भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

३५६ राजतरंगिणी उपेक्षितस्य निर्दोषैरयतन्ताऽजितात्मनः । अथ लब्धबलास्तस्य नाशाय द्रोहिन्मन्त्रिणः ॥३६०॥ ३६०. शुभचिन्तकों द्वारा उपेक्षित एवं स्वच्छन्द इस राजा के नाशहेतु शक्तिशाली द्रोही मन्त्रियों ने यत्न किया । पादटिप्पणियाँ : ३६० (१) राजतन्त्र : प्राचीन भारत में राज- तन्त्र, कहीं वंशपरम्परागत उत्तराधिकार द्वारा ज्येष्ठ पुत्र अथवा प्रचलित हिन्दू उत्तराधिकार नियमानुसार सगोत्र सपिण्डादि को राज्य मिलता था । उनके अभाव में बन्धुओं को जाता था ; अथवा उसका निर्वाचन जनता किंवा मन्त्री एवं परिषदादि करती थी । कल्हण ने निर्वाचित राजा का वर्णन राज- तरंगिणी (७:७०३ ) में किया है । किस प्रकार परिषद् ने मिलकर कश्मीर के राजा का निर्वाचन किया था । कश्मीर राजा को कल्हण ने महाशान्त की उपमा दी ( त० १:१४१ ) है । श्री रणजीत सीताराम पण्डित राजतरंगिणी के अनुवाद में इस पर टिप्पणी लिखते हुए कहते हैं- 'इससे प्रकट होता है कि कश्मीर में राजाओं का मूलस्वरूप निर्वाचनीय था । उत्तराधिकार निर्वाचन पर निर्भर था ।' सम्भवतः बौद्धों के संघ प्रथा का प्रभाव था । संघ में निर्वाचन द्वारा कार्य सम्पन्न होता था । संघ में पद निर्वाचन द्वारा प्राप्त होते थे । प्राचीन भारत में जनता दुर्बल राजाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली थी । अतएव प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में राजाओं के राज्यच्युत, निर्वासित करने की अनेक घटनाएं मिलती हैं । शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है । धिज्यराज को जनता ने राज्यच्युत कर दिया था । उसके वंश ने दस पीढ़ियों तक राज्य किया था । पंचविंश ब्राह्मण में राजाओं के हटाने के दो उदा- हरण मिलते हैं । ये दीर्घश्रव तथा सिन्धुक्षित थे । ( १२:१२, ६ तथा १५:३, २५ ) । विष्णुपु[राण में] राजा वेणु की कथा प्रसिद्ध है । वह राज्यच्यु[त कर] मार डाला गया [। विष्णु] पुराण अध्याय १३ ) । भारतीय राजनीति के सिद्धान्त का जहाँ तक मैं अध्ययन कर सका हूँ, वह जनता के विप्लव, एवं विद्रोह के अधिकार को, दुराचारी, आततायी, क्रूर, एवं प्रजाभक्षक, शोषक राजा के विरुद्ध स्वीकार करता है । यद्यपि यह सिद्धान्त भी स्वीकार करता है कि राजा देवता का अंश है। किन्तु यह भी साधिकार घोषणा करता है । देवता बुरे कर्मों से राक्षस हो जाता है । ऋषि पुलस्त्य का नाती रावण था । ऋषि कुल में जन्म लेने पर भी बुरे कार्यों द्वारा राक्षस हो गया था । देवता उसी समय तक देवता है, जब तक उसमें देवत्व गुण वर्तमान रहता है । सद्गुण के कारण देवता होता है । देवत्व प्राप्त करता है । सद्गुण के अभाव से, प्रजा रंजक के अभाव में, न्याय प्रिय शासन के अभाव में, राष्ट्रसुरक्षा के अभाव में, राजा का सद्गुण और दैवी गुण लुप्त हो जाता है । पर- पीडा, परशोषण, दुराचार, एवं दूषित विचारों का आश्रय ग्रहण करते ही, उसका देवस्वरूप तथा देवत्व तिरोहित हो जाता है । अतएव उसे राज्यच्युत करना, उसे हटा देना, उसका वध कर देना, देव विरोधी कार्य नहीं कहा जायेगा । उसे असुर विरोधी कार्य, धर्म एवं शास्त्र सम्मत, कहकर पापहीन कहा गया है । जनता के कल्याण निमित्त इस प्रकार के राजा से पिण्ड छुड़ाना देशभक्ति की गणना में गिना जायेगा । शुक्राचार्य ने शुक्रनीति में स्वच्छन्द देशभक्ति किंवा स्वतन्त्र राजा के विषय में जो कहा है वही घटना इस राजा के सम्बन्ध में घटी । स्वातन्त्र्यमापन्नो ह्यनर्थायैव कल्पते । न भवेत्स्ववशो भिन्नप्रकृ[तिः] [१] ॥ २:४ ॥