भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग. ३३३ एवं क्षुद्रोऽपि यद्राजा संभूय न हतो जनैः । तत्कर्म कारयद्भिस्तद्दैवतैरथ रक्षितः ॥ ३२४ ॥ ३२४. क्षुद्र होते हुए भी उस राजा की प्रजा ने विप्लव द्वारा हत्या नहीं की क्योंकि वह उन्हीं देवताओं द्वारा रक्षित था, जिनकी प्रेरणा से उसने उन कर्मों को किया था। प्रजापुण्योदयैस्तीव्रैश्चिरात्तस्मिन्द्ययं गते । बकस्तत्प्रभवः पौरैः सदाचारोऽभ्यषिच्यत ॥ ३२५ ॥ बकः ३२५. प्रजा के तीव्र पुण्योदय के कारण उसके मरने पर, उसके पुत्र सदाचारी बक का पौर जनों ने अभिषेक किया । ३२४ (१) देवता : कल्हण यहाँ दैव सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। भाग्यवादी दैव में विश्वास करते हैं। उनका विश्वास है। सब कुछ दैवी प्रेरणा से होता है। मनुष्य केवल निमित्त मात्र है। साधन है। उसकी गतिविधियां पूर्व से ही सुनिश्चित रहती हैं। फलित ज्योतिष सिद्धान्त इसका सबसे बड़ा समर्थक है। यदि बातें पूर्व से ही सुनिश्चित न होतीं तो पचासों वर्ष पूर्व जन्म- कुण्डली में लिखी अथवा वर्षफल, जन्मफल की कही फलगणना और भविष्य की घटनायें किस प्रकार सत्य उतरतीं ? भाग्य एवं कर्म का विवाद बहुत पुराना है। आगे न बढ़कर यहाँ इतना ही लिखना अलम् होगा कि कल्हण ने मिहिरकुल के क्रूर कर्मों का प्रेरक दैव को ही माना है। जिसकी प्रेरणा से उसने क्रूर कर्मों को किया था उन्हींकी प्रेरणा से उसकी रक्षा भी हुई। जनता उसकी नृशंसताओं तथा उत्पीड़न से त्रस्त होने पर भी राजविद्रोह नहीं कर सकी। वह अछूता बच गया। उसकी हत्या करने का किसी ने प्रयास नहीं किया। कारण एकमात्र कल्हण यही देता है। जो प्रेरक शक्ति उसकी नृशंसताओं के लिए उत्तरदायी थी, उसी ने उसकी रक्षा की। जनता में विद्रोह, विप्लव की भावना एवं विचार उत्पन्न नहीं होने दिया। कवि दण्डी ने राजाओं के सम्बन्ध में दैवी शक्ति के विषय में 'दशकुमारचरितम्' में कहा है—"मदीयैर्विश्वास्य- तमैः पुरुषैः प्रभूतों।" (उपसंहार : १) पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२४ में 'बकस्त' का पाठभेद 'एकस्त' मिलता है। 'ए' तथा 'व' का भ्रम शारदा लिपि के प्रयोग के कारण हो गया है। पादटिप्पणियाँ : ३२५ (१) आइने अकबरी ने नाम बेक तथा उसका राज्यकाल ६३ वर्ष १३ दिन दिया है। श्री स्टीन के अनुसार लौकिक वर्ष २४४२ के चौथे मास में उसने राज्यारोहण किया था। श्री एस० वी० पण्डित ने यह समय ईशा पूर्व ६३७ वर्ष रखा है। हसन कहता है—'राजा बकने बाप के मरने के बाद क० २४०९ मे हुकूमत की। दुलहिन अदब व इन्साफ के जेवर से जैव व जीनत देनेवाला बना। बकाशुर के मुकाम पर अपने नाम पर एक स्वामी का मन्दिर निहायत उमदगी से तामीर किया। इसी तरह एक नहर अपने नाम खर्च कसीर से खुदवायी। शहर पूंछ उसीका आबाद किया हुआ है। चारो तरफ इसके इर्दगिर्द ऊंचे- ऊंचे पहाड़ हैं। इसके जमाने में एक जोगी औरत भटका नाम को पैदा हो गयी। उसके हुस्न व- जमाल को देखकर राजा का दिल बेकाबू हो गया। वह जादूगरनी एक दिन राजा को कुरबानी की रस्म