राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३६५ इति श्रीकाश्मीरकमहामात्यचम्पकप्रभुसूनोः कल्हणस्य कृतौ राजतरङ्गिण्यां प्रथमस्तरङ्गः ॥ इस प्रकार श्री कश्मीर के महामात्य चम्पक प्रभु के पुत्र कल्हण कृत राजतरंगिणी में प्रथम तरंग समाप्त हुआ ।
शकुनी के पोतों में से था । हसन ने इसी प्रकार अशोक के पूर्व राजा भगवन्त का कलि संवत् १६४१ में होना बताया है । इतिहास सिकन्दर का आक्रमण काल ३२७ वर्ष पूर्व ईसा देता है । यह समय अनेक साक्षियों से प्रमाणित हो चुका है । ईरान का काल उक्त संवतो के कारण उलझन में पड़ जाता है। सिकन्दर का आना अशोक के पूर्व होता है । हसन रत्नाकर पुराण के आधार पर उसका उल्लेख कर अशोक के पश्चात् ३५ राजाओं के वर्णन के पश्चात् सिकन्दर का कश्मीर मे आना लिखता है। अशोक का काल हसन ने १२५५ क० संवत् तथा राजा अन्ध युधिष्ठिर का समय कलि संवत् २८२८ देता है । बात यही नही समाप्त होती । उसने मिहिरकुल तथा सम्राट् कनिष्क के पश्चात् अन्ध युधिष्ठिर का समय रखता है । तथा उसी के समय सिकन्दर का आना लिखता है । कनिष्क के पूर्व वर्ष, मिहिरकुल के पूर्व वर्ष सिकन्दर का आना प्रमाणित हो चुका है। अतएव हसन का संवत्, उनका दिया काल, राजाओ की तालिका आदि भ्रामक अनुमान पर आधारित, इतिहास को एक विशेष जमाना देने की गरज से लिखा गया है । हसन ने पुनः अपने पुराने सिद्धान्त की पुनरावृत्ति की है कि उसका आधार रत्नाकर पुराण का अनुवाद है। वह अनुवाद जैनुल आबदीन के समय में किया गया था। उसे अनुवाद मिला । वितस्ता में वहू यात्रा कर रहा था । नाव डूब गयी ।
रत्नाकर पुराण भो डूब गया । मैं कह सकता हूँ कि या तो रत्नाकर पुराण मिथ्या है अथवा इतिहास को अपने रंग में रंगने के लिए रत्नाकर पुराण का सहारा लिया गया है । यदि कभो कोई रत्नाकर पुराण था भी तो वह तर्क के आधार पर मिथ्या प्रतीत होता है । प्रमाणों की कसौटी पर हसन तथा मटरजप रत्नाकर पुराण तथा पुराण तीनो ही सत्य नहीं उतरते । पुराणों का मैने अध्ययन किया है। पुराण गणना में भूल नही करते । असंगत बात नही लिखते । प्रमाण के लिए किसी ऋषि आदि के वाक्यौ का आश्रय लेते हैं। उनको वर्णन शैली मौलिक और निराली होती है । रत्नाकर पुराण का वर्णन केवल कपोलकल्पना मात्र है । पाठभेद : इति पाठ में 'काश्मीरक' का 'काश्मीरिक' 'चम्पक' का 'श्री चापाकं' पाठभेद मिलता है । इतिपाठ : पादटिप्पणी : 'इति' पाठ के पश्चात् पाण्डुलिपियों में निम्न- लिखित श्लोक लिखा मिलता है : 'चतुर्दशाधिकं वर्षं सहस्रं नव वासराः । मासाश्च विगता ह्यस्मिन्नेकविंशतिराजसु ॥ पाठभेद : उक्त श्लोक में 'चतुर्दशाधिकं' का 'चतुर्विशा- धिकं' तथा 'ह्येकविशति' का 'भ्रष्टान्विशति' पाठभेद मिलता है । इससे कल्हण के यह लिखने का समय स्थिर हो जाता है ।