भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 427

३१४ राजतरंगिणी तस्मिन्प्रयाते प्राप्तेभ्यः नर्शगुम्नत्पराभवम् । नगर्यो नगनाथेभ्यश्श्रुतद्रद्त्वाचमेखलाः ॥ ३०१ ॥ ३०१. उसके चले जाने पर, पुनः लोटे, राजाओं से टूटती अटूट मेखलाओं वाली नगरियों ने उनके पराभव को कहा । काश्मीरं द्वारमापद्य श्वभ्रभ्रष्टस्य दन्तिनः । श्रुत्वा स प्रायतं घोषं तीव्रांमाश्चित्तोऽभवन् ॥ ३०२ ॥ ३०२. कश्मीर द्वार१ पहुँचने पर गर्त२ में गिरे गज३ के आर्तनाद को सुनकर वह हर्ष से रोमांचित होगया । थे। स्कन्द पुराण के पंच द्राविड़ ब्राह्मणों में निम्न- लिखित ब्राह्मण वर्ग आते हैं : कर्णाटैश्चैव, तैलंगा (द्राविडा) गुर्जरा राष्ट्रवासिनः । आन्ध्राश्च द्राविडाः पंच विन्ध्यदक्षिणवासिनः ॥ कर्णाट, तैलंग, गुर्जर, आन्ध्र तथा राष्ट्रवासी (महाराष्ट्र) पाँच राष्ट्रवासियों को विन्ध्य के दक्षिण रहने वालों में गिनता है। अर्थात् दक्षिणापथ का अर्थ यही लगाया जाता था । विन्ध्य के उत्तर रहने वाले पंच गौड़ ब्राह्मण पुरों की व्याख्या स्कन्दपुराण करता है : सारस्वतः कान्यकुब्जो गौड़मैथिलउत्कलाः । पञ्चगौड़ा इति ख्याता विन्ध्यस्योत्तरवासिनः ॥ विनयचन्द्र की काव्यशिक्षा में लाट देश के ग्रामों की संख्या २१ हजार तथा गुर्जर देश की ७० हजार दी गयी है। स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में लाड किंवा लाट देश की क्रमसंख्या ३८ तथा उसके ग्रामों की संख्या भी २१ हजार दी गयी है । उसमें कच्छ की ग्राम- संख्या १४ हजार, सौराष्ट्र की ५५ हजार तथा गुजरात की ग्राम संख्या ७० हजार दी गयी है। इससे स्पष्ट है कि लाट देश का अस्तित्व प्राचीन काल में गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ से स्वतन्त्र तथा भिन्न था । लाट प्रदेश गुजरात तथा सौराष्ट्र से छोटा और कच्छ से बड़ा था। लाट तथा लाट विषय का उल्लेख प्रथम शताब्दी से सातवी तथा आठवीं शताब्दी तक भारतीय वाङ्- मय में होता रहा है । इस प्रदेश का नाम पुराण तथा महाभारत और रामायण में मुझे नहीं मिल सका है। कौटिल्य ने इसका उल्लेख किया है । लाट देश का प्रवृत्त उस लाट देश को गया था। इसमें गुजरात तथा उत्तरीथ कोंकण का अंश आ जाता था। मुदगों के काल में लाट समुद्र तथा भ्राता मगूदी आदि का उल्लेख मिलता है। लाड देश के अन्तर्गत नगरलता (भड़ोच महरच्छ) तथा ओर्देत (उज्जैन) नगर थे । ३०२. (१) द्वार : द्वार का अर्थ दर्रा या पास है। संस्कृत में दर्रों को 'संकट' कहते हैं। गोवर पास की तरह कश्मीर में दर्रे अर्थात् द्वारों की सुरक्षा का विशेष प्रबन्ध दिया जाता था । द्वारों पर सेना रहती थी । सुरक्षा की दृढ़ व्याख्या की जाती थी । उन्हें द्वारपति, द्वाराधिपति, द्वारपति, द्वारेश, द्वाराधिकारी तथा द्वारनायक कहा जाता था । द्वार के आधीन 'ड्रंग' अर्थात् चौकियाँ होती थी । ड्रंगाधिपति ड्रंग का नायक होता था। यह द्वाराधिप के आधीन होता था। कल्हण ने द्वार का पुनः उल्लेख रा० त० ४:४०४ ५:१३७, ८:१६१० में किया है। विशेष द्रष्टव्य है टिप्पणी १:१२२ पृष्ठ १८४ । (२) गर्त : हस्तिकंज जिसे आइने अकबरी में गलती से हस्तिवत्तर लिख दिया गया है। पीर पंजाल मार्ग पर अलियाबाद सराय से आधा मील अधोभाग में है। ∴