भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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३२२ राजतरंगिणी इत्यूचुर्ये मते तेषां स एव परिहारदः । खण्डयन्वीतघृणतामग्रहारादिकर्मभिः ॥ ३११ ॥ ३११. जो लोग इस प्रकार कहते थे, उनके मन मे था । परिहार देने वाले, उसी राजा ने अपनी निर्दयता को, अग्रहारादि कर्मों द्वारा खण्डित कर दिया था । आक्रान्ते दारदैर्भाट्टैर्म्लेंच्छैरशुचिकर्मभि । विनष्टधर्मे देशेऽस्मिन्पुण्याचारप्रवर्तनम् ॥ ३१२ ॥ ३१२. दरदों, १ भोट्टों, २ म्लेच्छों ३ तथा अन्य अशुचि कर्मों द्वारा आक्रान्त इस विनष्टधर्म देश मे उसने पुण्याचार का प्रवर्तन किया । गिर गया उसे कपाल मोचन तीर्थ कहते हैं । ( शिव० शत० ८ तथा स्कन्ध पुराण ३:१:२४) । भैरवी यातना काशी में एक प्रचलित शब्द है। काशी में मृत व्यक्ति को भैरव दो घड़ी में यातना देकर उसे मुक्ति दे देते हैं । इसी के आधार पर कहा जाता है कि काशी मे मरने से मुक्ति होती है । कल्हण ने भू-लोक भैरव मिहिरकुल को कहा है। वह इतना भयंकर था कि काल स्वरूप भैरव तुल्य था । इस भूमि का अर्थात् मानव रूप यह भैरव था। पाठभेद : श्लोक संख्या ३१० में 'गगना' का पाठभेद 'गखना' मिलता है । ३१०. (१) भारती : इसका शाब्दिक अर्थ सरस्वती, वाणी, तथा वाणी की अधिष्ठात्री है। यहाँ पर कल्हणने आकाश वाणी के अर्थ में प्रयोग किया है। वह वाणी जो सुनाई पड़ती है । परन्तु कहने वाला दिखाई नही पड़ता । ३११. (१) खण्डित : दान की महिमा का वर्णन कल्हण यहाँ करता है । दान के द्वारा मिहिर- कुल के नृशंस एवं निर्दयता पूर्ण कार्यों के दोषों किंवा पापो का मोचन हो गया था। यदि मिहिरकुल ने क्रूरता की तो उसने उपकार भो किया था । कल्हण उसके गुण एवं अवगुण दोनों चरित्रो का यहाँ चित्रण करता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३१२ में 'भौट्टै' का पाठभेद 'भोट्टै' तथा 'भट्टै' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३१२. (१) दरद : कल्हण वर्णित दरद जाति आधुनिक दरद है । ये आर्य जातीय है। प्राचीन यूनानी लोगों को उनका ज्ञान था। वे इस समय भी सिंधु नदी के पश्चिम चित्राल और यागीन से गिलगिट, चिलास, गुंजी तथा कृष्णगंगा की उपत्यका में रहते हैं। उनका निवास स्थान काश्मीर के उत्तर दिशा मे है। (रा० त० ७:११७१ तथा ८:२७०९) दरद के कुछ ग्रामो में विचित्र प्रथा है । धर्म परिवर्तन बहुत होता रहता है । बौद्ध माता-पिता का पुत्र मुसलमान और मुसलमान माता- पिता का पुत्र बौद्ध धर्मावलम्बी हो जाता है। इस ओर के दरदों में किसी भी धर्म के प्रति विशेष आस्था नहीं है । यूनानी इतिहास लेखक हिरोडोट्स के समय से आज तक दरदों के निवास स्थानों में सम्भवतः कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यह कश्मीर की उपत्यका के उत्तरीय पर्वत माला में सुदूर पड़ता है। (२) भोट्ट : तिब्बत वंशीय जाति है। कश्मीर के पूर्व तथा पूर्व-उत्तर अर्थात् वर्तमान काश्मीर के पर्वतीय क्षेत्र लद्दाख पास तथा कुछ स्कर्दू में निवास करते हैं । जो जिला पास (रा० त० ८:२८८६) के वर्णन से मालूम होता है कि