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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

३२८ राजतरंगिणी द्वाभिसारगांधारजालंधरशकाः खसाः । तंगणा माण्डवाश्चैव धान्तगिरिर्यहिर्गिरिः १३९ = १८२ नौलमत में 'खशा' तथा 'खश' एक ही शब्द किंवा समानार्थक समझना चाहिए । कल्हण ने खशो का बहुत वर्णन किया है। उन्हें इस समय खख्खा भी कहते हैं । खखल मुसलमान भी है । उन्हें राजपूत मुसलमान भी कहा जाता है। राजतरंगिणी में अनेक स्थानो पर राजोरी अर्थात् राजपुरी का शासक खशो के राजा नाम से सम्बोधित किया गया है। उसकी सेना को खशा कहा गया है (रा० त० ७:६७६, १२७१, १२७६, ८:८८७, १४६६, १८६८, १८९५ ) । राजपुरी से पूर्व की ओर चलने पर आन्स नदी की ऊपरी उपत्यका मिलती है। इस नदी को अब पंजगव्वर कहते है। श्रीवर ने जोन राजतरंगणी में इसका उल्लेख किया है । पञ्चगह्वरजाः केचित् सिन्धूपत्यन्वयोदिताः । रशा म्लेच्छास्तथान्येऽपि रुरुधुः सर्वतो दिशः ॥ उसने इस नदी को पंचगह्वर लिखा है। उसे खशों का निवास-स्थान कहा है। उससे पूर्व बाणशाल अर्थात् आधुनिक बानहाल है। इसी के नीचे बनिहाल पास है। यही पर भिक्षाचर ने खश राजा भागिक के दुर्ग में शरण ली थी (रा० त० ८ : १६६५) । राजतरंगिणी (८ : १७७ तथा १०७४) के वर्णन से प्रतीत होता है कि वह सब उपत्यका जो बनिहाल से चन्द्रभागा तक जाती है, जिसे अब 'विचलारी' कहते हैं, और जिसे पुरावृत्तिकार 'विशालटा' कहते है, खशों से आबाद थी । राजोरी के पूर्व अंचल को भी संज्ञा अनेक स्थानो पर पंचगह्वर नाम से दी गयी है ।... खशालय का भी वर्णन कल्हण ने (रा० त० ४:५६, ५८, २८४, २९०, २९९) किया है। यहाँ भी खश जाति रहती थी। खशालय ही खैशाल की उपत्यका है। इसे कशेर भो कहते है। वह दक्षिण- पूर्व में मारवल पास से काश्मीर के एक कोने से होती किश्तवार तक चली जाती हैं। खशालय का पुराना नाम खशाली श्रीवर के अनुसार मालूम होता है (रा० त० ७:३९९ ) राज्यं नश्यति हप्यति याह्या खशालीनका । लोकः क्लिश्यति लुण्टिदाहकरणैश्चौरैः स्पकं पश्यति ॥ ४ : ४५२ ॥ मुद्राराक्षस नाटक में 'खश' को एक सैनिक जाति के रूप में चित्रित किया गया है। मलयकेतु ने चन्द्रसेन पर आक्रमण करने की जो योजना बनायी थी उनमें खस सेना को अग्रिम पंक्ति में रखा था । प्रस्थातव्यं पुरस्तात् खसमगधगणैर्गार्णमुव्यूह्य सैन्यै र्गान्धारैर्मध्यमाने सयवनपतिभिः संविधेयप्रपन्न । ( मुद्राराक्षस नाटक अंक ५) यहाँ महत्वपूर्ण बात मुद्राराक्षस में पांच पर्वतीय राजाओं में काश्मीर गजा का उल्लेख है। पाँचों पर्वतीय राजा मलयकेतु के पक्ष में थे। यहाँ यह विचारणीय है कि काश्मीरी सेना का नाम न देकर खस का उल्लेख किया गया है। खस काश्मीर में आवाद थे। वे बली थे। सेना में थे। युद्ध में भाग लेते थे । खस को अग्रभाग में; यवन, गान्धार, को मध्य, तथा पृष्ठ भाग में चेदि हूण एवं शक सेना रखी गयी थी। इससे प्रकट होता है । 'खस' वीर सैनिक थे । निपुण योद्धा थे । अन्यथा उन्हें अग्रिम पंक्ति में रखने का कोई अर्थ नही था । खस के सम्बन्ध में 'मृच्छकटिकम्' नाटक छठे अंक में चन्दनक के मुख से मिथ्या बात छिपाने के कारण अशुद्ध तथा स्फुट शब्द निकल जाने पर वह पकड़ा जाने लगा तो उसका स्पष्टीकरण करता कहता है- 'अरे को अप्पञ्चओ तुह ? वयं दक्खिणत्ता अव्वत्तभाषिणो खस-णत्ति खड़ो विलम्..................अणेअदेस भासाभिण्णा जहेट्ठं मत्त, आम 'दट्ठो दिट्ठा वा, अज्जौ अज्जेआ वा ।' खस, खत्ति आदि........... देश भाषा से अन- भिज्ञ होने के कारण मनमाना 'देखा गया' देखी गयी' 'आर्य या भार्या' आदि बोला करते हैं।

प्रथम तरंग३२९


राजपुरो से पश्चिम घूमने पर पर्णोत्स अथवा रा० त० ६ : ३१२ में वर्णित वृन्त मे एक व्यक्ति तुंग खस मिलता है। वह चरवाहा था। रानी दिद्दा के समय अत्यन्त शक्तिशाली मन्त्री बन गया। (रा० त० ७ : ७७३) प्रतीत होता है। तुंग के वंशज रानी दिद्दा के पश्चात् काश्मीर के राजा हुए थे। उन्हें निम्न समझा जाता था। खस लोगो की भाषा परिष्कृत नही थी। वे अशुद्ध बोलते थे। इससे प्रतीत होता है वे विशेष सुसंस्कृत नही थे। वे पर्वतीय थे। नगर निवासियो के समान व्याकरण शुद्ध भाषा बोलन के आदी नही थे। खशालय काश्मीर उपत्यका के पूर्व दक्षिण वर्तमान उदिल क्षेत्र है। वह क्षेत्र भृंग तथा शाहाबाद अंचल के पूर्व दक्षिण ओर पड़ेगा। बक्री बल तथा मरबल पास इसके पश्चिम में पड़ेंगे। इसका वर्णन शुक चौथी राजतरंगिणी में करता है। 'खशालयस्थं चक्रेशं त्रिसृष्टस्तैर्महात्मभिः । लेखहारस्तमाह स्म मार्गेश मुखवाचिकम् ॥ शुक० रा० : २ : २ : ३५ वितस्ता उपत्यका के अधोभाग में बारहमूला के आगे खस रहते थे। वोराका को खसो का एक केन्द्र कहा गया है। (रा० त० ८ : ४०९) यह स्थान प्राचीन दृशद्वती के समीप था। दृशद्वती को इस समय द्वारावेशी कहते है। वितस्ता उपत्यका का यह भाग कधाई तथा मुजफ्फराबाद के मध्य है। आधुनिक खक्ख जाति और खस एक ही है। काश्मीर में वितस्ता उपत्यका के अधोभागीय प्रायः सरदार इसी जाति के हैं। खक्ख शब्द खस का अपभ्रंश है। वितस्ता उपत्यका के खखा सरदार सिख राज आगमन के पूर्व अर्ध स्वतंत्र हैसियत रखते थे। अपने पड़ोसी बोम्बा कबीले के साथ सख लोग काश्मीर के लिए एक समस्या हो गये थे। उनका भयंकर क्रूर कर्म जो शेख इमामुद्दीन के समय में (१८४६) किया गया था, अभी तक लोगो को याद है। काश्मीर के मर्दुमशुमारी सन् १८९१ ई० के रिपोर्ट पृष्ठ १४१ पर खखो की आबादी ४१४६ दी गई है। उनकी जाति मुस्लिम पर्वतीय राजपूतो का एक उपजाति लिखी गयी है। (पृष्ठ २०१) खश जाति का मार्कण्डेय पुराण में पर्वताश्रिता जाति कहा गया है। अर्थात् यह जाति पर्वत में रहती थी। अतो देशान् प्रपश्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये। नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवो गुमेणाः खशाः ॥

    • + गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् । कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् समान् ॥ ॥ ५७ : ५६ ॥ महाभारत सभा पर्व में भी खस जाति का उल्लेख आता है। उन्हें शको तथा दरद जातियो तुल्य अर्ध सभ्य जाति में शामिल किया गया है। महाभारत सभा पर्व : (५१६ : १८४९) तथा (द्रोण पर्व ११ : ७९९ : १२१, ७)। सभा पर्व में पुनः एक स्थान पर उल्लेख आता है । वे मरु तथा मन्दर पर्वत के मध्य शैलदा नदी की उपत्यका में रहते थे। (सभा पर्व ५१ : १८४८; ५१ : १८४९)। शैलदा नदी पश्चिमी पर्वत के वरुण पर्वत से निकली है और पश्चिम सागर में गिरती है। (मत्स्य पुराण : १२० : ३३)। मनु ने उन्हें क्षत्री माना है। परन्तु ब्राह्मणो के प्रति श्रद्धा न होने के कारण वे पतित हो गये। (मनुस्मृति १० : ४३ : ४)। उन्हें काशगर से कुछ विद्वान् सम्बन्धित करते हैं। मार्कण्डेय पुराण (३४६ : ३५०) के अनुसार उन्हें शल्य, नीप, शक और शूरसेन आदि जातियों के साथ रखा गया है। सेन तथा पालवंश के शिलालेखों में इनका उल्लेख आता है।

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३३० राजतरंगिणी [स्तम्भ १] बृहद् संहिता में—कुलूत, तंगण, खश, काश्मीरा उल्लेख किया गया है। (१० : १२)। ऋग्वेद सहिता (१ : ११७) में खस जाति का उल्लेख मिलता है। खसा : प्राचीनतम दक्ष प्रजापति तथा असिक्नी की कन्या थी। कश्यप प्रजापति को दी गयी थी। उससे यक्ष राक्षसादि हुए। मार्कण्डेय पुराण में ‘कुरवो गुर्गणा खसा:,’ ‘वायु पुराण में ‘क्षुपणास्त- ङ्गण खसा:’ ‘कुणपास्तगणा: खसा:,‘ ‘धुपनास्तङ्ग- णास्त्वसा:’ ‘क्षुपनास्तङ्कणा स्वसा:’। ब्रह्माण्ड पुराण में ‘कुपयास्तङ्गणा: खसा:,’ मत्स्यपुराण मे ‘कुपथा अपयास्तया’ वामन पुराण में ‘कुपयास्तङ्गणा खसा.’ कुपय किंवा अपथ हिमालय मे कोई स्थान था। खस देश का उल्लेख द्रोण पर्व में किया गया है। मत्स्य पुराण में बर्बर तथा यवनों के साथ खसों का उल्लेख किया गया है। ‘बर्बरान् यवनान् खसान्’। वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में ‘पारदान, सौगनान्खसान्’ ‘पारदास्ताङ्गणान्खसान्’, ‘किम्पुरुषान् खसान्’ का उल्लेख पारद तङ्गण तथा किम्पुरुष के साथ आया है। द्रोण पर्व महाभारत में खस जाति का उल्लेख दरद आदि के साथ किया गया है। तैस्तु पुनर्व्याप्तमुखास्तेऽश्मवृष्टीः समन्ततः । अयोहस्ताः शूलहस्ता दरदास्तङ्गणाः खसाः ॥ ( १२१ । ४२ ) काशीर जनपद का उल्लेख भीष्म पर्व में पूर्वोत्तर भारत के एक जनपद के लिए किया गया है। मार्कण्डेय पुराण में खश जाति का नाम मगध तथा लोहित्य के साथ पूर्व दिशा मे रखा गया है। परन्तु यह काश्मीरी साहित्य में वर्णित जाति खस नहीं है। अपितु आसाम खासी पर्वत में रहने वाली खासी जाति हो सकती है। अथवा खस जाति जिसका उल्लेख बंगाल के पाल राजाओं के शिला- लेखों में है वे ये जिनका आवागमन बंगाल, आसाम [स्तम्भ २] तक होता रहा है, अथवा कहीं यही आबाद रहे होंगे। शूद्राभीराश्च दरदाः काश्मीराःपशुभिः सह ।।६७।। खाशीराश्चान्तचाराश्च पद्गया गिरिगह्वराः । आत्रेयाः सभरद्वाजास्तथैव स्तनपोषिकाः ।। (भीष्मपर्व ९ : ६८ ) दरद और काश्मीर के साथ ही खस का उल्लेख किया गया है। खाशीर, खसा, खश एवं खस शब्द एक ही जाति के लिए प्रयुक्त किये गये हैं। (भीष्म पर्व ९ : ६८)। भागवत पुराण ( २ : ४ : १३ ) के अनुसार खस जाति पतित हो गयी थी परन्तु भागवत भक्ति के कारण शुद्ध हो गयी। ब्रह्माण्ड पुराण ( २ : २६ : १४५ तथा ३ : ६९ १२० ) में उल्लेख आता है। विन्ध्य पर्वत में निवास करने वाली एक निम्न कोटि की क्षत्री जाति थी। उसे निषाद भी कहते थे। हरिवंश पुराण के अनुसार सगर ने उन्हें जीता था। उन्हें निम्न श्रेणी में रख दिया। और वे म्लेच्छ माने गये। हरिवंश पुराण ( १४ ० ७८४ ) ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराण ने उन्हें पूर्व का एक जनपद माना है। जिसमे होकर चक्षु नदी बहती है। ( ब्रह्माण्ड पुराण २ : १६ : ४६ तथा मत्स्य पुराण १२१ : ४३, १४४ : ५७ ) वायु पुराण मे एक पर्वतीय जनपद कहा गया है। यहाँ खस के स्थान पर खश शब्द का प्रयोग किया गया है। वायुपुराण ( ४५ : ३१५ तथा ४७ : ४७,) में दरद जाति को खस जाति का पड़ोसी माना गया है। बंगाल के पाल राजाओं के शिला- लेख मे हूण तथा खस जाति का उल्लेख मिलता है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि खस लोग बंगाल तक आते जाते थे। हरिवंश पुराण ( १३ : २३-३४ ) में उल्लेख आता है। रघुवंशी राजा बाहु को हैहय तथा ताल- जंघ वंशीय राजाओं ने शक, यवन, कम्बोज, पारद

प्रथम तरंग ३३१ अवतारयतस्तस्य चन्द्रकुल्याभिधां नदीम् । अशक्योन्मूलना मध्ये शिलाऽभूद्विघ्नकारिणी ॥ ३१८ ॥ ३१८. जबकि चन्द्रकुल्या१ नाम्नी नदी को राजा अवतारत२ कर रहा था, बीच में न हटनेवाली शिला विघ्नकारक हो गयी । ततः कृततपाः स्वप्ने देवैरुक्तः स भूपतिः । यक्षः शिलायां बलवान्ब्रह्मचार्यत्र तिष्ठति ॥ ३१९ ॥ ३१९. तदनन्तर उस राजा ने तपस्या की। स्वप्न में देवताओं ने उससे कहा—'बलवान् एवं ब्रह्मचारी यक्ष शिला पर आसीन है।' साध्वी स्पृशति चेदेनां निरोद्धुं न स शक्नुयात् । ततोऽपरेद्युः स्वप्नोक्तं शिलायां तेन कारितम् ॥ ३२० ॥ ३२०. 'यदि साध्वी स्त्री इस शिला का स्पर्श करे, तो वह यक्ष कार्य निरोध में असमर्थ होगा।' दूसरे दिन उसने स्वप्नोक्त क्रिया शिला पर करायी । तथा पल्लव की सहायता से बाहु तथा उसके राज्य को नष्ट कर दिया । ( १४ : ४ ) यवन, पारद, काम्बोज, पल्लव तथा खस पांचगणो ने हैहय राजाओं के विजय निमित्त पराक्रम किया था। यहाँ स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि खसों की राज्य-व्यवस्था गणतन्त्रीय थी । खसो ने बाहू राजा तथा उसके राज्य को नष्ट करने में सम्भवतः प्रत्यक्ष भाग नही लिया था क्योंकि ( १३ : ३० ) खस का उल्लेख नहीं आता । हैहय तथा तालजंघ राजो के साथ शको का उल्लेख है । उसने बाहू के राज्य को छीन लिया था। वही पर ( १४ : ४ ) केवल यह उल्लेख आता है कि पाचगण राज्य जिनमें खस भी एक गणराज्य था, हैहयों के लिए पराक्रम किया था । खस लोग शकों की तरह बाहु के राज्य को लेते हुए दिखाई नही देते । पादटिप्पणियाँ : ३१८ (१) चन्द्रकुल्या : मुहम्मद आजिम कहता है कि राजा मिहिरकुल ने चन्द्रकुल्या नहर बनवायी थी । उसके समय तक वह नहर वर्तमान थी । (२) अवतारित : श्री स्तीन तथा सीताराम पण्डित ने यहाँ जल प्रवाह को डाइवर्ट अर्थात् जल प्रवाह को मोडने का अर्थ किया है। अन्य अनु- वादकों ने भी विभिन्न अर्थ किये है । अतएव मैने यहाँ मूल 'अवतारित' शब्द दे दिया है। 'गंगावतरण' शब्द अत्यन्त प्रचलित है । भगीरथ ने गंगा का अवतरण किया था । कल्हण के मस्तिष्क में 'गंगावतरण' की बात रही होगी । भगीरथ की 'गंगा' के समान 'चन्द्र- कुल्या' को राजा मिहिरकुल अवतारित करा रहा था । यही भाव यहाँ प्रदर्शित किया है। कुल्या शब्द का अर्थ नहर, नाला एवं नाली होता है। कुल्या का मार्गावरोध शिला के कारण ( रा० त० १ : ३२० ३२१ ) हो गया था। जलावतरण नही हो रहा था। इससे प्रकट होता है कि चन्द्रकुल्याका राजा निर्माण करा रहा था । कुल्या शब्द का प्रयोग कल्हण ने ( रा० त० १ : ९७ ) सुवर्णमयी कुल्या के संदर्भ में किया है। कुल्या शब्द पर विशेष पृष्ठ १३० द्रष्टव्य है । २. ... : श्लोक संख्या ३१९ में 'यक्ष.' का पाठभेद 'यक्षा' तथा 'यक्षाः' मिलता है । श्लोकसंख्या ३२० में 'चेदेनां' का 'चेदेनं' तथा 'न स' का पाठभेद 'न च' मिलता है ।

३३२: राजतरंगिणी तासु तासु कुलस्त्रीषु व्यर्थयत्नास्वथाचलत् । चन्द्रवत्याख्यया स्पृष्टा कुलान्या सा महाशिला ॥ ३२१ ॥ ३२१. उन उन कुलीन स्त्रियों के यत्न व्यर्थ हो जाने पर, चन्द्रावती नाम्नी स्त्री के स्पर्श से वह महा शिला सचल हो गयी, १ । कोटित्रयं नरपतिः क्रुद्धस्तेनागसा ततः । सपतित्रातृपुत्राणामवधीत्कुलयोषिताम् ॥ ३२२ ॥ ३२२. इस अपराध के कारण क्रुद्ध नरपति ने तीन करोड़१ पति, भ्राता पुत्र सहित कुल योषिताओं का वध कर दिया। इत्थं चान्यमते ख्यातिः प्रथते तथ्यतः पुनः । अभव्या सनिमित्ताऽपि प्राणहिंसा गरीयसी ॥ ३२३ ॥ ३२३. अन्य लोगों के मत में यह ख्याति उपयुक्त है, किन्तु तथ्यतः सकारण भी इतनी बड़ी संख्या में प्राण हिंसा शोभनीय नही है। श्लोकसंख्या ३२१ में 'सा महा' का पाठभेद | शिला स्पर्श किया। आश्चर्यजनक घटना घटी। 'स महा' मिलता है। | पत्थर हट गया। राजा बीमार पड़ा। उसने स्वयं | अग्नि प्रवेश कर प्राणोत्सर्ग किया।' पादटिप्पणियाँ : | राजा मिहिरकुल की मृत्यु सन् ५३० ई० में | हुई। ३२१ (१) आइने अकबरी मे शिला उठाने की | कहानी का निम्नलिखित वर्णन किया गया है- | ३२२ (१) त्रिकोटि हून : मिहिरकुल का नाम "काश्मीर की एक नदी में एक बड़ा पत्थर उभड़ | (रा० त० १ : ३१०) त्रिकोटिहन दिया गया आया था। उससे नदी की धारा का अवरोध हो | है। उसने ३ करोड़ मानव का संहार किया था। गया था। दिन में पत्थर जितना काटा जाता था, | कल्हण के कथनानुसार मिहिरकुल का नाम तीन रात में उतना ही बढ़ जाता था। उसी समय आकाश- | कोटि लोगों के वध करने के कारण त्रिकोटिहन पड़ वाणी सुनाई दी-यदि कोई सती स्त्री पत्थर का | गया था। स्पर्श करे, तो शिला का लोप हो जायेगा। स्त्रियों | यूनानी इतिहासकार हिरोडटस ने भी फरोहा को शिला स्पर्श करने के लिए, आदेश प्रचारित | के सम्बन्ध में इसी प्रकार की एक कहानी का वर्णन किया गया। राज्य कर्मचारियों ने बहुत स्त्रियो को | किया है। शिला स्पर्श कराया। परन्तु शिला टस से मस न | ह्वेनसांग कहता है- 'तब ६ सौ हजार हुई। राजा मिहिरकुल बिगड़ा। उसने असती | उच्च कुल के लोगों को राजा मिहिरकुल ने शिन्त- स्त्री तथा उनके पति को असती स्त्री रखने के अप- | नदी के तट पर वध करवा दिया था। मध्यम राध में मृत्यु दण्ड दे दिया। उनके संतानों को वर्ण- | श्रेणी के लोगों को नदी में डुबवा दिया था '(१: संकर घोषित कर दिया। इस प्रकार तीस लाख | १७२ ग्यूकी)। लोग मार डाले गये। एक कुम्भकार की स्त्री ने |

प्रथम तरंग. ३३३ एवं क्षुद्रोऽपि यद्राजा संभूय न हतो जनैः । तत्कर्म कारयद्भिस्तद्दैवतैरथ रक्षितः ॥ ३२४ ॥ ३२४. क्षुद्र होते हुए भी उस राजा की प्रजा ने विप्लव द्वारा हत्या नहीं की क्योंकि वह उन्हीं देवताओं द्वारा रक्षित था, जिनकी प्रेरणा से उसने उन कर्मों को किया था। प्रजापुण्योदयैस्तीव्रैश्चिरात्तस्मिन्द्ययं गते । बकस्तत्प्रभवः पौरैः सदाचारोऽभ्यषिच्यत ॥ ३२५ ॥ बकः ३२५. प्रजा के तीव्र पुण्योदय के कारण उसके मरने पर, उसके पुत्र सदाचारी बक का पौर जनों ने अभिषेक किया । ३२४ (१) देवता : कल्हण यहाँ दैव सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। भाग्यवादी दैव में विश्वास करते हैं। उनका विश्वास है। सब कुछ दैवी प्रेरणा से होता है। मनुष्य केवल निमित्त मात्र है। साधन है। उसकी गतिविधियां पूर्व से ही सुनिश्चित रहती हैं। फलित ज्योतिष सिद्धान्त इसका सबसे बड़ा समर्थक है। यदि बातें पूर्व से ही सुनिश्चित न होतीं तो पचासों वर्ष पूर्व जन्म- कुण्डली में लिखी अथवा वर्षफल, जन्मफल की कही फलगणना और भविष्य की घटनायें किस प्रकार सत्य उतरतीं ? भाग्य एवं कर्म का विवाद बहुत पुराना है। आगे न बढ़कर यहाँ इतना ही लिखना अलम् होगा कि कल्हण ने मिहिरकुल के क्रूर कर्मों का प्रेरक दैव को ही माना है। जिसकी प्रेरणा से उसने क्रूर कर्मों को किया था उन्हींकी प्रेरणा से उसकी रक्षा भी हुई। जनता उसकी नृशंसताओं तथा उत्पीड़न से त्रस्त होने पर भी राजविद्रोह नहीं कर सकी। वह अछूता बच गया। उसकी हत्या करने का किसी ने प्रयास नहीं किया। कारण एकमात्र कल्हण यही देता है। जो प्रेरक शक्ति उसकी नृशंसताओं के लिए उत्तरदायी थी, उसी ने उसकी रक्षा की। जनता में विद्रोह, विप्लव की भावना एवं विचार उत्पन्न नहीं होने दिया। कवि दण्डी ने राजाओं के सम्बन्ध में दैवी शक्ति के विषय में 'दशकुमारचरितम्' में कहा है—"मदीयैर्विश्वास्य- तमैः पुरुषैः प्रभूतों।" (उपसंहार : १) पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२४ में 'बकस्त' का पाठभेद 'एकस्त' मिलता है। 'ए' तथा 'व' का भ्रम शारदा लिपि के प्रयोग के कारण हो गया है। पादटिप्पणियाँ : ३२५ (१) आइने अकबरी ने नाम बेक तथा उसका राज्यकाल ६३ वर्ष १३ दिन दिया है। श्री स्टीन के अनुसार लौकिक वर्ष २४४२ के चौथे मास में उसने राज्यारोहण किया था। श्री एस० वी० पण्डित ने यह समय ईशा पूर्व ६३७ वर्ष रखा है। हसन कहता है—'राजा बकने बाप के मरने के बाद क० २४०९ मे हुकूमत की। दुलहिन अदब व इन्साफ के जेवर से जैव व जीनत देनेवाला बना। बकाशुर के मुकाम पर अपने नाम पर एक स्वामी का मन्दिर निहायत उमदगी से तामीर किया। इसी तरह एक नहर अपने नाम खर्च कसीर से खुदवायी। शहर पूंछ उसीका आबाद किया हुआ है। चारो तरफ इसके इर्दगिर्द ऊंचे- ऊंचे पहाड़ हैं। इसके जमाने में एक जोगी औरत भटका नाम को पैदा हो गयी। उसके हुस्न व- जमाल को देखकर राजा का दिल बेकाबू हो गया। वह जादूगरनी एक दिन राजा को कुरबानी की रस्म

३३४ राजतरंगिणी तत्रापि पूर्वसंस्कारादुक्तत्रासं दधे जनः। श्मशानविहिते लोलावेश्मनीय नृपास्पदे ॥ ३२६ ॥ ३२६. श्मशान में बने लोलावेश्म सदृश पूर्व संस्कार के कारण उसके सिंहासन के सम्मुख भी लोग उक्त त्रास की आशंका से भय त्रस्त रहते थे। अतिसंतापदाज्जातं स जनाह्लादकोऽभवत् । जलौघा जलदश्यामाच्चापात्ययदिनादिव ॥ ३२७ ॥ ३२७. अति संतापदायी से उत्पन्न१ यह जन आल्हादक, उसी प्रकार हुआ, जैसे जलद द्वारा श्याम ग्रीष्मान्त दिन से उत्पन्न वृष्टि।

पर इसके आशनाओ और क़रीबी रिश्तेदारों समेत जय़ाफ़त पर ले गयी थी। इस औरत ने जादू के ज़ोर से उन तमाम को मार डाला। सिर्फ़ एक लड़का खिसो नन्द नाम का ज़िन्दा रहा। मुद्दत हुकूमत बासठ बरस ९ महीने।' (पृष्ठ ४९)। (२) पौरों द्वारा राज्याभिषेक : कल्हण इस स्थान पर नागरिकों द्वारा राजा चुनने की बात करता है। मालूम होता है कि मिहिरकुल के पुत्रों से किसी सदाचारी पुत्र को लोगों ने राजा बनाने का निश्चय कर उसे राजा बनाया। अन्यथा कल्हण यहाँ पर केवल यही लिखता कि मिहिरकुल का पुत्र उसके पश्चात् राजा हुआ। काश्मीर में प्रायः राजा का निर्वाचन प्राचीन काल में होता रहा है। राजतरंगिणी में वर्णन आता है कि यशस्कर ब्राह्मण को काश्मीर की परिषद् ने राजा चुना था। (रा० त० ५ : ४६९, ४७७)। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२६ में 'दुरुन्त्रासं' का 'मुक्तत्रास' 'दुक्ता त्रास' 'मुक्ता सन्द', मुक्त लासं', 'दुत्त्रांसं स' तथा दुरुन्त्रात्रासं' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३२६ (१) नृपास्पद : यहाँ कल्हण ने सिंहा- सन नहीं 'नृपास्पद' शब्द का प्रयोग किया है। श्री स्तोम तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित आदि ने सिंहासन ही 'नृपास्पद' का अर्थ लगाया है। नृप+आस्पद मिलकर नृपास्पद शब्द बना है। नृप का अर्थ राजा और आस्पद का अर्थ स्थान, अधिष्ठान, इत्यादि होता है। यहाँ राजस्थान तथा राजा के बैठने की जगह अर्थात् अधिष्ठान भी हो सकता है। यहाँ पर सिंहासन की अपेक्षा राजा के स्थान करना अथवा उनके बैठकों के आसपास अर्थ अधिक कल्हण के समीप होगा। नृपास्पद शब्द का भावार्थ सिंहासन में आ जाता है। किन्तु यह शाब्दिक अर्थ के अधिक समीप नहीं है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२७ में 'अति' का 'अवि'; 'जातः' का 'जाताः', 'जनाह्लादको' का 'जनाः ह्लादको' तथा 'मात्तपा' का 'मोत्तापा', 'मातापा' और 'भात्तापा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३२७ (१) संतापदायी : कल्हण यहाँ पर दूसरा उदाहरण संतापदायी राजा से उत्पन्न उत्तम तथा जन आह्लादक पुत्र का देता है। पहला उदा- हरण उसने नृशंस नर के पुत्र सिद्ध का दिया है, यहाँ दूसरा का उदाहरण भूलोकभैरव मिहिरकुल के पुत्र बक का देता है।

प्रथम तरंग ३३५ लोकान्तरादिवायातं मेने धर्मं तदा जनः । अभयं च परावृत्तं प्रवासाद्गहनादिव ॥ ३२८ ॥ ३२८. उस समय लोग धर्म १ को लोकान्तर से आया तथा अभय २ को चिर प्रवास से परावृत्त मानते थे । स वकेशं वकश्वभ्रे वकवत्यापगां तथा । कृत्वा पुरं परार्थ्यश्रीर्लवणोत्साभिधं व्यधात् ॥ ३२६ ॥ ३२६. उस अतुल श्री सम्पन्न राजा ने वकश्वभ्र में वकेश १ तथा वकावती आपगा २ का निर्माण करके लवणोत्स ३ नगर बनवाया । तत्र त्रिषष्टिर्वर्षाणां सत्रयोदशवासरा । अत्यवाह्यत भूपेन तेन पृथ्वीं प्रशासता ॥ ३३० ॥ ३३०. उस राजा ने वहां पृथ्वी का शासन करते' तिरसठ वर्ष तेरह दिन व्यतीत किया । २ ३२८ (१) धर्म का अर्थ यहाँ राज्य के विधि से है । जिसका आज कल प्रचलित शब्द कानून है । (२) अभय : शासन का फल अभय है । अभय उस समय जनता में होता है, जब शासन सुव्यवस्थित होता है । राज्यदण्ड का भय अवां- च्छनीय तत्त्वों को नियन्त्रण में रखता है । जनता में आन्तरिक तथा बाह्य दोनों प्रकार के भय का अभाव हो जाता है । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२९ में 'वकेशं' का 'वकेशे' तथा 'कवश्वभ्रे' का पाठभेद 'वकः श्वभ्रे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३२९ (१) वकेश तथा वकश्वभ्र : इन दोनो स्थानों का पता अभी तक नहीं चला है । कुछ स्थान मुझे बताये गये किन्तु वे भ्रामक हैं । ३२९ (२) वकावती आपगा : कल्हण न आपगा शब्द का यहाँ प्रयोग किया है। जिसका अर्थ नदी, सरित्, तरंगिणी, शैवालिनी, तटिनी, किंवा सरिता होता है । आपगेय का अर्थ नदी से उत्पन्न नहरादि होता है । यहाँ आपगा का अर्थ नहर माना जा सकता है । (३) लवणोत्स : श्रीनगर से भारत आने वाले मार्ग पर यह स्थान स्थित है । ( रा० त० ६:४६, ५७; ७:७६२, ७:१५३७, १६५८) । श्रीनगर से पूर्व काल में एक ही पड़ाव में लवणोत्स पहुँचा जा सकता था । पामपुर या पद्मपुर मार्ग में पड़ता था । विजये- श्वर के घेरा के सन्दर्भ में ( रा० त० ७-१५६७ तथा १६५८ ) लवणोत्स का वर्णन कल्हण ने किया है । उसमे प्रतीत होता है । विजयेश्वर तथा लवणोत्स में अधिक फासला नहीं था । श्रीनगर में बाहर से आने वाली एक सड़क पर लवणोत्स के होने का उल्लेख है । (रा० त० ५६,५७) । लवणोत्स वास्तव में किस स्थान पर था, अभी तक निश्चय नहीं हो सका है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३० में 'वासरा' का 'वासराम्' 'अत्यवाह्यत' का 'अभ्यवाह्यत' तथा 'अव्यग्राह्यत' और 'प्रशासता' का पाठभेद 'प्रशासता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३० (१) राज्यकाल : राजतरंगिणी राज्य काल ६३ वर्ष तेरह दिन स्पष्ट देती है । श्री रणजोत

३३४ राजतरंगिणी तत्रापि पूर्वसंस्कारादुक्तत्रासं दधे जनः । श्मशानविहिते लीलावेश्मनीव नृपास्पदे ॥ ३२६ ॥ ३२६. श्मशान में बने लीलावेश्म सदृश पूर्व संस्कार के कारण उसके सिंहासन के सम्मुख भी लोग उक्त त्रास की आशंका से भयभीत रहते थे । अतिसंतापदाज्जातं स जनाह्लादकोऽभवत् । जलौघा जलदश्यामात्तपात्ययदिनादिव ॥ ३२७ ॥ ३२७. अति संतापदायी से उत्पन्न' वह जन आह्लादक, उसी प्रकार हुआ, जैसे जलद द्वारा श्याम ग्रीष्मान्त दिन से उत्पन्न वृष्टि ।


पर इसके आशनाओ और क़रीबी रिश्तेदारो समेत जियाफ़त पर ले गयी थी । इस औरत ने जादू के जोरसे उन तमाम को मार डाला । सिर्फ एक लड़का खितो नन्द नाम का ज़िन्दा रहा । मुद्दत हुकूमत बासठ बरस ९ महीने ।' (पृष्ठ ४९ ) । (२) पौरों द्वारा राज्याभिषेक : कल्हण इस स्थानपर नागरिको द्वारा राजा चुनने की बात करता है । मालूम होता है कि मिहिरकुल के पुत्रो से किसी सदाचारी पुत्र को लोगो ने राजा बनाने का निश्चय कर उसे राजा बनाया । अन्यथा कल्हण यहाँ पर केवल यही लिखता कि मिहिरकुल का पुत्र उसके पश्चात् राजा हुआ । काश्मीर में प्रायः राजा का निर्वाचन प्राचीन काल में होता रहा है । राजतरंगिणी में वर्णन आता है कि यशस्कर ब्राह्मण को काश्मीर की परिषद् ने राजा चुना था । (रा० त० ५ : ४६९, ४७७ ) । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२६ में 'दुक्तत्रासं' का 'मुक्तत्रास' 'दुब्ता त्रास' 'मुक्ता सन्द', मुक्त तासं', 'दुत्त्रांसं स' तथा दुक्त्रात्रामं' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३२६ (१) नृपास्पद: यहाँ कल्हण ने सिंहा- सन नहीं 'नृपास्पद' शब्द का प्रयोग किया है । श्री


स्तीन तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित आदि ने सिंहासन ही 'नृपास्पद' का अर्थ लगाया है । नृप + आस्पद मिलकर नृपास्पद शब्द बना है । नृप का अर्थ राजा और आस्पद का अर्थ स्थान, अधिष्ठान, इत्यादि होता है । यहाँ राजस्थान तथा राजा के बैठने की जगह अर्थात् अधिष्ठान भी हो सकता है । यहाँ पर सिंहासन की अपेक्षा राजा के स्थान करना अथवा उनके बैठकों के आसपास अर्थ अधिक कल्हण के समीप होगा । नृपास्पद शब्द का भावार्थ सिंहासन मे आ जाता है । किन्तु यह शाब्दिक अर्थ के अधिक समीप नही है । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२७ में 'अति' का 'अपि'; 'जातः' का 'जाताः', 'जनाह्लादको' का 'जनाः ह्लादको' तथा 'मात्तपा' का 'मोत्तपा', 'मातापा' और 'मात्तापा' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३२७ (१) संतापदायी : कल्हण यहाँ पर दूसरा उदाहरण संतापदायी राजा से उत्पन्न उत्तम तथा जन आह्लादक पुत्र का देता है । पहला उदा- हरण उसने नृशंस नर के पुत्र सिद्ध का दिया है । यहाँ दूसरा उदाहरण भूलोकभैरव मिहिरकुल के पुत्र बक का देता है ।

प्रथम तरंग ३३५ लोकान्तरादिवायातं मेने धर्मं तदा जनः । अभयं च परावृत्तं प्रवासाद्गहनादिव ॥ ३२८ ॥ ३२८. उस समय लोग धर्म १ को लोकान्तर से आया तथा अभय २ को चिर प्रवास से परावृत्त मानते थे । स वकेशं वकश्वभ्रे वकवत्यापगां तथा । कृत्या पुरं परार्ध्यश्रीर्लवणोत्साभिधं व्यधात् ॥ ३२६ ॥ ३२६. उस अतुल श्री सम्पन्न राजा ने वकश्वभ्र में वकेश १ तथा वकावती आपगा २ का निर्माण करके लवणोत्स ३ नगर बनवाया । तत्र त्रिषष्टिर्वर्षाणां सत्रयोदशवासरा । अत्यवाह्यत भूपेन तेन पृथ्वीं प्रशासता ॥३३० ॥ ३३०. उस राजा ने वहाँ पृथ्वी का शासन करते १ तिरसठ वर्ष तेरह दिन व्यतीत किया । १ ३२८ (१) धर्म का अर्थ यहाँ राज्य के विधि से है । जिसका आज कल प्रचलित शब्द कानून है । (२) अभय : शासन का फल अभय है । अभय उस समय जनता मे होता है, जब शासन सुव्यवस्थित होता है। राजदण्ड का भय अवां- च्छनीय तत्त्वो को नियन्त्रण में रखता है । जनता में आन्तरिक तथा बाह्य दोनो प्रकार के भय का अभाव हो जाता है । पाठभेद : श्लोकसंख्या ३२९ में 'वकेशं' का 'वकेशे' तथा 'कवश्वभ्रे' का पाठभेद 'वकः श्वभ्रे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३२९ (१) वकेश तथा वकश्वभ्र : इन दोनों स्थानों का पता अभी तक नहीं चला है। कुछ स्थान मुझे बताये गये किन्तु वे भ्रामक है । ३२९ (२) वकावती आपगा : कल्हण न आपगा शब्द का यहाँ प्रयोग किया है । जिसका अर्थ नदी, सरित्, तरंगिणी, शैवालिनी, तटिनी, किंवा सरिता होता है। आपगेय का अर्थ नदी से उत्पन्न नहरादि होता है। यहाँ आपगा का अर्थ नहर माना जा सकता है । (३) लवणोत्स : श्रीनगर से भारत आने वाले मार्ग पर यह स्थान स्थित है । ( रा० त० ६:४६, ५७; ७:७६२, ७:१५३७, १६५८) । श्रीनगर से पूर्व काल में एक ही पड़ाव में लवणोत्स पहुँचा जा सकता था । पामपुर या पद्मपुर मार्ग में पड़ता था। विजये- श्वर के घेरा के सन्दर्भ में ( रा० त० ७:१५६७ तथा १६५८ ) लवणोत्स का वर्णन कल्हण ने किया है । उससे प्रतीत होता है । विजयेश्वर तथा लवणोत्स में अधिक फासला नहीं था । श्रीनगर में बाहर से आने वाली एक सड़क पर लवणोत्स के होने का उल्लेख है । (रा० त० ५६,५७) । लवणोत्स वास्तव में किस स्थान पर था, अभी तक निश्चय नहीं हो सका है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३० में 'वासरा' का 'वासराम्' 'अत्यवाह्यत' का 'अभ्यवाह्यत' तथा 'अभ्यनाह्यत' और 'प्रशासता' का पाठभेद 'प्रशासता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३० (१) राज्यकाल : राजतरंगिणी राज्य काल ६३ वर्ष तेरह दिन स्पष्ट देती है । श्री रणजोत

३३६ राजतरंगिणी अथ योगेश्वरी काचिद्भट्टाख्या रजनीमुखे । कृत्वा कान्ताकृतिं काम्यामुपतस्थे विशां पतिम् ॥ ३३१॥ ३३१. किसी समय रजनी मुख¹ काल मे कोई भट्टा नाम्नी योगेश्वरी² कमनीय कान्त आकृति धारण कर विशांपति (राजा)³ के समीप पहुँची। तया मनोहरैस्तैस्तैर्वचनैर्लपितस्मृतिः । स यागोत्सवमाहात्म्यं द्रष्टुं हृष्टो न्यमन्त्रयत ॥ ३३२ ॥ ३३२. अपने मनोहर तन्-तन् वचनों द्वारा नष्ट स्मृति एवं प्रसन्न राजा को यागोत्सव माहात्म्य देखने के लिये, उसने निमन्त्रित किया। पुत्रपौत्रशतोपेतः प्रातस्तत्र ततो गतः । चक्रवर्ती तया निन्ये देवीचक्रोपहारताम् ॥ ३३३ ॥ ३३३. तदुपरान्त, अपने शत पुत्र-पौत्रों सहित प्रातः काल वहाँ गये, चक्रवर्ती को उसने देवी चक्र¹ पर उपहार चढ़ा दिया।


सीताराम पण्डित अनुवाद में ६३ वर्ष १३ दिन देते हैं। किन्तु श्री एस. पी. पण्डित के लेख को ओरनजीत ने परिशिष्ट 'ए' पृष्ठ ५८१ पर उद्धृत किया है। उसके अनुसार राज्य काल केवल ६३ वर्ष आता है। तेरह दिन कम दिया है। कल्हण के पाठ का अनुवाद ही मैने यहाँ दिया है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३३१ में 'दृब्भट्टा' का पाठभेद 'दृट्ठा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३१ (१) रजनीमुख—यहाँ पर रजनीमुख शब्द का प्रयोग कल्हण ने सायंकाल अर्थात् रात्रि के प्रारम्भ काल के लिये किया है। (२) योगेश्वरी : इसका शाब्दिक अर्थ दुर्गा होता है। योग विद्या में प्रवीण मह्या के विशेषण रूप में योगेश्वरी शब्द का यहाँ प्रयोग किया गया है। साधारण योग सम्पन्न स्त्रियों को योगिनी कहते हैं उनमें श्रेष्ठ के लिये विशेषण योगेश्वरी लगाया जाता है—आठ विशेष देवियाँ योगिनी कही गयीं हैं— ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, नारायणी, वाराही, इन्द्राणी चामुंडा तथा महालक्ष्मी। (३) विशांपति : काश्मीर के राज्य संगठन का प्रकार समय समय पर बदलता रहा है। प्रथम इकाई देश थी। उसके पश्चात्, राज्य तत्पश्चात् विश्व का सबसे छोटा इकाई ग्राम था। राजा को यहाँ विशांपति कहा गया है। उसके नीच कर्मों के कारण कल्हण ने उसे राजा किंवा नृपति न कहकर विश्व का स्वामी कहा है। वह उससे बड़ा स्थान उसे नहीं देना चाहता है। विश्र्व तथा विषय का पदलालित्य के कारण यहाँ पर कल्हण ने अनुप्रास स्वरूप प्रयोग किया है। राजा को विषयपति न कहकर विश्वपति कहा है। दोनों क्रमशः मूर्धन्य ष तथा तालव्य श हैं इसके उच्चारण में भेद है। यदि शीघ्रता से कहा जाय तो उनका भेद समझना कठिन हो जाता है। विषय काश्मीर में परगना को कहते हैं। विश्: राज्य का एक प्रकार है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३३२ में 'र्लंपति' का 'ग्लपित' तथा 'म्यमन्त्रयत का' न्यमन्त्रयत् तथा 'न्यसंतयन' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३३ (१) देवीचक्र : मातृ चक्र का उल्लेख टिप्पणी १ : १२२ पृष्ठ पर किया गया है। यहाँ पर

प्रथम तरंग ३३७ कर्मेणा तेन सिद्धाया व्योमाक्रमणसूचकम् । जानुमुद्राद्वयं तस्या दृषदद्यपि दृश्यते ॥ ३३४ ॥ ३३४. उस कर्म द्वारा सिद्ध उस योगेश्वरी के व्योम गमन सूचक, दोनों जानुओं की मुद्रा, शिला पर आज भी देखी जाती है । देवः शतकपालेशो मातृचक्रं शिला च सा । खेरीमठेषु तद्वार्तास्मृतिमद्यापि यच्छति ॥ ३३५ ॥ ३३५. देव, शतकपालेश, मातृचक्र तथा वह शिला खेरी १ के मठों २ मे आज भी उस वार्ता की स्मृति दिलाती है । कल्हण देवीचक्र का उल्लेख करता है न कि मातृ- चक्र का । अतएव 'देवी' तथा 'मातृचक्र' में निश्चय उस समय अन्तर रहा होगा । अनुवादकर्ताओं ने इसका अनुवाद किया है कि देवीचक्रपर राजा को बलिदान कर दिया गया था । यहा पर बलि शब्द का प्रयोग न कर 'उप- हार' शब्द का प्रयोग कल्हण ने किया है । 'बलि' तथा 'उपहार' में अन्तर है । बंगाल में बलि चढ़े पशु के मांस को महाप्रसाद कहते हैं। शाक्त लोग 'प्रसाद' ही ग्रहण करते हैं । अन्य मांस उनके लिये वर्जित है । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३४ में 'दृषदद्यपि का 'दृश- द्यदापि' तथा 'दृष्ट्यद्यापि' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या ३३५ में 'खेरीमठेषु' का 'क्षीर- मठेषु' तथा 'खैरेमठेषु' और 'यच्छति' का पाठभेद 'गच्छति' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३५ (१) खेरी : राजतरंगिणी के तरंग ८ : १२६८ श्रीवर ३ : १८७ तथा ४ : ४४८ से यह स्पष्ट हो गया है कि खेरी एक जिला का नाम था । इसे परगना खुरनार वाव कहते हैं । यह गुलाबगढ़ तथा पीर पन्तमल के मुह दर्रा की ढालुआ उपत्यका मे विसाऊ नदी तक फैला है । गाँव खुर सर्वेक्षण मानचित्र में कूरी दिखाया गया है । खुर तथा खेरी को समान उच्चारण के कारण एक नहीं कहा गया है । कल्हण ( रा० त० ४३ ८ : १२६० ) तथा श्रीवर ( ४ : ४४८ ) ने खेरी का उल्लेख परगना देबसरसा ( दिवशर ) और अर्धवान ( अदविन ) के सन्दर्भ में किया है। दोनों परगना विसाऊ नदी के उत्तर खुर नारवाव मे मिलते हैं । इसका प्रशासन विशेष रूप से किया जाता था । यह कल्हण के 'खेरी कार्य' शब्द प्रयोग मे प्रकट होता है । ( रा० त० ८.९६०, १११८, १४८२, १६२४ ) । सिख तथा डोगरा राजकाल में खुर नरवाव जागीर पुरानी प्रथा के अनुसार राजवंशियों को दी गयी थी । (२) मठ : कल्हण ने किस स्थान के लिए खेरो मठ शब्द का व्यवहार किया है कहना कठिन है । यहाँ से दरों तक पहुँचने के लिए चलता रास्ता है । सम्भव है । खेरो मठ इस भाग पर स्थित किसी धर्मशाला के लिए व्यवहृत किया गया है । श्रीवर कश्मीर के सुलतान हसन शाह के समय खेरी मे धर्मशाला स्थापित करने की बात कहता है ( ३ : १९० ) । श्रीवर के समय तक खेरी का महत्वपूर्ण स्थान था । वह स्पष्ट प्रकट हो जाता है । शाहाभिधास्य भार्यापि मठं सुकृतकर्मठम् । खेरीविषयमार्गान्तर्निर्ममे सप्रतिग्रहम् ॥ ३:१८७

    • + खैरी चार्थव्रजं राष्ट्रं भ्रातृमन्त्रिसखेव सा । अतापयन्महोष्माद्य प्रविष्टा कटकद्वयी ॥

३३८ राजतरंगिणी देव्या कुलतरोः कन्दः क्षितिनन्दोऽवशेषितः । ततस्तस्य सुतस्त्रिंशद्वत्सरानन्वशान्महीम् ॥ ३३६ ॥ क्षितिनन्द— ३३६. देवी की कृपा से वंश वृक्ष का मूल क्षितिनन्द बच गया था । उस के पुत्र ने तीस वर्ष तक भूमि का शासन किया । द्वापञ्चाशतमब्दान्क्ष्मां द्वौ च मासौ तदात्मजः । अपासीद्वसुनन्दाख्यः प्रख्यातस्मरशास्त्रकृत् ॥ ३३७ ॥ वसुनन्द— ३३७. प्रसिद्ध कामशास्त्र² प्रणेता उसके पुत्र वसुनन्द ने बावन वर्ष दो मास³ धरती की रक्षा की ।

३३६ (१) आइने अकबरी में 'कुलनुन्द' नाम तथा उसका राज्यकाल ३० वर्ष दिया गया है । हसन लिखता है—'राजा शितोनन्द क० २४८२ में अराकीन हुकूमत मुत्तफिक मशविरा से तख्त पर बैठा और तीस साल हुकूमत किया ।' (२) क्षितिनन्द : श्री स्टीन के अनुसार लौकिक संवत् २५०५ वर्ष ४ माह १३ वें दिन राज्य सिंहासन पर बैठा था । श्री एस० पी० पण्डित ने यह समय ईसा पूर्व ५७४ वर्ष दिया है । वक का पुत्र नहीं था । सम्भव है राजा वक का सम्बन्धी रहा हो । क्योंकि राजा के पुत्र तथा पौत्र सभी भट्टा द्वारा बलि चढ़ा दिये गये थे । ३३७ (१) आइने अकबरी में 'विशनुन्द' नाम तथा उसका राज्यकाल ५२ वर्ष दो मास दिया गया है । श्री स्टीन के अनुसार लौकिक २५३५ वर्ष ४ मास १३ वें दिन राजा ने राज्यरोहण किया था । श्री एस० पी० पण्डित ने वह समय ईसा पूर्व ५४४ वर्ष दिया है । हसन—राजा वसुनन्द क० २५०२ में बाप के कायम मुकाम रौनक बख्श तख्त बादशाही हुआ । इन्तहाई राजा था । अक्लमन्द और बाहोश आदमी था । अक्लमन्द और आलिमों की कदर व मन्जिलत हद से ज्यादा करता था । किताबों से उस राजा का इश्क था । बावन बरस हुक्मरान रहकर आलम मे हमेशा के लिये रुख़सत हो गया । पृष्ठ ४० । (२) काम किंवा स्मरशास्त्र : वसुनन्द के इस प्रख्यात ग्रन्थ का अभी तक पता नहीं चला है । उसका उल्लेख अन्य ग्रन्थों में अवश्य मिलता है । स्मर का अर्थ, स्मृति, स्मरण, प्रेम, प्रणय तथा कामदेव होता है । स्मर एक राग भी है । स्मरशास्त्र का अर्थ कामशास्त्र होता है । मरीचि तथा उर्णा के पुत्रों में से वह एक था । किन्तु यहाँ पर अर्थ कामशास्त्र ही है । 'दशकुमार चरितम्' में दण्डी ने कामशास्त्र के लिये 'अनङ्ग विद्या का प्रयोग किया है । २ : ६ (३) राज्यकाल : श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अपने राजतरंगिणी के अनुवाद के पृष्ठ ५८१ पर श्री एस०पी० पण्डित के लेख को उद्धृत किया है । उनके अनुसार राज्यकाल केवल बावन वर्ष दिया गया है । दो मास और अधिक नहीं जोड़ा गया है । परन्तु श्री स्टीन तथा सीताराम पण्डित दोनों ने अनुवाद में ५२ वर्ष २ मास राज्यकाल का अनुवाद किया है । अतएव यहाँ भी मूल का अनुवाद जो ५२ वर्ष दो मास आता है दिया गया है ।

प्रथम तरंग ३३९ नरः षष्टिं तस्य सूनुस्तावतोऽब्दांश्च तत्सुतः । नृपनिभृद्दिभ्रुग्रामं योऽक्षवालमकारयत् ॥ ३३८॥ नर, अक्ष— ३३८. उसके पुत्र नर अक्ष२ ने साठ वर्ष शासन किया । उतने ही वर्ष ( साठ वर्ष ) उसके पुत्र अक्ष ने शासन किया । जिसने अक्षवाल३ ग्राम निर्माण कराया था । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३८ में 'ग्रामं' का पाठभेद 'ग्रामो' तथा ,ग्रामं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३८ (१) आइने अकबरी में नाम 'नर' तथा उसका राज्य काल ६० वर्ष दिया गया है। श्री स्टीन के अनुसार राजा का अभिषेक लौकिक संवत् २६८७ वर्ष छठवा मास तेरहवें दिन हुआ था । श्री एम. पी. पण्डित ने यह काल ईसा पूर्व ४९१ वर्ष माना है। हसन लिखता है—'राजा नर बाप की वफात के बाद क० २५४४ में ताजशाही सर पर रखा । कुल साठ बरस हकूमत में बसर करके दुनिया से रवाना हुआ ।' (२) आइने अकबरी में अक्ष का नाम 'उज' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष दिया गया है। श्री स्टीन के अनुसार लौकिक संवत् २६४७ वर्ष छठवाँ महीना तेरहवें दिन राज्यसिंहासन पर बैठा था । श्री एस. पी. पण्डित वह काल ईसा पूर्व ४३१ वर्ष मानते हैं । हसन लिखता है—राजा अच्छ राजा नर का बेटा था । साठ साल तक हकूमत किया । दुलहिन बगल में रखी और दुनिया से रुखसत हो गया । अच्छवल इसी राजा को यादगारों में से है। उसका राज्याभिषेक लौकिक वर्ष २६४७ में हुआ था । यहाँ कुछ गणना में त्रुटियाँ मालूम होती हैं। उसके पिता ने ६० वर्ष राज्य किया। उसने भी साठ वर्ष राज्य किया । पिता-पुत्र को मिलाकर १२० वर्ष हो जाता है । (३) अक्षवल : अक्ष का अर्थ, आँख, पासा, गाड़ी, धुरा, रुद्राक्ष, सर्प तथा आत्मा होता है। कल्हण के वर्णन से ज्ञात होता है कि राजा अक्ष के समय में प्रथम बार ग्राम रूप में यह स्थान बसाया गया था । इसका वर्तमान रूप हजारों वर्षों के विकास का फल है । यह नगर वर्तमान अचवल है । अनन्त नाग से दक्षिण-पूर्व ६ मील पर स्थित है। कुथर परगना में है। सुन्दर जलस्रोतो के लिए प्रसिद्ध है । बर्नियर ने अपनी यात्रा (पृष्ठ ४१३ ) में तथा बाइन ( १:३४७) ने भी इसका वर्णन किया है। नीलमत पुराण में इस जलस्रोत का नाम अक्षिपाल नाग दिया गया है। तथा च नागो व्यसरो नागो नीलमयो ब्रिहा । अशुलाक्षोऽक्षिपालश्च च प्रह्लादो यमकस्तथा ॥ मैं यहाँ १९५५ तथा १९५९ में आ चुका हूँ। अन्तिम बार १४-९-६३ में आया था । अचवल का झरना सुन्दर, शीतल तथा वेगशील है । सन् १६२० ई० में नूरजहाँ ने जलस्रोत को नियन्त्रित कर मुगल शैली का बाग निर्माण कराया है। गाथा है कि त्रिघी नदी की धारा जो थानो दिवल गाय ब्रिग परगना में लोप हो गयी है। वही अक्षवल में पुनः प्रकट हुई है। यदि थानोदिवल ग्राम में कोई टुकड़ा धारा में छोड़ दिया जाय तो वही पुनः अचवल में निकल आता है। अतएव अचवल जलस्रोत को त्रिघी की लुप्त धारा का पुनः यहाँ प्रकट होना मानते हैं। अक्षवल के पर्वत मूल में जहाँ जल निकलता है यदि उसे देखा जाय तो मालूम पड़ता है जैसे जल स्तर पर अक्ष अर्थात् नेत्र बनते और बिगड़ते रहते

३४० राजतरंगिणी

हैं। इसके कारण भी सम्भव है पूर्व काल में इसका नाम 'अक्ष' रूप जल के कारण 'अक्ष' रख दिया गया था। कालान्तर में राजा अक्ष ने अपने नाम का स्थान होने के कारण यहाँ का और विकास किया अथवा 'अक्ष' नाम रखकर अपने स्मारक तथा स्रोत के नामकरण दोनों की कल्पना की। जलस्रोत के पृष्ठ में हरित देवदारु पादप पूर्ण पर्वत है। पर्वत ऊँचा है। वह बाग के लिए सुन्दर पृष्ठभूमि उपस्थित करता है। सितम्बर मास में मैं इस बाग में कुछ दिन रह चुका हूँ। बाग में फूल खूब हैं। धारा का नियन्त्रित कर एक स्रोत दक्षिण पश्चिम दिशा तथा मुख्य स्रोत के बाग के नहरों में लाया गया है। चिनार के वृक्ष पुराने अत्यधिक और काफी संख्या में लगाये गये हैं। बाग सड़क के किनारे पर है। डाक बंगला बाग से सटा बना है। बाग के दक्षिण पार्श्व में एक सरोवर तथा बाम भाग में राजकीय मत्स्य विभाग है। मछली यहाँ अत्यधिक मिलती है। नूरजहाँ ने अक्षवल किंवा अचवल का नाम बेगमाबाद रखा था। इसे साहिबाबाद भी कहते हैं यह बाग ४६७ फीट लम्बा है। बाग पत्थर की दीवारों से घिरा है। यहाँ मुगलकालीन समय का ध्वंसावशेष मिलेगा। मध्यवर्ती नहर १६ फीट तथा उसके दोनों तरफों की नहरें ८ फीट चौड़ी हैं। मध्यवर्ती नहर क्रमशः तीन चौकोर कुण्डों को भरती चलती है। आयताकार प्रत्येक सरोवर में फुहारे लगे हैं। दो सरोवरों के प्रत्येक मध्यवर्ती नहर में ५ फुहारे हैं। अन्तिम भाग में ६ फुहारे हैं। वर्नियर ने सन् १६६३ ई० में इस स्थान पर एक रात्रि विश्राम किया था। वह स्पष्ट कहता है "यह बाग तथा स्थान कश्मीर के प्राचीन राजाओं का था। बाग इस समय मुगलों के पास है। यहाँ फलदार वृक्ष खूब लगे हैं। सरोवर में मछलियाँ बहुत मिलती हैं। इस स्थान की सुन्दरता वेग पूर्वक भूमि से निकलने जलस्रोतों के कारण बढ़ जाती है। उसे फुहारा कहने के स्थान पर मांसपिण्डी उद्गम कहना अच्छा होगा। जल इतने वेग से निकलता है कि मालूम होता है—किसी कूप के अन्दर से पम्प करके ऊपर निकाला जा रहा है। सब उद्यान के नहरों में यह पानी फैला दिया है। इसका जल निर्मल एवं हिम सदृश शीतल है। उद्यान बहुत सुन्दर है। उसमें सेब, गुमानी, नाशपाती, आलूचा तथा शाहदाना अर्थात् चेरी के फलदार वृक्ष लगे हैं। यहाँ ऊँची जल की चादर गिरती है। वह बीस या पच्चीस फीट चौड़ी होगी। पानी की चादर की तरह दिखाई पड़ती है। रात्रि के समय चादर के पीछे दिवाल में बने चरागों में जब अनेक दीप जला दिये जाते हैं सो ये प्रभावोत्पादक बड़ा सुन्दर बाह्य- निक प्रभाव उत्पन्न करते हैं, (पृष्ठ ४१८) बादशाह जहाँगीर यहाँ पर आ चुका है। उसने अपने पन्द्रहवें जलूसी वर्ष में यहाँ का वर्णन अपनी आत्म-कथा में किया है। 'मंगल को अक्षवल के जलाशय के समीप शिविर पड़ा। पहले की अपेक्षा इसमें जल अधिक है। इसमें एक सुन्दर जलप्रपात है। इसके चारों ओर ऊंचे मीनार और सर्वेश के वृक्षों के समूह ऊपर जाकर ऐसी मिल गये हैं कि इनके नीचे बैठने के लिये जैसे कुंज बन गया है। जहाँतक देखा जा सकता है वहाँ तक जाफरी फूलों का खिला हुआ उद्यान सुन्दर दिखायी देता है। जैसे यह स्वर्ग का एक दुपट्टा है।' (पृष्ठ ६८२) जहाँगीर ने अपने जलूसी वर्ष १७ में ७ शव्वाल को पुनः कश्मीर की यात्रा की थी। वह अचवल पहुँचा। उसने एकम शहरिवर को अचवल की यात्रा प्रथम यात्रा के दो वर्ष बाद की थी। इस अवसर पर उसने केवल इतना ही लिखा है—'अचवल के जलाशय के समीप ठहरे। और गुरुवार को महोत्सव वही मनाया गया।' (पृष्ठ ७५१)

प्रथम तरंग ३४१ जुगोप गोपादित्योऽथ क्ष्मा साद्वीपां तदात्मजः । वर्णाश्रमप्रत्यवेक्षादर्शितादियुगोदयः ॥३३६॥ गोपादित्य— उनके आत्मज गोपादित्य ने सद्वीप पृथ्वी की रक्षा की, जिसने वर्णाश्रम परिपालन द्वारा आदि युग का उदय दिखा दिया था ।

अचवल का विकास आधुनिक ढंग पर हुआ है । नगर का यथेष्ट विकास हो गया है । नगर में मस्जिदें काफी हैं । बाग के सम्मुख वाम भाग में एक शिव मन्दिर है । आधुनिक मन्दिर है । मैं मन्दिर में पूजा करने गया था । एक महिला 'जय जगदीश हरे' मधुर लय मे गा रही थी । एक प्रौढ ब्राह्मण सांगोपाग पूजन कर रहे थे । मन्दिर तथा पूजा देखकर काशी की याद आती थी । पूजा में कोई भेद नहीं था । मन्दिर के बाहर भी एक लिंग था उसकी भी पूजा की जाती है । मैं प्रातः काल घूमने निकला । सडक पर पहुँचा । चौराहे पर मुझे एक मृत्तिका पात्र कसोरा में आटा, दाल, लाल मिर्चा रखा मिला । मैं खड़ा हो गया । उत्तर भारत मे इसे 'उतारा पुतारा' कहते हैं । यह प्रथा किसी न किसी रूप में समस्त भारत में प्रचलित मिलेगी । भारत में प्रायः चौराहों पर प्रेत बाधा, महामारी तथा कष्ट निवारणार्थ श्वेत कूष्माण्ड काटकर फूल अक्षत के साथ रखा जाता है । धार अर्थात् जल में कुछ पदार्थ मिलाकर स्त्रिया रात्रि किंवा ब्राह्म मुहूर्त में चौराहा पर जल गिरा कर हाथ जोडती है । इस प्रकार का संस्कार प्रायः समस्त भारत मे मिलेगा । यह एक ही जन जीवन एवं संस्कृति का परिचायक है । यहाँ से कुछ दूर पर उमा देवी का मन्दिर है । अचवल से लगभग १ मील दूर एक स्वामी जी का आश्रम है । स्वामी जी बंगाली हैं । आश्रम का नाम रामकृष्ण सम्मेलन आश्रम है । स्वामी जी ने अपने हाथों सब कुछ बनाया है । उनकी कुटी के ऊपर एक सुन्दर मन्दिर बना है । उसमे श्री रामकृष्ण परमहंस देव की तस्वीर गर्भगृह में पूजा निमित्त रखी है । अचवल में हिन्दू धर्म की एक छाया तथा आश्रम यही देखने को मिला । प्रसन्नता हुई । यहाँ कभी वेद की ऋचाओं का उद्घोष होता था । यज्ञ की वेदियों से पवित्र धूम्र ज्योति उद्भूत होती गगन को ओर बढती, मानव मे आध्यात्मिकता का संचार करती थी । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३९ में "प्रत्यवेक्षा" का पाठभेद 'प्रत्यवीक्षा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३९ (१) : आइने अकबरी में नाम 'कुवोत' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष ६ दिन दिया है । राजा ने बुद्धिमानीपूर्वक न्याय पूर्ण राज्य किया था । उसने विजय भी बहुत की थी । उसके राज्य में जीव-हत्या वर्जित थी । राजादेश के अनुसार मास भक्षण निषेध था । सुलेमान ( शंकराचार्य ) पर्वत पर जो मन्दिर खड़ा है, वह इसी राजा के वजीर का निर्माण कराया है । श्री स्टीन राजा गोपादित्य का राज्याभिषेक लौकिक संवत् २७०७ वर्ष छठवा मास तेरहवें दिन देते हैं । श्री एस० पं० पण्डित वह समय ईसा पूर्व ३७१ वर्ष मानते हैं । हसन : 'राजा गोपादित्य बाप की वफात के बाद क० २६७४ में मुल्क हाकिम होकर कश्मीर की तमाम सरहदें अपने कब्जा एकदार में ले आया । रैयत परवरी और इन्साफ से काम लेने में लासानी था । मौजा खुली नार व उद में बाग बेरह में हाथ गाम करधन में इस्कूरूह पुर बागल और दागिस में

३४२ राजतरंगिणी सखोलखागिकाहाडिग्रामस्कन्दपुराभिधान् । शमाङ्गासमुखांश्चाग्रहारान् यः प्रत्यपादयत् ॥ ३४० ॥ जिसने खोल¹ सहित, खागिका², हाडा ग्राम³, स्कन्दपुर⁴, शमांगगादि⁵ मुख्य अग्रहारों को दिया था । इसकी यादगारों में से है। बेशुमार ग्राम बरहमनों और फकीरों को बख्श दिये और कई मन्दिर भी आबाद किये । जेष्ठेश्वर का मन्दिर जो 'काह गुले- मान' पर वाका है उसकी अजसरेनव तामीर व मरम्मत कराई । मौजा गोपकार और बछपारा बतौर लंगर इस 'बूतखाना' के लिये वक्फ कर दिये । अपनी कलमरो किसी को भी जानकर मारने की इजाजत नही देता था । साठ बरस ६ माह हुक्मरानो करके मर गया । पाठभेद : श्लोक संख्या ३४० में 'खोल' का 'खिला', 'हाडिग्राम' का 'हाडियामे' और 'शमाङ्गान' का 'शमाङ्गादि,' 'शमाजासा' तथा 'शमाजास' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४० (१) खोल : वर्तमान ग्राम खूली है। डलर परगना में है। खोल का अर्थ विकलाग तथा शिरस्त्राण होता है। खोलक का अर्थ ग्राम अथवा पुरवा होता है। (२) खागिका : वर्तमान खागी अर्थात् खाग ग्राम है। उल्लेख पृ० १२५ पर किया गया है। खागि, खागिक, खाग एक ही नामवाचक शब्द है। नीलमत में एक खाग नाग का उल्लेख आया है। स्वर्गः शिशिरवासी च आवासः श्रीधरः खगः । लाङ्गली बलभद्रश्च स्वरूपः पञ्चहस्तकः ॥ ९०५ : १०७१, १०७२ (३) हाडी ग्राम : वर्तमान आडग्राम है। आजकल इसे आरगोम गाव कहते है। नागाम परगना में है। इसका उल्लेख ( रा०त० ८.६७२, १५८६ तथा २१९६ ) कह्ण ने किया है। पं० काशीराम को सन् १८९१ में यहाँ कुछ मन्दिरों के भग्नावशेष मिले थे । इस समय यहाँ दो चार पत्थरों के और कुछ विशेष सामग्री मुझे नहीं मिल सकी । यह शब्द लौकिक तथा स्थानीय प्रचलित नाम मालूम होता है । (४) स्कन्दपुर : वर्तमान गांव खोंम्फर है। यह एक बड़ा गांव कुयर परगना में है। तेलवान तथा नौगाम के बीच मे पड़ता है। नीलमत पुराण में स्कन्दायतन, स्कन्देश्वर तथा स्कन्द तीर्थ का उल्लेख आया है। श्री स्टीन ने यहाँ की यात्रा सन् १८९१ ई० मे की थी। इसके विषय में उन्होंने कुछ लिखा नहीं है। मुझे इस स्थान पर कुछ विशेष सामग्री उल्लेखनीय नहीं मिली। इस समय अच्छा ग्राम है। कश्यप नील समागम तीर्थ वर्णन के प्रसंग में स्कन्द के निवास स्थान का उल्लेख मिलता है। सुवर्णबिन्दुस्तत्रैव हरस्यायतन शुभम् । स्कन्दस्यायतनं तत्र सर्वपापप्रिसूदनम् ॥ 112 : १५५ ॥ नीलमत में वितस्ता माहात्म्य के सम्बन्ध में स्कन्द तीर्थ का उल्लेख किया गया है। स्नात्वा तु मद्रतीर्थे च स्कन्दतीर्थे च मानवः । तथा सुरेश्वरीतीर्थे स्वर्गलोके महीयते ॥ 1388 : १५३२ ॥ नीलमत में देवायतन कीर्तन के प्रसंग में स्कन्देश्वर का वर्णन मिलता है। उनका स्थान मालि वन में माना गया है।

प्रथम तरंग ३४३ ज्येष्ठेश्वरं प्रतिष्ठाप्य गोपाद्रावार्यदेशजाः । गोपाग्रहारान्कृतिना येन स्वीकारिता द्विजः ॥ ३४१ ॥ ३४१. गोपाद्रि पर ज्येष्ठेश्वर¹ की प्रतिष्ठा कर, कृती जिस राजा ने आर्यदेशीय द्विजों से गोप अग्रहारों³ को स्वीकृत कराया । भाल्ये वने गौतद्देशं विश्वामित्रेश्वरं तथा मौनासिकं वसिष्ठेशं भारद्देशं सुरेश्वरम् ॥ 966 : १।६७ स्कन्देश्वरं वशिष्ठेशं पौलस्त्यमपरं तथा । दृष्ट्वा कुमारमेकैकं फलं गोदानजं लभेत् ॥ 997 : १।६८ ॥ (५) शामांगांस : वर्तमान सांगम है। यहाँ पर षड्दस्त कार्त्तिकेय अर्थात् स्कन्द की मूर्ति पांचवीं शताब्दी की मिली है। एक और मूर्ति अर्धनारीश्वर के साथ अवन्तीपुर के ध्वंसावशेष से प्राप्त हुई है। कार्त्तिकेय की पूजा चैत्र में होती थी। यह पूजा कश्मीर के शिशुओं एवं कुमारो के कल्याण हेतु की जाती थी। ३४१ (१) ज्येष्ठेश्वर और गोपाद्रि : गोपा पर्वत शंकराचार्य पर्वत है। गोपा अर्थात् गुपकर ग्राम इस पर्वत तथा डल लेक के मध्य इस समय भी मौजूद है। मुसलमान लोग शंकराचार्य पर्वत को 'तख्त-ए- सुलेमान' कहते हैं। इसी प्रकार साइरेस (कुरु) महान, जिसने मोडिया जीता था तथा जिसकी मृत्यु सन् ५६६ ई० पू० हुई थी, उसकी राजधानी की अधित्यका को भी 'तख्त ए-सुलेमान' कहते हैं। साइरेश का संस्कृत नाम 'कुरु' कहा जाता है। इस महान् सम्राट् की समाधि को मुसलमान लोग 'हजरत सुलेमान' की माता की मसजिद कहते हैं। हजरत सुलेमान मुसलमान नहीं बल्कि यहूदी थे। मुस्लिम धर्म के उत्पन्न होने के हजारों वर्ष पूर्व हुए थे। यहाँ पर वन्ध्या स्त्रियाँ, पुत्र तथा सन्तान निमित्त मन्नतें मानती हैं। फर्गहान के एक बौद्ध स्मारक को भी 'तख्त-ए-सुलेमान' कहा जाता है। शंकराचार्य के वर्तमान मन्दिर का कई बार जीर्णोद्धार किया जा चुका है। अकबर, जहाँगीर और औरंगजेव के समय में यह भग्नावस्था में पड़ा था। इसका अरबी आलेख जिस समय कश्मीर के लोग प्रायः मुसलमान हो चुके थे, उस समय लिखा गया था। बरनियर ने अपने यात्रा वृत्तान्त में लिखा है। यहां एक छोटी मस्जिद थी। औरंगजेब के समय पुनः मन्दिरो के तोड़ने की हवा बह चली थी। उस समय रिवाज हो गया था। जहाँ हिन्दुओं का तीर्थ स्थान या बड़ा मन्दिर होता था, वहां मस्जिद तथा जियारतें बना दी जाती थी। गोपा पर्वत से डल लेक का मनोमुग्धकारी दृश्य दिखाई देता है। मुसलमान इतिहासकार मोइजुद्दीन कहता है 'तख्त-ए-सुलेमान' पर एक मन्दिर अथवा स्तूप बनाया गया था। उसमें प्रचं- लित किंवदन्ती के अनुसार प्रभु 'ईसामसीह' की अस्थियां रखी गयी थी। रफीउद्दीन कहता है 'सिकन्दर वुत शिकन ने इसको नष्ट करवा दिया था।' श्री नारायण कोल के समय मन्दिर मौजूद था। बरनियर ने इसका उल्लेख किया है। फोस्टर इसका उल्लेख नहीं करता। कहता है—'इस पर्वत के दूसरी तरफ एक दूसरा पहाड़ है। वहाँ एक छोटी मस्जिद है। उसमें बगीचा भी है। एक बहुत पुरानी इमारत है। वह एक मूर्ति का मन्दिर प्रतीत होता है।

३४४ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ] गोपाद्रि गिर, गोपकार, तख्त-ए-सुलेमान, शंकराचार्य पर्वत, ज्येष्ठेश्वर आदि सब एक ही पर्वत के नाम हैं। गुपकर गांव उत्तर-पूर्व पर्वत के मूल में और डल के तट पर है। (रा० त० ८:११०४, १०)। पर्वत श्रीनगर के पूर्व दिशा में है। राजतरंगिणी (१:१२४) से मालूम होता है। अत्यन्त प्राचीनकाल से ज्येष्ठेश्वर शिव की पूजा यहाँ होती रही है। इस समय जेवर में देवस्थान है। वहाँ पूजा होती है। वह इस पर्वत के समीप है। ज्येष्ठेश्वर का जो वर्णन राजा गोपादित्य के सन्दर्भ में किया गया है, वह निसन्देह इसी पवित्र स्थान से सम्बन्ध रखता है। यह वही स्थान है, जहाँ इस समय शंकराचार्य पर्वत पर, शंकर का मन्दिर स्थित है। मन्दिर में इस समय विशाल शिव लिंग स्थापित है। मैं इस स्थान की कई बार यात्रा कर चुका हूँ। श्री फरगुसन ने ठीक ही कहा है 'वर्तमान मन्दिर बहुत बाद का निर्माण है।' (पृष्ठ २८२।) मन्दिर का ऊंचा अधिष्ठान तथा सीढियां, निसन्देह कल्हण द्वारा देखी हुई गोपादित्य के मन्दिर की निर्माण हैं। इस पर्वत पर इस मन्दिर के अतिरिक्त और कोई प्राचीन निर्माण अथवा किसी प्रकार का ध्वंसावशेष नहीं रह गया है। मेरी जानकारी में यहाँ अभी तक कोई प्राचीन वस्तु नहीं मिली है। एक बड़े निर्माण के लिए इस पर्वत पर यही एक उपयुक्त स्थान है। जहां बड़े पैमाने पर कुछ बनाया जा सकता था। ज्येष्ठ का अर्थ सबसे बड़ा होता है। यह पर- मेश्वर के लिये भी प्रयुक्त किया गया है। यह सामगान का एक प्रकार भी है। मलमास, अधिक- मास तथा ज्येष्ठमास तीन वर्ष के पश्चात् पड़ने वाले अधिक चन्द्रमास के लिये प्रयोग किया जाता है। ज्येष्ठा नक्षत्रयुक्त पूर्णमासी अर्थात् ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के लिये भी ज्येष्ठ शब्द का प्रयोग किया


[दायाँ स्तम्भ] गोपाचल ग्वालियर के समीप भी एक पर्वत है। ग्वालियर का एक नाम गोपा है। गोप का प्राचीन अर्थ रक्षक किंवा रक्षा करने वाला होता है। शंकराचार्य मन्दिर का सबसे पुराना फोटो कर्नल कोल की पुस्तक में (पृष्ठ १-८८) छपा है। उस समय (सन् १८८६ ई०) मन्दिर पर पेड़ तथा घास जम गये थे। मन्दिर की मरम्मत नहीं हुई थी। मन्दिर का बाह्य आकार जैसा उस समय था वैसा ही इस समय भी है। मन्दिर श्रीनगर के भूमितल से १००० फुट ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। कोल का कहना है कि परम्प- रागत गाथा के अनुसार यह मन्दिर राजा जालुक ने ईसापूर्व २२०' में निर्माण कराया होगा। मार्शल का मत है कि कश्मीर के अन्य हिन्दू मन्दिरों का जो काल है, वही इस मन्दिर का है। मन्दिरों पर लोग अपना नाम तथा निर्माण काल खुदवा दिया करते हैं। श्री फरगुसन को प्रारम्भ में भ्रम हो गया था। उसने मन्दिर पर हिजरी १०६९ लिखा देखा था। अतएव उन्होंने धारणा बना ली—मन्दिर जहांगीर के काल में बनाया गया था। यह भ्रम है। इसी प्रकार मन्दिर के अन्दर दक्षिण पश्चिम स्तम्भ पर लिखा है। एक साहूकार 'हाजो हुश्ती' ने संवत् ५४ में शिव का निर्माण किया'। उस समय इस्लाम धर्म का उदय नहीं हुआ था। उसी स्तम्भ के नीचे एक जगह लिखा है 'ख्वाजा रुकन वल्द पीर जान ने मन्दिर बनवाया।' इसमें संवत् अथवा हिजरी सन् नहीं दिया गया है। कल्हण के अनुसार गोपादित्य ने मन्दिर का निर्माण ईसा पूर्व ३६८-३०८ वर्ष में किया था। किसी विशेष प्रमाण के अभाव में मूलमन्दिर का निर्माण काल यह मान लिया जा सकता है। राजा अभिनव गुप्त (सन् ६९३-१०१५ ई०) के समय की किंवदंती प्रचलित है। शंकराचार्य के एक शिष्य का यहां आगमन हुआ था। वह वेदान्ती थे। शक्ति में उसका विश्वास नहीं था। एक दिन

प्रथम तरंग ३४५ उसको बहुत भूख लगी। मार्ग में एक स्त्री को दूध लिये जाते देखा। दूध मांगा। स्त्री ने कहा। पर्वत से नीचे उतरिए। दूध दूँगी। उत्तर मिला। शक्ति नहीं है जो पर्वत से उतर सकूं। स्त्री ने उत्तर दिया। शक्ति कैसे होगी। तुम शक्ति में विश्वास नहीं करते। वेदान्ती को बात लग गयी। शक्ति में विश्वास करने लगे। 'सौन्दर्य लहरी' जैसे प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना शक्ति की प्रशंसा एवं स्तुति में की। मन्दिर पतला है। इसका अधिष्ठान २० फुट ऊँचा है। यह १३ परत शिलाखण्डों का बना है। बारो कोणों पर तीन कोणाकार अधिष्ठान बना है। बौद्ध शैली के आधार पर बौद्ध लोग इसे अपना पवित्र मन्दिर मानते हैं। यही मन्दिर का बाह्य रूप है। कोणाकार रूप के कारण जो बौद्ध स्तूपों में पाया जाता है, कुछ लोगों का मत है यह बौद्ध मन्दिर था। मन्दिर का बाहरी चौतरा ३३ फुट चौड़ा है। उसपर मुंडेरा तुल्य बनावट मन्दिर के अष्टभुजीय रूप को प्रकट करता है। मन्दिर के चबूतरे पर पहुँचने के लिए तीन वर्गों में पत्थर सीढ़ियों की बनी हैं। पहला ६, दूसरा ७ तथा तीसरा १८ सीढ़ियों का बना है। अट्ठारह सीढ़ियों वाली चढ़ान दोनों ओर से दिवालों द्वारा बन्द हैं। इसके पश्चात् १० सीढ़ियो से चढ़ने पर मन्दिर के द्वार तक पहुँचा जा सकता है। मन्दिर का गर्भगृह गोलाकार है। अर्चा में एक बड़ा लिंग है। मन्दिर का शिखर २५ फुट ऊंचा है। यह चबूतरे में ५ फीट ऊंचाई पर है। चबूतरे का परिवेश १०० फुट होगा। मन्दिर का व्यास १४ फिट है। छत ११ फुट ऊंचाई से आरम्भ होती है। छत के आधार तुल्य चारों कोनों पर चार अठपहले स्तम्भ है। दिवाल ७१/२ फुट मोटी है। सम्पूर्ण मन्दिर शिलाखण्डो अर्थात् पत्थर का बना है। मन्दिर की शिल्पकला का नाम कश्मीरी हिन्दू कला दिया जा सकता है। यह मन्दिर बंगाल के मन्दिरों के शिल्पकला के आकार तथा रूप से कुछ मिलता है। कर्नल कोल ने मन्दिर का प्लान पृष्ठ १-८८ पर दिया है। शिव लिंग के चारो तरफ लपटे हुए सर्प की बात कही गयी है। मुझे सर्प तुल्य कोई वस्तु लिंग से लिपटी हुई नहीं दिखाई पड़ी। सम्भव है। प्राचीन शिवलिंग के स्थान पर नवीन शिव लिंग की स्थापना मन्दिर के जीर्णोद्धार के समय की गयी है। कैप्टन श्री नाइट लिखता है : (सन् १८६१ ई०) यह भूमि से एक हजार फुट ऊँचा है। कहा जाता है कि अशोक के पुत्र जलोक ने इसका निर्माण कराया था- इस मन्दिर का प्लान अठपहला अर्थात् अष्टकोणीय है। प्रत्येक पहल १५ फिट लम्बा है। मन्दिर में १५ सीढ़ियां चढ़कर पहुँचा जाता है। प्रत्येक सीढ़ी आठ फिट चौड़ी है। उसके दोनों तरफ बालुआ दीवालें है। मन्दिर की दीवाल आठ फुट चौड़ी है। यह एक सब से बड़ा प्रमाण है कि वह मन्दिर बहुत पुराना था। (एपिएडिक्स ए. पृष्ठ ३५४ (१८६१) वह मन्दिर के विषय में लिखता है- मन्दिर इस समय दो हिन्दू साधुओं की संरक्षता में है। यहां मैने दो बड़े गन्दे फकीरो अथवा धार्मिक साधुओं को देखा। उनमें एक सो रहा था। उसका पैर धूल तथा भस्म में पड़ा था, दूसरा अविचल बैठा था। उसकी एक भी मांस- पेशियाँ तक हिल नहीं रही थीं। वह प्रातःकालीन सूर्य में धूप खा रहा था। दोनों प्रायः नंगे थे। उनके शरीर पर तथा मुख पर राख पुती हुई थी। उनके बाल लम्बे और जटा का रूप ले लिये थे। वे दोनों जगत् से जैसे सम्बन्ध तोड़ चुके थे। मै वहां पर था। परन्तु उनमें से किसी ने मेरी तरफ न तो देखा और न ध्यान दिया। उन्हें मेरी उपस्थिति का जैसे ज्ञान भी नहीं था। यद्यपि मैने उनमें से एक का स्केच किया। दोनों की तरफ बहुत देर तक इस प्रकार ध्यान पूर्वक देखता रहा जैसे किसी विड़ियाघर में कोई नया जानवर आया हो परन्तु उन्हें जैसे इन सबका कोई ज्ञान ही नहीं था। ४४