राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 440, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंदरस तथा लद्दाख के ऊँचे पर्वत भोट्ट तथा काश्मीर के मध्य जलच्छाया बनाता था । श्री जोनराज ने द्वितीय राजतरंगिणी में भोट्टों का उल्लेख किया है । कल्हण वर्णित भोट्ट यही लोग थे । धनाम्बु प्राप्य भोट्टेभ्यः कश्मीरजनथिक्रयान् । गञ्जेन्नाशाः व्यधात्सर्वास्तदा रिञ्चनयारिदः ॥१५८ भोट्टांल्लहरकोटान्तः पट्टविक्रय कौतुकान् । प्रत्यहं वचनोद्यौगै रिञ्चनोऽप्यभिसृष्टवान् ॥ १६७॥ ✕ ✕ ✕ स्वदेशे मन्त्रिणोस्तस्य कोटभट्टोदयधियोः । समरेषु भरश्वासीच्छङ्ग्रडामरलौल्योः ॥ ३९९ ॥ ✕ ✕ ✕ केवलं हृदयं शून्यं भोट्टानां नाभवत्तदा । भूमिपालभयावेशात् कोपोऽपि चिरसञ्चितः ॥८२५॥ श्रीवर ने तृतीय अर्थात् जोनराज तरङ्गिणी में भोट्टो का उल्लेख किया हैं । अथाशङ्क्या नृपः पापं तद्बधात् कतिचिद्दिनैः । बहिर्निष्कासयामास भुट्टमार्गेण तं सुतम् ॥१:७१॥ ✕ ✕ ✕ कालेनादमखानेऽथ भुट्टान् जित्वा समागते । हाजियरानेऽकरोद्यात्राः लोहराद्रौ नृपाज्ञया ॥१:८२॥ ✕ ✕ ✕ पित्र्याः पैतामहा वापि चिरुद्धा बन्धनेऽवसन् । भुट्टदेशं धिया तस्य तेषां निष्कासनं व्यधात् ॥३:३२ सम्मोह तन्त्र में भोट देश का उल्लेख किया गया है : ऐराकमोटांस्तथाचीन ( ना ) महाचीनस्तथैव च । नेपाल( ज्ञः ) शीलहट्टश्च, गौडकोशलमगधाः ॥ —शक्ति संगम तन्त्र ३:७:३३ काश्मीरं तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे । भोटान्तदेशो देवि ऐराकः परिकीर्त्तितः ॥ ३६ ॥ उक्त उल्लेखों से भोट देश का महाचीन, नेपाल, काश्मीर, कामरूप ऐराक के समीप वर्णन किया है। काश्मीर से कामरूप अर्थात् आसाम तक यह अंचल लम्बा था । मानसरोवर के दक्षिण था । इस प्रकार प्राचीन भोट्ट देश की सीमा उत्तर में मानसरोवर, दक्षिण में नेपाल, पूर्व में कामरूप किंवा आसाम तथा पश्चिम मे काश्मीर था । वर्तमान तिब्बत का यह दक्षिणी भाग था । वर्तमान भूटान सिक्किम तथा तिब्बत का यह दक्षिणी भाग जो मानसरोवर के दक्षिण में पड़ता था, भोट देश में सम्मिलित समझा गया था। तिब्बती लोगो के लिए भोट्ट, भोटिया तथा भोट शब्द का प्रयोग किया गया है । कल्हण ने 'भुट्टराष्ट्राध्वन' भोट्ट देश जाने वाले मार्ग जोजिला पास का नाम दिया है । (रा० त० ८:२८८७) (३) म्लेच्छ : यह सम्भवतः हूणों के लिये प्रयुक्त किया गया है जो सिन्धु महानद के उस पार रहते थे । किन्तु म्लेच्छ शब्द का रूप तथा उससे सम्बन्धित होने वाले लोगो की परिभाषा समय-समय पर बदलती रही है । मुद्राराक्षस अंक प्रथम (१:२) मे चाणक्य कहता है—'यथा तस्य म्लेच्छराजबलस्य मध्यात् प्रधानतमाः पञ्च राजानः परया भक्त्या राक्षरामनुवर्त्तन्ते । ते यथा— कौलूतश्चित्रवर्मा मलयनरपतिः सिंहनादो नृसिंहः काश्मीरः पुष्कराक्षः क्षतरिपुमहिमो सैन्धवः सिन्धुषेणः। मेघाक्षः पञ्चमोऽस्मिन् पृथुतुरगबलः पारसीकाधिराजो म्लेच्छ राज मलयकेतु की सेना के पाँच प्रमुख राजगण राक्षस के बड़े भक्त तथा अनुयायी थे । उनका नाम— कुलूतराज चित्रवर्मा, मलयनरेश सिहनाद, काश्मीर के राजा पुष्कराक्ष, सिन्धु- देशाधिपति सिन्धुषेण, पारसीकाधिराज मेघाक्ष था । राक्षस छठवें अंक में मलयकेतु को म्लेच्छ कहता है:—