राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २९ ] के गौरवमय इतिहास लिखने की कल्पना उदय हुई तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उसने कारण भी दिया है। उसने अनुभव किया था कि कितने ही काश्मीर के राजा विस्मृति सागर में डूब गये थे। कवियों की कृति के कारण कुछ की स्मृति शेष रह गयी थी। कवि या रचनाकार अपनी रचनाओं के कारण स्वयं जीवित रहता है और दूसरों को भी जीवित रखता है। राजकीय पद एवं चकाचौंध में रहने वाले महामात्यों, मन्त्रियों, सेनानायकों की असंख्य संख्या लोप हो चुकी है। किन्तु कल्हण स्वयं जीवित रहना चाहता था। इसमें निःसन्देह वह सफल हो पाया है। वह इसलिये भी जीवित रह पाया है कि संस्कृत साहित्य में सवा चार हजार वर्षों का एक मात्र उसका इतिहास प्राप्य है। उसने विश्व में भारतीयों को इस कलंक से मुक्त किया है कि भारतीयों को इतिहास लिखने का ज्ञान नहीं था। और भारतीय साहित्य में कोई इतिहास नहीं है। कुछ अभाव : कल्हण की राजतरंगिणी में कुछ अभाव खटकता है। आश्चर्य है उसने भारत पर सिकन्दर के आक्रमण, पोरस के साथ युद्ध, चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्र गुप्त, स्कन्द गुप्त, शशांक, नरेन्द्र गुप्त, पुल- केशी तथा नागभट्ट जैसे महान भारतीय आत्माओं का उल्लेख नहीं किया है। दार्शनिकों में शंकराचार्य का भी उसने उल्लेख नहीं किया है। इसी प्रकार लिच्छवी, वज्जी, पंजाब के अनेकानेक गणतन्त्र, मालव, औधेय, आदि का राजतरंगिणी में उल्लेख न होना एक समस्या उपस्थित कर देता है। सीमान्त प्रदेश पर यूनानियों के साथ संघर्ष, अफगानिस्तान आदि में यूनानियों की राज्य स्थापना, ईरान, अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान में पुराने धर्म के स्थान पर मुस्लिम धर्म का उदय, उन देशों में पुरातन राजवंशों का पतन तथा नवीन सल्तनतों का कायम होना, ये ऐसी घटनायें हैं जिनके ज्ञान की अपेक्षा पाठक कल्हण से करता है। ललितादित्य तथा जयापीड ने भारतवर्ष में क्या महत्वपूर्ण कार्य किया, इस पर कल्हण शान्त है। वह अपना ज्ञान अवन्ती तथा कन्नौज के राजाओं तक एक प्रकार से सीमित कर देता है। अन्य राजाओं का केवल उल्लेख मात्र उसने किया है। इसके दो ही स्पष्टीकरण हो सकते हैं : कल्हण को कोई तत्कालीन प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रन्थ प्राप्त नहीं था। काश्मीर में जो लोग मुस्लिम आतंकों से भागकर आये, उनके पास शास्त्रीय एवं काव्य-ग्रन्थ थे। दूसरी बात यह भी हो सकती है कि सहस्रों वर्ष की घटनायें लोग भूल गये थे। वे लिपिबद्ध नहीं थे। इसमें से कुछ घटनाओं एवं व्यक्तियों के विषय में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि पूरे भारत के इतिहास के लिए उनका महत्व स्पष्ट है, केवल कश्मीर के सीमित दृष्टिकोण में देखने पर उनका कोई भी स्थान नहीं निर्धारित किया जा सकता। संभवत इसी कारण कल्हण इनके विषय में मौन है। दृष्टिकोणः कल्हण प्रगतिशील था। जड़ता से दूर था। रूढ़ियों में बँधा नहीं था। धार्मिक संकीर्णता, जातीय असहिष्णुता से ऊपर उठा था। उसका दृष्टिकोण आधुनिक जैसा था। उसने एक मनोरंजक काल- क्रम से ऐतिहासिक तालिका प्रस्तुत किया है। उसने घटनाक्रमों से व्यापक निष्कर्ष निकाल कर, व्यापक सिद्धान्तों को काव्यमयी भाषा में प्रस्तुत किया है। कल्हण का दृष्टिकोण स्थानीय लगेगा। यह काश्मीरियों की प्रवृत्ति उनके प्रदेश के एकाकीपन के कारण हो गयी है। काश्मीर का समस्त जीवनक्रम ही जैसे एकाकी जीवनवृत्त है। उसकी दृष्टि जैसे कश्मीर उपत्यका को घेर कर खड़ी पर्वत-मालाओं से बाहर नहीं जाना चाहती। काश्मीरियों की यह मानसिक स्थिति पुराकाल में भी थी और आज भी है। कल्हण की दृष्टि बाहर भी गई है। भारतीय साहित्यिक कृतियों के साथ साथ उसे समकालीन भार- तीय इतिहास का भी ज्ञान था। उसने काश्मीर के बाहर की घटनाओं एवं राजाओं का उल्लेख किया है।