का भावार्थ सिंहासन में आ जाता है। किन्तु यह शाब्दिक अर्थ के अधिक समीप नहीं है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२७ में 'अति' का 'अवि'; 'जातः' का 'जाताः', 'जनाह्लादको' का 'जनाः ह्लादको' तथा 'मात्तपा' का 'मोत्तापा', 'मातापा' और 'भात्तापा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३२७ (१) संतापदायी : कल्हण यहाँ पर दूसरा उदाहरण संतापदायी राजा से उत्पन्न उत्तम तथा जन आह्लादक पुत्र का देता है। पहला उदा- हरण उसने नृशंस नर के पुत्र सिद्ध का दिया है, यहाँ दूसरा का उदाहरण भूलोकभैरव मिहिरकुल के पुत्र बक का देता है।