भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 417

३०८ राजतरंगिणी आज के समान विद्युत भाप तथा मशीन परिचालित नही थे। प्रारम्भ मे क्रेन भी हाथ से ही चलते थे। कल्हण ने भी सेतु शब्द का उल्लेख शुद्ध सेतु के संदर्भ में किया है। भगवान् राम निर्मित सेतु ठोस था अथवा पावों पर बनाया गया था, स्वतः एक गवेषणा का विषय है। जैसा कि गूढ़ सेतु के सम्बन्ध में लिखा जा चुका है। विशेषज्ञों की यह धारणा पुष्ट हो गयी है कि सेतु सम्भवतः ठोस था। पाँवों पर नहीं बना था। मुझे एक रोमन कैथोलिक आयरिश इंजिनी- यर मिल गये। वे विश्व पर्यटन निमित्त निकले थे। उन्हें भी स्थान देखकर कौतूहल हुआ। चर्चा प्रसंग में उन्होंने कहा—'मैं रोमन कैथोलिक हूँ। बाइबिल में विश्वास करता हूँ। रामायण की चाहे जो गाथा हो। परन्तु मै इतना निश्चय रूप से कह सकता हूँ। यह विशाल शिलाखण्ड यहाँ बाहर से लाये गये थे। दोनो समुद्री तटों को सेतु से जोड़ने का प्रयास किया गया था।' (वाल्मीकि रामायण लंका काण्ड सर्ग २२ द्रष्टव्य है) मैं हिन्दू हूँ। अतएव राम तथा राम गाथा पर स्वभावतः विश्वास करता हूं। परन्तु अभियन्ताओं का यह मत स्थिर हो चला है। किसी समय यहा सेतु था। भारतीय भूखण्ड को रामेश्वर द्वीप से मिलाता था। वर्तमान सेतुबन्ध रामेश्वरम् मन्दिर का स्थान दो हजार वर्ष से पुराना किसी भी प्रकार नहीं हो सकता । अतएव निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। रामायण वर्णित रामेश्वर की स्थापना किस स्थान पर की गयी थी। रामेश्वर शब्द से स्पष्ट है। राम ने रामेश्वर की स्थापना की थी। ईश्वर शब्द इस बात का द्योतक है कि शिव की स्थापना भगवान् राम ने की थी। उन्हों के नाम पर रामेश्वर शिवलिंग का नाम रखा गया। कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वत्र शिव मन्दिरों के लिए नाम के अन्त में ईश्वर या ईश तथा विष्णु मन्दिर के लिये स्वामी शब्द का प्रयोग किया था। यह नामकरण पद्धति समस्त भारत मे प्रचलित हो गयी थी। सेतुबन्ध शब्द से प्रतीत होता है कि रामेश्वर का सेतुबन्ध ठोस था। इस सेतु को पार कर राम की सेना लंका के समीप पहुँच गयी थी। यदि धनुषकोटि के पास खड़ा हो कर देखा जाय तो दूसरी ओर श्रीलंका का तट स्थान धुंधला दृष्टिगोचर होगा। लंका और भारत के बीच वह सबसे संकीर्ण स्थान है। दोनो के मध्य छिछला जल है। उसमें कुछ द्वीपो की श्रृंखला मिलेगी जो लंका और भारत के बीच है इस छिछले पानी के कारण बंगाल की खाड़ी से अरब सागर जाने वाले जहाज सरल और नजदीक के मार्ग से न जा कर श्री लंका की परिक्रमा कर जाते हैं। इस संकीर्ण स्थान को आज कल की प्रचलित भाषा में 'आदमस् ब्रिज' कहते हैं। पूर्व काल मे रामेश्वरम् द्वीप से लंका तट स्थान भूखण्ड से मिला रहा होगा। मिहिरकुल की सेना सेतु किंवा नाव से श्री लंका पहुंची थी या कोई और उपाय निकाला था। इस विषय पर कल्हण शान्त है। रामायण का वर्णन अधिक पूर्ण तथा विस्तार से वस्तु स्थिति पर प्रकाश डालता है। कल्हण ने स्वयं श्री लंका किंवा रामेश्वर की यात्रा नहीं की थी। उसने पूर्व श्रुत अथवा किसी पूर्व कृति पर अपना वर्णन लिखा है। यदि वह रामेश्वरम् की यात्रा किया होता तो उसका वर्णन अधिक सारगर्भित, पूर्ण और समुद्री दृश्यों के बखान से भरा होता। कल्हण ने केवल 'राघव' की सेना से उपमा यहाँ दी है। श्री राम की सेना ने जहाँ शिविर डाला था वहाँ मिहिरकुल की सेना का शिविर पड़ना सम्भव तथा कठिन दोनो हो सकता है। इस स्थान की भौगोलिक स्थिति में आमूल परिवर्तन हो चुका है। साइक्लोन, रीण्ड डून तथा तूफानों से स्थान