भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[Header] प्रथम तरंग ३१७

[Left Column] तथा दरवाजे तक नहीं लगे हैं। सराय की अपेक्षा इसे अस्तबल कहना ठीक होगा। फिर भी तूफ़ान में इसमें रक्षा की जा सकती है। यह इतना ठण्डा तथा डरावना है कि यहाँ पर किसी प्रकार का सामान नहीं मिलता। सराय के चारों तरफ कैम्प लगाने लायक स्थान है। नदी के तट के समीप यहाँ हैजे द्वारा सन् १८७६ में मरे अल्फ्रेड जान वले एस० टी० की कब्र है। इस सराय पर पहुंचने के पूर्व रामम्बार नदी के दक्षिणी तट परे एक स्रोतस्विनी इससे मिलती है। उसे लट्टी नाला कहते हैं। इसके तट से मार्ग नन्दन सर तथा भगसर को जाता है। इन सरों में राजौरी से दरहल दर्रा से होकर पहुंचा जा सकता है। वहां दो-तीन पड़ाव डाल कर पैदल पहुंचा जाता है। यहां जाने के लिए बरमगल्ला या पोशियन या हुर- पुर से सामान आदि ले लेना चाहिए। रावलपिण्डी से आने वाले मार्ग पर यह कश्मीर उपत्यका के सबसे समीपवर्ती पड़ने वाले सर हैं। बड़ी ऊंचाई पर होने के कारण स्थान शीतल, पथरीला तथा रहने योग्य नहीं है। कठिनता से जलोनी लकड़ी मिलती है। यहाँ कुछ उपज नहीं होती। कस्तूरी मृग अलियाबाद सराय के ऊँचे पर्वतीय स्थाना में मिलते हैं। अलियाबाद में यात्रियों को नहीं ठहरना चाहिए। सराय से ६ मील दूर शादीद में ठहरना चाहिए। कैम्प लगाने लायक स्थान रामम्बार नदी के दक्षिण तट पर मिल जाता है। यहाँ से सुपियान एक दिन में जाया जा सकता है। कैप्टन नाइट ने सन् १८६० जून २७ में यहां की यात्रा की थी। वह अपनी पुस्तक में लिखता है—दो मील दर्रा से नीचे उतरने पर अलियाबाद सराय मिली। वहां पर रहने लायक एक भाग था जिसमें एक फकीर या मुल्ला रहता था। और एक युवक बंगाली तोपची जो शिकार खेलने आया था रहता था ! लगभग मध्याह्न काल में पानी बरसने लगा। वहीं एक कष्टप्रद रूम में बचाव के

[Right Column] लिए गया। वहाँ की फर्श सीलन से भरी थी। वहाँ पत्थर के बहुत ही सुन्दर संगतराशी की एक खिड़की थी। वहाँ की शेष इमारतों से वह मेल नहीं खाती थी। सराय के बीच में हरा जल से भरा एक गड्ढा था। पृष्ठ ७१ डब्ल्यू०डब्ल्यू० अटर्केड (१८७५) संक्षेप में केवल इतना कहता है। पोशियन में अलियाबाद सराय जाया जाता है। दोनों के मध्य में दूरी ११ मील है। एक दिन में मार्ग खत्म किया जा सकता है। मुख्य दर्रा पीर पंजाल का यहाँ से पार किया जाता है। वह ऊंची और खड़ी चढ़ाई है। चढ़ाई ऊंचाई पर टेढ़ा मेढ़ा घोर पहाड़ का किनारा काटकर कर मार्ग बनाया गया है। मार्ग काफी अच्छा है। परन्तु कहीं कहीं पर बड़े बड़े पत्थरों के ढोंकों और असम्बन्धित पत्थरों के कारण उबड़ खाबड़ है। मुझे बड़ा आश्चर्य मालूम होता था कि कैसे रहूँ। खच्चड लदे हुए एक चट्टान से दूसरे चट्टान पर बिल्ली की तरह कूदते हुए चलते थे। ऊपर को चढ़ाई धीमी पड़ जाती है। पेत- शिया से प्रस्थान करने पर चार घण्टे में शिखर पर पहुँचते हैं। जहाँ से पोशियाना ६ मील पीछे छूट जाता है। शिविर उतराई क्रमशः सरल दूर्वाच्छादित प्लेटो दर से आरम्भ हो जाती है। ५ मील लम्बा तथा आठ मील चौड़ा मार्ग ५ मील चलकर अलियाबाद सराय पहुँचा देता है। यह यात्रियों के लिए एक साधारण आश्रम स्थान है। यह एकाकी एक निर्जन स्थान में खड़ा है। वर्ष के अधिक महीनो में वह वीरान पड़ा रहता है। क्योकि बर्फ के कारण यहाँ पहुँचना कठिन हो जाता है। वादशाह (औरंगजेब) पीर पंजाल पर्वत पर चढ़ रहे थे। वह पहाड़ों में सबसे ऊँचा था। वहाँ से कश्मीर का दृश्य मिल जाता है। बादशाह के पीछे हाथियों की लम्बी कतार थी। जिनमें महिलाएँ थीं। हौदों तथा अम्बारियो में बैठी थी। पहला हाथी लम्बी चढ़ाई देखकर भयभीत हो गया। वह पीछे