भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग ३२५ अत एवाऽग्रहाराणां सहस्रं प्रत्यपादयत् । गान्धारदेशजातेभ्यो द्विजेभ्यो विजये श्वरे ॥३१४॥ ३१४. अतएव विजयेश्वर में उसने एक सहस्र अग्रहार गान्धार देशीय द्विजों^१ को दिया । क्षुरखङ्गासिधेन्वादिपूर्णे यः फलके तदा । वह्निप्रदीप्ते सहसा पर्यन्ते स्वां तनुं जहौ ॥३१५॥ ३१५. तत्पश्चात् उसने सहसा क्षुर, खड्ग, असिधेनु आदि से पूर्ण वह्नि प्रदीप्त फलक पर अपने शरीर^३ को डाल दिया ।

कृपाण, असि आदि जड़ित तपे तख्त पर अपना शरीर डाल दिया था । उसका शरीर गर्म तीक्ष्ण धार वाले वस्तुओ से छिद गया । गर्म लोहा घावो में घुस गया । उसे दारुण कष्ट दिया । इस प्रकार वह फलक पर जलता, घावों से छिदता, प्राण विसर्जन किया । यह कार्य साधारण नही है । उसके इस कार्य से प्रकट होता है । वह नृशंस होते भी कितना व्यक्तित्व सम्पन्न, प्रतिभाशाली, उग्र तेजस्वी पुरुष था । पादटिप्पणी : ३१४ (१) गान्धारदेशीय द्विज : काश्मीर के ब्राह्मणों से, प्रतीत होता है, मिहिरकुल अप्रसन्न था । अपनी इस अप्रसन्नता के प्रतीक स्वरूप, उसने द्विजाधम गान्धार ब्राह्मणोंको, जो कि आचार-हीन महाभारत काल से ही कहे जाते थे, प्रश्रय दिया । उन्हें दान देकर उनकी मर्यादा ऊपर उठाने का प्रयास किया । विजयेश्वर के उल्लेख से मालूम होता है । उन दिनों वह स्थान ब्राह्मणो तथा पुण्यकर्मियो का केन्द्र हो गया था । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३१५ मे 'धेन्वा' का 'धन्वादि' तथा 'क्षुर' का 'खर' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियां : ३१५ ( १ ) श्लोक ३१२-३१६ : एक मत है कि श्लोक ३१२ से ३१६ तक 'कुलकम्' है । श्री स्टीन ने ३१२ से ३१६ तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने ३१२ से ३१७ तक इन्हें 'कुलकम्' मानकर उनका एक साथ अनुवाद किया है । मैने यहाँ श्लोकों के प्रत्येक पदों को भिन्न मानकर अनुवाद किया है । यदि सबका एक साथ 'कुलकम्' समझ-कर अनुवाद किया जाय तो अनुवाद सरल तथा साहित्यिक दृष्टि से अच्छा और भाव प्रधान होगा । परन्तु प्रत्येक श्लोक के शाब्दिक अर्थो का तात्पर्य समझने में कठिनाई होगी । (२) असिधेनु : यहाँ पर छुरी के अर्थ में प्रयोग किया गया है । छोटी छुरी आदि को असि-धेनु कहते हैं । (३) शरीर : कल्हण ने यहाँ तीसरे उदाहरण से योग, साधन एवं मनोबल के कारण स्वतः शरीर त्यागने का वर्णन किया है। इसके पूर्व जलोक ने सपत्नीक तपस्या द्वारा तथा सिद्ध ने अपनी शिद्धता द्वारा शरीर त्याग किया था । मिहिरकुल ने अपने अद्भुत मनोबल के द्वारा शरीर त्याग किया । कल्हण ने यह तीसरा प्रकार स्वेच्छया शरीर त्याग का उपस्थित किया है । स्वतः आत्मदाह से प्राण विसर्जन करना प्राचीन काल से प्रचलित था । परन्तु यह आत्महत्या सनातनी विचार के अनुसार माना जायगा । बौद्ध देशों में आज-कल भी प्रचलित है । वीतनाम के