राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३२३ दरस तथा लद्दाख के ऊँचे पर्वत भोट्ट तथा काश्मीर के मध्य जलच्छाया बनाता था । श्री जोनराज ने द्वितीय राजतरंगिणी में भोट्टों का उल्लेख किया है । कल्हण वर्णित भोट्ट यही लोग थे । धनाम्बु प्राप्य भौट्टेभ्यः कश्मीरजनविक्रयात् । गज्जंन्नाशाः प्यधात्सर्वांस्तदा रिञ्चनवारिदः ॥१५८ भौट्टांल्लहरकोट्टान्तः पट्टचिक्यकौतुकान् । प्रत्यहं वचनोद्योगै रिञ्चनोऽपविसृष्टवान् ॥ १६७॥ ✕ ✕ ✕ स्वदेशे मन्त्रिणोस्तस्य कोट्टभट्टोदयश्रियः । समरेषु भरंवासीच्चन्द्रडामरलौलयोः ॥ ३९९ ॥ ✕ ✕ ✕ केवलं हृदयं शून्यं भौट्टानां नाभवत्तदा । भूमिपालभयावेशात् कोपोऽपि चिरमज्जितः ॥८२५॥ श्रीवर ने तृतीय अर्थात् जोनराज तरंगिणी में भोट्टों का उल्लेख किया है । अथाशङ्क्या नृपः पापं शत्रूघात् कतिचिद्दिनैः । बहिर्निष्कासयामास भुट्टमार्गेण तं सुतम् ॥१:७१॥ ✕ ✕ ✕ कालेनादमखानेऽथ भुट्टान् जित्वा समागते । हाजियखानोऽकरोद्यात्राः लोहराद्रौ नृपाज्ञया ॥३:८२॥ ✕ ✕ ✕ पित्र्याः पैतामहा वापि विरुद्धा बन्धनेऽवसन् । भुट्टदेशं धिया तस्य तेषां निष्कासनं व्यधात् ॥३:३२ सम्मोह तन्त्र में भोट देश का उल्लेख किया गया है : ऐराकभोटीतचीन (मा) महाचीनस्तथैव च । नेपाल(लः) शीलहट्टश्च, गौडकोशलमगधाः ॥ -शक्ति संगम तन्त्र ३:७:३३ काश्मीरं तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे । भोटान्तदेशो देवि ऐराकः परिकीर्तितः ॥ ३३ ॥ उक्त उल्लेखों से भोट देश का महाचीन, नेपाल, काश्मीर, कामरूप ऐराक के समीप वर्णन किया है । काश्मीर से कामरूप अर्थात् आसाम तक यह अंचल लम्बा था । मानसरोवर के दक्षिण था । इस प्रकार प्राचीन भोट्ट देश की सीमा उत्तर में मानसरोवर, दक्षिण में नेपाल, पूर्व में कामरूप किंवा आसाम तथा पश्चिम में काश्मीर था । वर्तमान तिब्बत का यह दक्षिणी भाग था । वर्तमान भूटान सिक्किम तथा तिब्बत का वह दक्षिणी भाग जो मानसरोवर के दक्षिण में पड़ता था, भोट देश में सम्मिलित समझा गया था । तिब्बती लोगों के लिए भोट्ट, भोटिया तथा भोट शब्द का प्रयोग किया गया है । कल्हण ने 'भुट्टराष्ट्राधवन' भोट्ट देश जाने वाले मार्ग जोजिला पास का नाम दिया है । (रा० त० ८:२८८७) (३) म्लेच्छ : यह सम्भवतः हूणों के लिये प्रयुक्त किया गया है जो सिन्धु महानद के उस पार रहते थे । किन्तु म्लेच्छ शब्द का रूप तथा उससे सम्बन्धित होने वाले लोगों की परिभाषा समय-समय पर बदलती रही है । मुद्राराक्षस अंक प्रथम (१:२) में चाणक्य कहता है-'यथा तस्य म्लेच्छराजबलस्य मध्यात् प्रधानतमाः पञ्च राजान' परया भक्त्या राक्षसमनुवर्तन्ते । ते यथा- कौलूतश्चित्रवर्मा मलयनरपतिः सिंहनादो नृसिंहः काश्मीरः पुष्कराक्षः क्षतरिपुमहिमो सैन्धवः सिन्धुषेणः। मेघाक्षः पञ्चमोऽस्मिन् पृथुतुरगबलः पारसीकाधिराजो म्लेच्छ राज मलयकेतु की सेना के पाँच प्रमुख राजगण राक्षस के बड़े भक्त तथा अनुयायी थे । उनका नाम- कुलूतराज चित्रवर्मा, मलयनरेश सिंहनाद, काश्मीर के राजा पुष्कराक्ष, सिन्धु- देशाधिपति सिन्धुषेण, पारसीकाधिराज मेघाक्ष था । राक्षस छठवें अंक में मलयकेतु को म्लेच्छ कहता हैः-