भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ ३० ] उनकी न तो प्रशंसा की है और न आलोचना । यह पुराणों तथा महाभारत के समान समकालीन राजाओं की तुलना नही करता । राजतरंगिणी गिबन के डिक्लाइन एण्ड फाल ऑफ रोमन इम्पायर तथा वाल्टेयर के इतिहास तुल्य नही है । यह काव्य है । होमर वा तथा अश्चाइलस की रचनाओं के तुल्य अमर काव्य है । कल्हण ने काश्मीर को लुप्त होने से बचा लिया है । पुराकालीन इतिहास को लुप्त होने से बचाया । उसने काश्मीर को अन्धकार युग की गाथा मात्र उसी प्रकार होने नही दिया है जिस प्रकार होमर ने यूनान को । उसने पूरा काल को सुनिश्चित इतिवृत्त से मिश्रित किया है । उस दृष्टि से संस्कृत का कोई अन्य लेखक किंवा आलोचक इतिहासकार नही कहा जा सकता । सहस्रो वर्षों के पूर्व कालीन इतिहास को उसने जीवित रखा है। मख के शब्दों में कल्हण कथा उपाख्यान उत्साह से पढ़ता था । उत्साह से उसने उनका वर्णन भी किया है । मम्मट के अनुसार काव्य का उद्देश्य लोगों को व्यवहारविद् बनाना है । काव्य की वाणी आत्मा है । काव्य का भाव रस है । विद्या का प्रयोजन विनय है । कल्हण के पदों में विनय परिलक्षित होता है । उसने अपने इतिहास काव्य में कथा, उपाख्यान, चमत्कारादि का मिश्रण कर महाकाव्य के साथ उसे रोचक बना दिया है । पुरा कालीन लेखक चाहे पश्चिम के हों अथवा पूर्व के वे पुरावृत्त, गाथा, कथाओं तथा इति- हास के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं खींच सके थे । कल्हण ने इन बातों से हटकर वैज्ञानिक दृष्टि से इतिहास रचना का प्रयास किया है । वह आधुनिक शैली एवं पुरानी शैली के बीच की कड़ी है । राजतरं- गिणी शुष्क ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं है । वह रसमय है । उसके पढ़ने से मन ऊबता नही । वह घटना-क्रमों का संग्रह मात्र नहीं है। उसमें इतिहास के साथ रामायण, महाभारत जैसे कथा प्रसंगों के सहित पुराणों जैसी धार्मिक झुकान एवं रोचकता है । प्रचार एवं उपदेशात्मक ग्रन्थ : कल्हण ने काश्मीर की शोचनीय दशा एवं अव्यवस्थित व्यवस्था ठीक करने के लिये राजतरंगिणी की रचना की थी । वह लिखता है—यह भूमि जो कुलवधू के समान थी वह वेश्या के समान दुष्टो के हाथो में पड़ गयी है । अब से जो कुचक्रो में निपुण होगा वही इस हतप्रभ राज्य को प्राप्त करने की आशा करेगा । ( रा० ७ : १४१६, १४२० ) वह जब काश्मीर के पुराकालीन इतिहास की तत्कालीन इतिहास से तुलना करता था तो उसका हृदय रो उठता था । अतएव उसने मानव प्रकृति की अप्रत्याशित रूप से चित्रित किया है । ( ७ : ७९२ ) कल्हण अपने इतिहास की परम्परा काश्यप ऋषि से जोड़ता है । उनके समय से अपने समय की तुलना करता है । वह दुःखी होकर कहता है—'यह पृथ्वी काल की बलवत्ता के कारण शीघ्रतापूर्वक संकु- चित हो रही है।' उसका स्वर्ण युग भूतकाल में था । वह करुण शब्दो में कहता है--कोई प्राचीन राजाओ के समान नही हो सकता ।' ( रा० ४ : ४०७ ) कल्हण काश्मीर के राजा को 'दुरात्मज' कह चुका था अत- एव उसने काश्मीर के राजाओं के दोषो का कारण उनके पूर्व जन्म के दोषो को दिया है। (रा० ३ : ४१४) जयसिंह जिसके राज्यकाल में वह अपनी रचना कर रहा था उसे कल्हण ने पुराकालीन राजाओं के तुल्य माना है । कल्हण काश्मीर में शक्तिशाली एवं उदार राजा चाहता था । जो बिगड़े घर को सुधार सके और बने घर को बढ़ा सके । जनता के प्रति स्नेह एवं सहानुभूति प्रदर्शन कर सके । उसने यह विचार देवी वाक्- पुष्टा तुंजीन तथा मेघवाहन के प्रसंग में प्रकट किया है । ( त० २ · ३१-४९ ) वह कहता है, राजाओं को पृथ्वी का पालन नववधू तुल्य करना चाहिए । ( रा० २ : ८ )