राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३५५ वाक् मर्मच्छेदिनी दीर्घं नर्म शश्वत्कथा विटैः । अनीश्वरोचिता तस्य क्रीडाऽपि भयदाऽभवत् ॥३५७॥ ३५७. राजा के लिये अनुचित उसकी मर्मभेदी वाणी, विटों के साथ लम्बी मनोरंजन वार्ता तथा क्रीडा भी भयदायक हो गयी थी । पुरो मिथ्यागुणग्राही परोक्षं दोषदर्शकः । असुस्थिरादरो भूमृत्सोऽभूद् द्वेष्योऽनुजीविनाम् ॥३५८॥ ३५८. प्रत्यक्ष मिथ्या गुणग्राही, परोक्ष में दोष दर्शक, और असुस्थिर आदर प्रदर्शक, वह राजा अनुजीवियों के द्वेष का पात्र बन गया था । मनागनवधानेन स्खलतस्तस्य भूपतेः । इत्थं राज्यस्थितिर्गादचिरेण विसूत्रताम् ॥३५६॥ ३५६. नितान्त असावधानी के कारण स्खलित, उस राजा की राज्यस्थिति शीघ्र ही इस प्रकार विशृंखलित हो गयी । गीत प्रिय और दक्ष होता है। समयानुसार पदों का उल्लेख करता है। कामुक रसमय गीतों से उत्तेजित करता है। चाक् प्रलोभन से चित्त को हरने की कोशिश करता है। उसका तीसरा गुण ऊहा-पोह में दक्ष होना है। चौथा गुण उसका वाग्मी होना है। वह शब्दजाल में फँसा कर अपनी रुचि के अनुसार काम करवा लेता है। पवित्र-से-पवित्र व्यक्ति को वह अपवित्र करने में सफल होता है। किसी को पतित करने में उत्साहित होता है। विट कामतन्त्र कला कोविद नायक एवं नायिका का सन्देश वाहक होता है। विट का लक्षण साहित्य दर्पण में दिया गया है। वेश्योपचारकुशलो मधुरो दक्षिणः कविः । ऊहापोहक्षमो वाग्मी चतुरश्च विटो भवेत् ॥ ॥ २४ : १०४ ॥ (२) स्त्रैण : स्त्रियों की मन्त्रणा पर चलनेवाले व्यक्तियों के अर्थ में यहाँ इस शब्द का प्रयोग किया गया है। यह शब्द राजा का विशेषण है। लौकिक भाषा में इस शब्द का अर्थ मेहरा होता है। इसका अर्थ नारीसुलभ, स्त्री द्वारा शासित, स्त्रैणत्व, नारीत्व स्त्रीस्वभाव तथा दौर्बल्य भी होता है। कल्हण का यहाँ तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि राजा रमणियों में इतना रम गया था कि उसका पुरुषोचित व्यवहार एवं आचरण जैसे लुप्त हो गया था। स्त्रैण शब्द का शुक्र ने राजा के सन्दर्भ में कल्हण के समान ही प्रयोग किया है। जायते राष्ट्रनाशश्च शत्रुवृद्धिर्धनक्षयः । सुराप्यपि वरो राजा न स्त्रैणो नातिकोपवान् ॥ ४ : ५९ ॥ लोकाँश्चण्डस्तापयति स्त्रैणो वर्णान्विलुम्पति । मद्यप्येकश्च भ्रष्टः स्याद् बुद्ध्या च व्यवहारतः ॥ ॥ ४ : ६० ॥ पाठभेद : श्लोकसंख्या ३५७ में 'दीर्घं नर्म शश्वत्कथा' का पाठभेद 'दीर्घनर्म जासत् तथा' मिलता है। श्लोकसंख्या ३५८ में 'असुस्थिरादरो' का पाठभेद 'अस्वस्थिरादरो' मिलता है। श्लोकसंख्या ३६० में 'उपेक्षितस्य' का 'उपेक्षितास्य' तथा 'द्रोहि' का 'निज', और 'द्रोणि' पाठभेद मिलता है