भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

[ ३१ ] राजतरंगिणी के विषय में कल्हण स्वयं लिखता है--'राजाओं के विकास एवं ह्रास के समय मेरी कथा देशकाल के अनुसार उनके लिये उत्साह किंवा शान्तिवर्धक तुल्य उपयोगी सिद्ध होगी । कौन ऐसा चेतन हृदय व्यक्ति होगा जो अनंत व्यवहारो से पूर्ण मेरे इस ग्रन्थ को हृदयंगम नही करेगा ।' ( रा० १ : २१, २२ ) उसने अपने समय के लोगो के पठन-पाठन हेतु काव्य लिखा था। जो स्वतः काश्मीर की पर- म्पराओ, घटनाओं, प्रचलनों आदि से परिचित थे । कल्हण ने उनके मार्ग-दर्शन हेतु अपने विचारो को स्वतंत्र रूप से राजनीतिज्ञ राजा, जनता, राजन्य वर्ग, कर्म स्थानीय जन, मंत्री, पुरोहित, अमात्य, सचिव सबके लिए लिखा था । उसे विश्वास था कि उसके इतिहास के पठन-पाठन से भविष्य के राजाओ की परम्परा अच्छी होगी । वे आदर्श राजा होगे । जनता का मनोबल उठेगा । आदर्श सम्राट एवं राजा : कल्हण के आदर्श शासक अशोक, कनिष्क ओर मेघवाहन थे । अशोक उदार सम्राट था । कनिष्क जन हितैषी राजा था । मिहिरकुल क्रूर राजा था । मेघवाहन आदर्श राजा था । भिक्षाचर, कलश तथा हर्ष कल्हण के समय महान पुरुषों के समान स्मरण किये जाते थे । ( ७ : ५६९, १०६६ ) कश्मीर के भूपाल पृथ्वोपति पृथ्वीपाल कल्हण की दृष्टि में सामान्य लघु पर्वतीय राजा नही थे । वे अपने लघु साधनों द्वारा साम्राज्य नही बना सके थे किन्तु कल्हण काश्मीर के राजाओं को शक्तिशाली राष्ट्र का राजा मानता था जिसके राजा पूर्व काल में भारत विजय दिग्विजय किये थे । ( रा० १ : २९७, ३३९, ३ : ३५०, ४ . १३१७ ) कल्हण का आदर्श सार्वभौम राज्य था । ( रा० ३ : ८०, ८१ ) जनता का अधिकार : काश्मीर मे गणतन्त्र नही था । भारत में गणतन्त्रों का लोप अन्ततोगत्वा समुद्रगुप्त के साम्राज्य प्रसार के साथ हो गया था । यूरोप में भी गणतन्त्र उन दिनो नही थे । तथापि राजा निरंकुश नही था, स्वेच्छाचारी नही था । यदि राजा क्रूर, अन्यायी, अत्याचारी एवं दुष्ट था तो जनता को अधिकार था, वह राजा को हटा सकती थी । क्योकि दुष्ट राजा का होना कल्हण की दृष्टि में जनता के भाग्य विपर्यय का कारण था । जनता के कुकर्मों के कारण, नैतिक पतनों के कारण, कायरता के कारण देश मे अवाछनीय राजा राज्य करते है । जिस प्रकार व्यक्ति अपने कर्मों का फल भोगता है, उसी प्रकार जनता भी भोगती है ; कल्हण कहता है-'प्रजा के पुण्य के कारण समय-समय पर ऐसे नृपों का जन्म सम्भव होता है जो अत्यन्त छिन्न-भिन्न हुए राज्यों का योजन करते है। ( रा० १ : १८ ) कर्म गति से यदि व्यक्ति नहीं बच सकता तो जनता भी नही बच सकती । कल्हण का यह अभिनव राजनीति दर्शन है । ( रा० १ : १८७ ) । जनता का राज्य-व्यवस्था में स्थान था । आवश्यकता होने पर जनता राजा का चयन करती थी । काश्मीर की जनता ने सन्धिमति को अपना राजा स्वीकार किया था । (रा० २ : ११६) जनता ने गान्धार से मेघवाहन को लाकर कश्मीर के सिंहासन पर बैठाया था । रा० ३ : २ ) राजा वक को जनता ने राजा चुना था । ( रा० १ : ३२५ ) विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को काश्मीर का राजा बनाने का विचार किया तो उसने प्रकृति जनो अर्थात् जनता के पास दूत भेजा था । कोई निश्चय करने के पूर्व वह जनता का मत जान लेना चाहता था । ( रा० ३ : १८८ ) कल्हण ने यूनानी लेखकों के समान नगर की जनता का चित्रण किया है । वह जनता के प्रति, उसकी भावनाओं के प्रति, उसके कल्याण के प्रति अत्यधिक जागरूक था । वह आनुवंशिक राजाओ के परिवर्तनो के प्रति उदासीन था । राजा और प्रजा : कल्हण ने राजा को हरांशज कहा है । परन्तु पश्चिमी राजनैतिक दार्शनिकों के समान वह राजा के दैवी सिद्धान्त में विश्वास नहीं करता । राजा दैव नहीं था । वह सर्वसत्ता सम्पन्न