राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ राजतरंगिणी द्वाभिसारगांधारजालंधरशकाः खसाः । तंगणा माण्डवाश्चैव धान्तगिरिर्यहिर्गिरिः १३९ = १८२ नौलमत में 'खशा' तथा 'खश' एक ही शब्द किंवा समानार्थक समझना चाहिए । कल्हण ने खशो का बहुत वर्णन किया है। उन्हें इस समय खख्खा भी कहते हैं । खखल मुसलमान भी है । उन्हें राजपूत मुसलमान भी कहा जाता है। राजतरंगिणी में अनेक स्थानो पर राजोरी अर्थात् राजपुरी का शासक खशो के राजा नाम से सम्बोधित किया गया है। उसकी सेना को खशा कहा गया है (रा० त० ७:६७६, १२७१, १२७६, ८:८८७, १४६६, १८६८, १८९५ ) । राजपुरी से पूर्व की ओर चलने पर आन्स नदी की ऊपरी उपत्यका मिलती है। इस नदी को अब पंजगव्वर कहते है। श्रीवर ने जोन राजतरंगणी में इसका उल्लेख किया है । पञ्चगह्वरजाः केचित् सिन्धूपत्यन्वयोदिताः । रशा म्लेच्छास्तथान्येऽपि रुरुधुः सर्वतो दिशः ॥ उसने इस नदी को पंचगह्वर लिखा है। उसे खशों का निवास-स्थान कहा है। उससे पूर्व बाणशाल अर्थात् आधुनिक बानहाल है। इसी के नीचे बनिहाल पास है। यही पर भिक्षाचर ने खश राजा भागिक के दुर्ग में शरण ली थी (रा० त० ८ : १६६५) । राजतरंगिणी (८ : १७७ तथा १०७४) के वर्णन से प्रतीत होता है कि वह सब उपत्यका जो बनिहाल से चन्द्रभागा तक जाती है, जिसे अब 'विचलारी' कहते हैं, और जिसे पुरावृत्तिकार 'विशालटा' कहते है, खशों से आबाद थी । राजोरी के पूर्व अंचल को भी संज्ञा अनेक स्थानो पर पंचगह्वर नाम से दी गयी है ।... खशालय का भी वर्णन कल्हण ने (रा० त० ४:५६, ५८, २८४, २९०, २९९) किया है। यहाँ भी खश जाति रहती थी। खशालय ही खैशाल की उपत्यका है। इसे कशेर भो कहते है। वह दक्षिण- पूर्व में मारवल पास से काश्मीर के एक कोने से होती किश्तवार तक चली जाती हैं। खशालय का पुराना नाम खशाली श्रीवर के अनुसार मालूम होता है (रा० त० ७:३९९ ) राज्यं नश्यति हप्यति याह्या खशालीनका । लोकः क्लिश्यति लुण्टिदाहकरणैश्चौरैः स्पकं पश्यति ॥ ४ : ४५२ ॥ मुद्राराक्षस नाटक में 'खश' को एक सैनिक जाति के रूप में चित्रित किया गया है। मलयकेतु ने चन्द्रसेन पर आक्रमण करने की जो योजना बनायी थी उनमें खस सेना को अग्रिम पंक्ति में रखा था । प्रस्थातव्यं पुरस्तात् खसमगधगणैर्गार्णमुव्यूह्य सैन्यै र्गान्धारैर्मध्यमाने सयवनपतिभिः संविधेयप्रपन्न । ( मुद्राराक्षस नाटक अंक ५) यहाँ महत्वपूर्ण बात मुद्राराक्षस में पांच पर्वतीय राजाओं में काश्मीर गजा का उल्लेख है। पाँचों पर्वतीय राजा मलयकेतु के पक्ष में थे। यहाँ यह विचारणीय है कि काश्मीरी सेना का नाम न देकर खस का उल्लेख किया गया है। खस काश्मीर में आवाद थे। वे बली थे। सेना में थे। युद्ध में भाग लेते थे । खस को अग्रभाग में; यवन, गान्धार, को मध्य, तथा पृष्ठ भाग में चेदि हूण एवं शक सेना रखी गयी थी। इससे प्रकट होता है । 'खस' वीर सैनिक थे । निपुण योद्धा थे । अन्यथा उन्हें अग्रिम पंक्ति में रखने का कोई अर्थ नही था । खस के सम्बन्ध में 'मृच्छकटिकम्' नाटक छठे अंक में चन्दनक के मुख से मिथ्या बात छिपाने के कारण अशुद्ध तथा स्फुट शब्द निकल जाने पर वह पकड़ा जाने लगा तो उसका स्पष्टीकरण करता कहता है- 'अरे को अप्पञ्चओ तुह ? वयं दक्खिणत्ता अव्वत्तभाषिणो खस-णत्ति खड़ो विलम्..................अणेअदेस भासाभिण्णा जहेट्ठं मत्त, आम 'दट्ठो दिट्ठा वा, अज्जौ अज्जेआ वा ।' खस, खत्ति आदि........... देश भाषा से अन- भिज्ञ होने के कारण मनमाना 'देखा गया' देखी गयी' 'आर्य या भार्या' आदि बोला करते हैं।