राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ राजतरंगिणी नयद्भिर्गुणतां दोषान्दोषतां च गुणान्विटैः । स लुप्तप्रतिभश्चक्रे शनकैः स्त्रीजितोपमः ॥३५६॥ ३५६. दोषों को गुण एवं गुणों को दोष बताने वाले विटों¹ द्वारा प्रतिभाहीन, वह राजा शनैः शनैः स्त्रैण² तुल्य हो गया । लिये समदर्शी होना गुण कहा गया है। योगी तथा ॥ १:६०॥ राजा में अन्तर है। राजा के लिए समदर्शी होना दमो दण्ड इति ख्यातस्तस्माद्दण्डो महीपतिः । उसी प्रकार गुण है, जिस प्रकार उपदण्ड दायक । तस्य नीतिर्दण्डनीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥१:१८६॥ राजा सभी गुणों का समन्वय है। दुष्टों को दण्ड, राज्ञां स दण्डनीत्या हि सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः । कण्टकशोधन, आततायियों का नाश, शत्रुओं का दण्ड एव हि धर्माण रक्षां परमं स्मृतम् ॥४:४७॥ संहार, युद्ध में विजय, समय पर तेजस्वी, समय पर अहिसंकौ साधुहिंसा पशुवच्चे तिचोदनात् । सरल, समय पर दानी, जनता के उपकार के लिये दण्ड्यस्यादण्डनान्नित्यमदण्डस्य च दण्डनात् ॥ जब जिस समय जिन गुणों की अपेक्षा हो ग्रहणकारी । ॥४:४९॥ होना चाहिए । युद्ध में शत्रु पर दया राजा के नाश भगवान् श्री रामचन्द्र ने भी राजा के लिये एवं पराजय का कारण होती है। आततायियों पर सामनीति को अनुचित कहा है। करुणा समाज में अशान्ति उत्पन्न करती है। अवां- न साम्ना शक्यते कीर्तिर्न साम्ना शक्यते यशः । छनीय तत्त्वों के प्रति उपेक्षा देश को अराजकता की प्राप्तुं लक्ष्मण लोकेऽस्मिञ्जयो वा रणमूर्धनि ओर ले जाती है । योगी एवं पण्डित जो अपने ही —वा० रा० २:१:१६ में लीन रहते हैं, उनके लिये समदर्शिता गुण है। पाठभेद : ये पशु पक्षी में भी मैत्री भावना रख सकते श्लोक संख्या ३५६ में 'जितोपमः' का पाठभेद हैं। किन्तु सर्वसाधारण में यह मैत्री भावना तथा 'जितोपमाम्' मिलता है । समदर्शिता प्रचुरता से प्राप्त नहीं होती । योगी के पादटिप्पणियाँ : साथ सर्प बैठता है। सिंह देखकर चला जाता है। ३५६. (१) विट : इस शब्द का अर्थ कामुक, परन्तु एक साधारण मनुष्य को विषधर क्रूद्ध सर्प लंपट, वेश्यागामी होता है। विषय भोग में विट काट सकता है, मनुष्यभक्षी सिंह उसकी हत्या कर अपनी समस्त सम्पत्ति का नाश कर देता है। और सकता है। ऐसी स्थिति में सर्प पर तथा सिंह पर अन्त में धूर्त बन जाता है। दया करना मानवहत्या में सहायक होना होगा । 'कुट्टनीमतम्' में विट का विशद वर्णन किया उस समय सर्प तथा सिंह को मार देना हिंसा नहीं गया है। वह तत्कालीन कश्मीर के सामाजिक अहिंसा होगी । एक के मरने से अनेकों की रक्षा जीवन पर प्रकाश डालता है। उसमे विट को सन्देश- होगी । इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन शुक्रनीति वाहक चित्रित किया गया है। वह वेश्या तथा सुन्दरी में किया गया है। राजा को बात का वारग, दण्ड- स्त्रियों से उनके प्रेमियों के मध्य सन्देश वाहक का स्वरूप एवं क्रूर आदि सद्गुणों से युक्त होना कहा कार्य करता है। प्रेमी तथा प्रेमिका को एक दूसरे के गया है। दुर्बलों की हिंसा का समर्थन किया गया है। साथ पहुँचाने की व्यवस्था करता है। अभिगमन के राजा सम्पूर्ण धमों का रक्षण है । लिये प्रेरित करता है । दण्डस्य कारणं राजा सदसद्वर्त्मदर्शकः । विट के चार मुख्य लक्षण कहे गये हैं। वह स्वधर्मेणानुरञ्जयो स्वधर्मे स्थापयेत् प्रजाः ॥ वेश्योपचार में कुशल होता है । मधुरभाषी कविना-