भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 428

प्रथमतरंग ३१५ तदाकर्णनसंरम्भे सहर्षोऽथ विशुद्धधीः । शतमन्यद्गजेन्द्राणां हठेन निरलोठयत् ॥ ३०३ ॥ ३०३. उस समय विशुद्धधी, प्रसन्न उस राजा ने, उस घोष को सुनने के उत्साह में एक सौ दूसरे हाथियों¹ को बलात् गर्त² में गिरवा दिया ।

(३) गज-हाथी : वरनीयर इसी प्रकार की औरंगजेब के समय की एक घटना का वर्णन करता है, जबकि हाथी पीर पंजाल पन्तसल या पंचाल धारा पर्वत पर चढ़ रहा था, तो गर्त में गिर गया । ३०३. (१) हाथी : सुंग युन तथा कोसमस इण्डिको प्लीपुस्टेस (पृष्ठ ७९) दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि श्वेत हूणों की सेना में हाथियों का एक बड़ा भारी समूह था । सुंग युन लिखता है कि सेना में सात सौ हाथी थे। इण्डिकोप्लोपुस्टेस से प्रतीत होता है कि 'गोल्लास' (मिहिरकुल) के युद्ध में जाते समय एक सहस्र हाथी से कम उसके पास नहीं थे। (२) गर्त : हस्तिवंज : प्राचीन काल से ही यह घटना जहाँ हुई थी उसे लोग जानते हैं। इस घटना के पश्चात् से मिहिरकुल जिस मार्ग से लौटा था उसे हस्तिवंज कहने लगे थे। आइने अक- बरी में यह घटना राजतरंगिणी से ली गयी है। उसमें गलती से 'हस्तीवतर' स्थान का नाम लिखा है। काश्मीर इतिहास लेखक हैदर मलिक, नारायण कौल और बीरबल कचरू हस्तिवंज ही नाम देते हैं। उसे पीर पंजाल पर्वतमाला में ही स्थित करते हैं। स्टीन ने स्वयं सितम्बर १८६१ में इस स्थान की यात्रा की थी। उसने वहाँ स्थान तथा लोक- श्रुति का पता लगा लिया था। उसने वहाँ का विस्तृत वर्णन टोपो ग्राफी पीर पन्तसाल मार्ग जे० ए० एस० पी० १८९५ पृष्ठ ३७६ पर दिया है। पुराने मुगल मार्ग का वर्णन किया है। हूरपुर अर्थात् शूरपुर (३:२१७) से यह मार्ग कुछ दूर तक रामम्यार नदी के दक्षिण तट के साथ चलता है। फिर मार्ग यह ऊँचाई पार करता वाम अथवा उत्तरी तट पर चलता पुरानी मुगल सराय जिसे 'अलियाबाद' कहते हैं पहुँचता है। दक्षिणी पार्श्व के संकुचित मार्ग के दूसरी तरफ लगभग आध मील अलियाबाद के अधो- भाग में एक ऊँची पर्वतीय ऊर्ध्व भूमि मिलती है। वहाँ से कगार की चट्टान ढालुआ होती नदी के पेटा में मिल जाती हैं। यह झुकी हुई ऊर्ध्वभूमि हस्तिभंज का स्थान कहा जाता है। यहाँ के सभी लोग इस बात को दुहराते हैं। एक राजा का हाथी यहाँ से नीचे खड्ड में गिर गया था। राजा का नाम उन्हें नही मालूम है। हाथी स्वयं गिरा था। अथवा गिरा दिया गया था। यह भी उन्हें मालूम नहीं है। अकबर के सड़क बनवाने के पहले मार्ग हस्तिवंज टीले पर से रामम्यार नदी के दक्षिण तट से जाता था। आइने अकबरी में अबुल फजल भीमबर से काश्मीर के अनेक मार्गों का वर्णन करता है। वह हस्तिवंज (हस्तिवतर) का उल्लेख अलग करता है (२:७१३०)। यह पूर्वकालीन मार्ग था। अकबर की सेना इसी मार्ग से काश्मीर पहुँची थी। पीर पंतसल का मुगल मार्ग जो पोसियाना तथा यहराम गल्ला होकर जाता है वह दक्षिण से उस मार्ग से मिलता है। जो नन्दन सर के पास से दुरहाल दर्रा होता राजोरी जाता है। यहाँ से दक्षिण का मार्ग सीधा पड़ता है। इस मार्ग का लोग अब भी प्रयोग करते हैं। सन् १८४४ तथा १८१९ में सिक्खों ने अपने सैनिक अभियान के लिये इसी मार्ग को चुना था। यह मार्ग रामम्यार नदी के दक्षिण ओर हस्तिवंज के ऊपर होकर जाता है। इस प्रकार नदी पार नहीं करना पड़ता। सीमान्त प्राचीन द्वार अथवा डम्म का स्थान क्रमावर्त में था। (रा० त० ३:२२७)। इस स्थान