भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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३२४ राजतरंगिणी आर्यदेश्यान्स संस्थाप्य व्यतनोद्दारुणं तपः । संकल्प्य स्ववपुर्दाहं प्रायश्चित्तक्रियां व्यधात् ॥३१३॥ ३१३. आर्य देशीय१ जनों को संस्थापित कर, उसने दारुण तपस्या२ की । शरीर दाह३ का संकल्प करके प्रायश्चित्त कर्म किया । मलयकेतु पर्वतीय राजकुमार है । उसके साथी धर्माचरण त्यागी, निर्दय, परपीड़क, चण्ड, नित्य कुलूत आदि राजा पर्वतीय हैं। हिंसक तथा अविवेकी व्यक्ति म्लेच्छ है । कल्हण का वर्णन स्पष्ट इस ओर संकेत करता है 'मृच्छकटिकम्' नाटक में म्लेच्छों को अशुद्ध कि सीमा पर रहने वाले म्लेच्छादि काश्मीर में भाषा भाषी कहा गया है । उनका उच्चारण ठीक प्रवेश कर पुराने आचार को नष्ट कर दिये थे । म्लेच्छ नहीं होता था । (अंक ६) एवं काश्मीरियों का सम्पर्क इससे प्रकट होता है । पाठभेदः म्लेच्छ शब्द का अर्थ शुक्रनीति के समय घोर श्लोक संख्या ३१३ में 'देश्यान्' का पाठभेद रूप ले लिया था । आचार भ्रष्ट निकृष्ट तथा हेय 'देशान्' मिलता है । व्यक्तियों तथा वर्ग के लिये म्लेच्छ शब्द प्रयुक्त होने पादटिप्पणियाँ लगा था । समय के साथ शब्द के अर्थ तथा भाव ३१३ (१) आर्य देशीय : आर्यदेशीय ब्राह्मणों में परिवर्तन होता है । म्लेच्छ शब्द इसका एक के कश्मीर में बसाने का उल्लेख मिलता है । परन्तु उदाहरण है । 'आर्यदेशीय जनों' का यहाँ उल्लेख किया गया है । न जात्या ब्राह्मणश्चात्र क्षत्रियो वैश्य एव न । मिहिरकुल, प्रतीत होता है, आर्यदेश अर्थात् कश्मीर न शूद्रो न च वै म्लेच्छो भेदिता गुणकर्मभिः ॥१:३८॥ के बाहर पंजाब आदि भारतीय भागों से सभी श्रेणियों जन्मना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और म्लेच्छ तथा वर्गों के जनों को लाकर कश्मीर में आबाद नहीं होते किन्तु गुण एवं कर्म के भेद के अनुसार किया था । होते हैं । (२) दारुण तपस्या : प्रतीत होता है, मिहिरकुल राजा को भी म्लेच्छ कहा गया है यदि वह योगी था । उसने दारुण तपस्या की थी । उसकी अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करता- तपस्या इतनी उग्र थी कि उसने स्वेच्छया आग में असत्यवादिनं गूढ़चारं न चैश्च शास्ति यः । प्रवेश किया । स यो म्लेच्छ इत्युक्तः प्रजाप्राणधनापहः ॥ १:१३६॥ राजा सिद्ध के प्रसंग में लिखा जा चुका है। असत्यवादी, गूढ़चारी का जो राजा शासन नहीं कि वह भी योगी था । उसने भी तपस्या की । करता वह प्रजा के प्राण एवं धन का अपहर्त्ता तत्पश्चात् सप्तलोक प्राण विसर्जन किया । म्लेच्छ है । यहाँ प्राण विसर्जन की प्रक्रिया अत्यन्त क्रूर तथा म्लेच्छ की एक और परिभाषा शुक्रनीति रोमांचित करने वाली है । मिहिरकुल का यह करती है- चरित्र वर्णन उसे योगियों की श्रेणी में रख देता है । त्यक्तस्वधर्माचरणा निर्घृणाः परपीड़काः । उसे सांसारिक माया व्याप्त नहीं थी । श्लोक संख्या चण्डाश्च हिंसका नित्यं म्लेच्छास्ते ह्यस्यविवेकिनः। ३१५ के वर्णन से प्रकट होता है । उसने छुरी,