राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआख्यायिका, उदाहरण, धर्म एवं अर्थशास्त्र का समावेश किया है । जैन आदि पुराण इतिहास की परिभाषा करता है—जो हुआ है वही इतिहास है । हर्ष चरित, गउड वाहो, नव साहसांक चरित, विक्रमांक देवचरित, कुमारपाल चरित आंशिक इतिहास है । कल्हण के पश्चात् पृथ्वीराज विलास, सोमपाल विलास, कृति कौमुदी, प्रभावक चरित, सुकृत संकीर्त्तन तथा प्रबन्ध चिन्तामणि, इसी प्रकार की रचनायें है । इनमे कुमारपाल, वस्तुपाल, रामपाल, विक्रमादित्य, सिन्धुराज का उल्लेख है । हिन्दी ग्रन्थों मे पृथ्वीराज रासो, बीसल देव रासो आदि भी आंशिक इतिहास ग्रन्थ है । पूर्व महाभारत कालीन इतिहास ग्रन्थ नही मिलते । कल्हण इसलिए अपना इतिहास महाभारत काल से आरम्भ करता है । काश्मीर में आर्यों के पूर्व नाग एवं पिशाच रहते थे । कल्हण जलोद्भव असुर के वध की कथा पौराणिक शैली से देकर, काश्मीर उपत्यका को बारहमूला के समीप से जल निकालकर, उसके सूखी भूमि हो जाने के समय तथा तुरन्त उसके पश्चात् गोनन्द प्रथम का उपाख्यान आरम्भ कर देता है । ( रा० १ २६-२७; ५९-७३ ) इतिहास प्रयोजन : कल्हण इतिहास रचना का कारण उपस्थित करता है । पूर्व कालीन इतिहास- ग्रन्थो का नाम नही देता । केवल कहता है--पूर्व कालीन इतिहास ग्रन्थ विस्तृत थे । सुव्रत ने विस्तृत इतिहास ग्रन्थ को संक्षिप्त किया । ( रा १ : ११-१२ ) अतएव प्राचीन इतिहास लुप्त हो गये, छिन्न हो गये । गोनन्द तृतीय के परवर्ती ५२ महीपति, जो कलियुग में कौरव एवं पाण्डवो के समकालीन थे, उनका लेखा लुप्त हो गया है । ( रा० १ : १६, ४४) कवि क्षेमेन्द्र ने नृपावली की रचना की । वह काव्य रचना है । किन्तु अनवधानता के कारण उसमें इतनी त्रुटियाँ रह गयी हैं कि उसका कोई भी अंश निर्दोष नहीं कहा जा सकता था । (रा० १ : १३) यह ग्रन्थ अभी तक प्रकाश में नही आया है । पाशुपत व्रती हेला राज मे १२ सहस्र श्लोकों की 'पार्थिवावली' लिखी । ( रा० १ : १७ ) तत्पश्चात् पद्ममिहिर ने हेलाराज की रचना का अध्ययन कर अशोक के पूर्ववर्ती आठ राजाओ का वर्णन किया है । (रा० १ : १८) इस इतिहास का कल्हण नाम नही देता । श्री छविलाकर ने अशोक के पश्चात् जिन पांच राजाओ का वर्णन किया है वे लुप्त बावन राजाओ में से हैं । (रा० १ : १६) भी छविलाकर के इतिहास का नाम कल्हण नही देता । गोनन्दादि चार राजाओं का वर्णन नीलमत पुराण से लिया गया है । (रा० १ : १६) कल्हण के समय तक राजकथा विषयक ग्यारह ग्रन्थ थे । (रा० १ ० १४) कल्हण उन ग्रन्थो का नाम नही देता । कल्हण ने सुव्रत के इतिहास का भी नाम नही दिया है । कल्हण ने अपने रचना-स्रोत का भी उल्लेख किया है । (रा० १ : १५) प्रारम्भिक तरंग अनुश्रुतियों पर आधारित है । ललितादित्य की मृत्यु का वर्णन उसने अनुश्रुति के आधार पर किया है । (रा० ४ : ३६७- ३७१) यशस्कर की मृत्यु का उल्लेख भी अनुश्रुति के आधार पर किया है । (रा० ६ : ६०, ११३) वह अपने इतिहास लिखने का उद्देश्य स्वयं देता है--'इस ग्रन्थ को लिखने की मेरी यह योजना है कि मैं सर्वांगीण, पूर्ण क्रमबद्ध इतिहास उपस्थित करूँ जहाँ पुरातन इतिहास-लेखको की रचनायें विश्रृंखलित हैं।' (रा० १ : १०) काश्मीर महाभारत काल से कल्हण तथा उसके पश्चात् अकबर के समय तक किसी विदेशी सेना से पदाक्रान्त नही हुआ था । सन् १३२६ ई० में अन्तिम हिन्दू शासिका कोटा रानी को हटाकर शाह मीर काश्मीर का राजा बना, काश्मीर मुसलमान धर्म में परिवर्तित हो गया परन्तु काश्मीर में काश्मीरो मुसल- मानों का ही शासन रहा । काश्मीर प्रकृति की सुषमा में सुरभित रहा । यदि कल्हण के मत में ४२२५ वर्षों