राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 444, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग । ३२९
राजपुरो से पश्चिम घूमने पर पर्णोत्स अथवा रा० त० ६ : ३१२ में वर्णित वृन्त मे एक व्यक्ति तुंग खस मिलता है। वह चरवाहा था। रानी दिद्दा के समय अत्यन्त शक्तिशाली मन्त्री बन गया। (रा० त० ७ : ७७३) प्रतीत होता है। तुंग के वंशज रानी दिद्दा के पश्चात् काश्मीर के राजा हुए थे। उन्हें निम्न समझा जाता था। खस लोगो की भाषा परिष्कृत नही थी। वे अशुद्ध बोलते थे। इससे प्रतीत होता है वे विशेष सुसंस्कृत नही थे। वे पर्वतीय थे। नगर निवासियो के समान व्याकरण शुद्ध भाषा बोलन के आदी नही थे। खशालय काश्मीर उपत्यका के पूर्व दक्षिण वर्तमान उदिल क्षेत्र है। वह क्षेत्र भृंग तथा शाहाबाद अंचल के पूर्व दक्षिण ओर पड़ेगा। बक्री बल तथा मरबल पास इसके पश्चिम में पड़ेंगे। इसका वर्णन शुक चौथी राजतरंगिणी में करता है। 'खशालयस्थं चक्रेशं त्रिसृष्टस्तैर्महात्मभिः । लेखहारस्तमाह स्म मार्गेश मुखवाचिकम् ॥ शुक० रा० : २ : २ : ३५ वितस्ता उपत्यका के अधोभाग में बारहमूला के आगे खस रहते थे। वोराका को खसो का एक केन्द्र कहा गया है। (रा० त० ८ : ४०९) यह स्थान प्राचीन दृशद्वती के समीप था। दृशद्वती को इस समय द्वारावेशी कहते है। वितस्ता उपत्यका का यह भाग कधाई तथा मुजफ्फराबाद के मध्य है। आधुनिक खक्ख जाति और खस एक ही है। काश्मीर में वितस्ता उपत्यका के अधोभागीय प्रायः सरदार इसी जाति के हैं। खक्ख शब्द खस का अपभ्रंश है। वितस्ता उपत्यका के खखा सरदार सिख राज आगमन के पूर्व अर्ध स्वतंत्र हैसियत रखते थे। अपने पड़ोसी बोम्बा कबीले के साथ सख लोग काश्मीर के लिए एक समस्या हो गये थे। उनका भयंकर क्रूर कर्म जो शेख इमामुद्दीन के समय में (१८४६) किया गया था, अभी तक लोगो को याद है। काश्मीर के मर्दुमशुमारी सन् १८९१ ई० के रिपोर्ट पृष्ठ १४१ पर खखो की आबादी ४१४६ दी गई है। उनकी जाति मुस्लिम पर्वतीय राजपूतो का एक उपजाति लिखी गयी है। (पृष्ठ २०१) खश जाति का मार्कण्डेय पुराण में पर्वताश्रिता जाति कहा गया है। अर्थात् यह जाति पर्वत में रहती थी। अतो देशान् प्रपश्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये। नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवो गुमेणाः खशाः ॥
-
- + गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् । कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् समान् ॥ ॥ ५७ : ५६ ॥ महाभारत सभा पर्व में भी खस जाति का उल्लेख आता है। उन्हें शको तथा दरद जातियो तुल्य अर्ध सभ्य जाति में शामिल किया गया है। महाभारत सभा पर्व : (५१६ : १८४९) तथा (द्रोण पर्व ११ : ७९९ : १२१, ७)। सभा पर्व में पुनः एक स्थान पर उल्लेख आता है । वे मरु तथा मन्दर पर्वत के मध्य शैलदा नदी की उपत्यका में रहते थे। (सभा पर्व ५१ : १८४८; ५१ : १८४९)। शैलदा नदी पश्चिमी पर्वत के वरुण पर्वत से निकली है और पश्चिम सागर में गिरती है। (मत्स्य पुराण : १२० : ३३)। मनु ने उन्हें क्षत्री माना है। परन्तु ब्राह्मणो के प्रति श्रद्धा न होने के कारण वे पतित हो गये। (मनुस्मृति १० : ४३ : ४)। उन्हें काशगर से कुछ विद्वान् सम्बन्धित करते हैं। मार्कण्डेय पुराण (३४६ : ३५०) के अनुसार उन्हें शल्य, नीप, शक और शूरसेन आदि जातियों के साथ रखा गया है। सेन तथा पालवंश के शिलालेखों में इनका उल्लेख आता है।
४२