भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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३१६ राजतरंगिणी

को स्टीन ने कामरेन क्रीट से पहचाना है। यह वर्तमान द्वार स्थान रामम्यार नदी के दक्षिण में है। हस्तिवंज से लगभग ३ मील नीचे अर्थात् अधोभाग में है। इससे प्रगट होता है कि पुराना द्वार जिसका उल्लेख श्लोक २०२ में कल्हण ने किया है। उसी दिशा में रहा होगा।

हस्तिवंज जिस मार्ग से पार किया जाता है। यह ऊँचाई पर चढ़ता, धान वाले ढाल से पूर्व की ओर टाँके के पश्चिम पड़ता है। आज भी इस उपे- क्षित मार्ग पर जानवरों पर सामान लादकर ले जाया जा सकता है।

हस्त्यंज नाम से ही प्रकट होता है। स्थान का सम्बन्ध हस्ती अर्थात् हाथियों से रहा होगा। पर्शियन वृत्तान्तरो से पता चलता है। 'वंज' शब्द का अर्थ 'गमन' अर्थात् चलना है। पश्चिमी पंजाबी में वंज माने 'चलना' आज भी प्रयुक्त होता है।

अलिहाबाद सराय श्रीनगर से ४६ मील दूर होगी। पीर पंतशाल या पंजाल दर्रा (संकट) के पड़ाव का स्थान है। मुगलों के समय यह सराय थी। आश्रय प्रदान का काम करती थी। जंगल में है। शीतकाल में हिमाच्छादित हो जाता है। समुद्र की सतह से ११८०० फुट ऊँचा है।

मनीपर्त्ती पर्वत शिखर लगभग १६००० फुट ऊँचा है। कोसर नाग दर्रे पर स्थित कश्मीर की सबसे बड़ी झील है।

इसका प्राचीन नाम क्रमोत्सर है। शिखर का नाम कौन्सरंग है। कोसरंग तीर्थ का वर्णन महाभारत के वन पर्व १८४:५० में दिया गया है। इस शिखर पर मत्स्य भगवान् के सींग से बाँधकर नौका सत्यव्रतो ने बाँधा था। यह शिखर बनिहाल की पश्चिम दिशा में है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, - तीन शिखर हैं। सबसे सबसे ऊँचा शिखर १५५३३ फुट है। इसी प्रसिद्ध कौन्सरा तीर्थ है।

बसुदेव चरित्र के अनुसार तथा हरदत्त सूरी के मत से कथा मिलती है। नाव से दुष्टों प्राणियों के संहार से रक्षा निमित्त उत्पन्न हुई थी। 'महाभारत वन पर्व १८४:५०, नीलमत ३३, हरचरित चिंतामणि ४:२७, ग्रोवर १:१७४, सर्वविस्तार ३:४,१२; ४:१७४, नौबन्धन माहात्म्य )

यह समुद्र की सतह से १३००० फुट ऊँचाई पर है। झील दो मील लम्बी है। झील के चारों ओर हिमालय की अत्यन्त शोभनीय पर्वतमालाएँ तथा शिखर हैं। उनमें ३ शिखर १५००० फुट ऊँचे हैं। वे कौसर नाग सर को जैसे निरन्तर नीचे की ओर देखती रहती हैं। 'पंचाल' ईरानी शब्द है। कश्मीरी में उसे पंतसल कहते हैं। इसका अर्थ होता है यात्रियों के लिए जल का प्रबन्ध । 'पोतला' अथवा 'पौसरा' से इस शब्द का मेल खाता है। पोतला, पोसरा, प्याऊ, सबील, एक ही शब्द के समानार्थक भिन्न नाम हैं। उनका सम्बन्ध पानी से है। पंचाल शब्द के लिए पन्तशाल शब्द का प्रयोग किया गया है। पंचाल महाभारत में एक जनपद के लिए प्रयुक्त किया गया है। (भीष्म पर्व ९ ४१ १८४७)

मैंने इस स्थान को देखा है। यदि ऊपर अर्थात् भारत से आने वाले मार्ग से श्रीनगर की ओर चला जाय तो इस अंचल का सर्व प्रथम प्राचीन स्थान पुष्यान्नाद मिलेगा। यह वर्तमान पूशियान है। तत्पश्चात् पंचाल धारा पड़ेगी। अनन्तर हस्तिवंज और फिर उसके बाद उतराई पर क्रमावर्त्त, द्रग एवं शूरपुर पड़ेगा। शूरपुर को आज कल हुरपूर कहते हैं। तत्पश्चात् प्राचीन दे- ग्राम, नगछोल, मिनार और शुपियान पड़ता है। शुपियान के पश्चात् श्रीनगर और विजयेश्वर तक समथर भूमि मिलने लगती है।

अलिहाबाद सराय रामम्यार नदी के वाम तट पर खड़े ऊँचे पहाड़ के मूल में स्थित है। नवम्बर से अप्रैल तक तुषार से ढँका रहता है। यहाँ उस समय कोई नहीं आता। यह उजड़े, निर्जन स्थान में उपेक्षित पड़ा है। यात्रियों का निवास स्थान प्रवेश द्वार से दूसरी तरफ के आहाते के पश्चिम पार्श्व में है। इमारत भयंकर रूप में गंदी है। उसमें गिरती