राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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इलाके का फरमान रहा। दूसरा दोआब सिन्धु और झेलम का महाराजा टेकसिला। तीसरा हस्तिनापुर का राजा पोर। अबीसतर ने बेशुमार तोहफे व तहायक के जरिये सिकन्दर का इस्तकबाल किया। राजा टेकसिला ने सिर्फ बारयाबी हासिल करके सिकन्दर की अपने घर दावत की और पूरी शान व शौकत से दावत फराज बजा लाया। बादशाह ने अपनी थकी हुई फौजों को वहाँ छोड़कर खुद दरयाए झेलम के किनारे डेरे डाल दिये। लेकिन उस तरफ से राजा पौर एक भारी फौज के साथ आया और दरया के उस किनारे मोरचा बना लिया। इन दिनों दरया झेलम शिद्दत बरसात के बाइस तफ पानी पर था। सिकन्दर के लिए दरया का अबूर करना बहुत मुश्किल हो गया। आखिरकार दस मील ऊपर की तरफ जाकर रात को दरया पार किया। राजा पोर एक जबरदस्त लड़ाई के बाद सिकन्दर के हाथ कैदी हुआ। लेकिन सिकन्दर ने इन्तहाई रहम से काम लेकर राजा पोर को उसका मुल्क मौरूशी वापस कर दिया। बाद भजोई वकील मुसन्निफ वकाअ कश्मीर को सैर को रवाना हुआ। लेकिन हिन्दुस्तानी वकाअ निगार सिकन्दर के कश्मीर जाने के मुतल्लिक बिलकुल खामोश हैं। लेकिन वकाअ काश्मीर के मुसन्निफ का बयान हकीकत से खाली नहीं है। मुख्तसर यह कि सिकन्दर दोआब व चज का मुल्क राजा पोर को सौंप दिया और खुद रावी और चिनाव को पार करके मुकाम सागला में कौम तातार के १९ हजार आदमी मौत के घाट उतार दिये। यहाँ से मुल्क बिहार के फतह करने का इरादह उसके दिल में था लेकिन उसके सिपाही हिन्दुस्तान में मजीद आगे बढ़ने से मुनकर हो गये। इसलिए लाचार सिकन्दर को हिन्दुस्तान के मुकम्मल तसखीर दूसरे मौका पर छोड़नी पड़ी। और अपने मुल्क के वापस का इरादह कर लिया। दो हजार किश्तियाँ फिल अल फौरन बनवाई गईं। एक लाख बीस हजार पैदल सिपाही। दो सौ हाथी किश्तयो में बैठाकर दरियाए सिन्धके जरिये रवाना कर दिये। बाकी फौज दरया के दोनों किनारे खुश्की से चलती रही। पांच सौ कोस तै करने के बाद यह तमाम किश्तियां समुन्दर के दहाना पर पहुँच गयीं। वहाँ से सिकन्दर जो खुश्की के रास्ते रवाना हुआ था और नयारकंस ने जो उसके बाहरी बेड़े का अफसर था दरया का सफ़र कुल सात महीने में तै किया। सिकन्दर ने ३२३ बरस कब्ल मसीह के वफ़ात पायी। (पृष्ठ ५१-५२।) हसन तथा वकाअ कश्मीर के लिखने का कुल तात्पर्य यह है कि कश्मीर के इतिहास पर एक खास रंग चढ़ाने के लिए सिकन्दर को 'कश्मीर के अन्दर दाखिल' करते हैं। हज़रत नूह, हज़रत सुलेमान तथा हज़रत ईसा का नाम कश्मीर के इतिहास से जोड़कर उस पर विदेशी रंग चढ़ाने की कोशिश की गयी है। सिकन्दर को काश्मीर जैसे दुर्गम स्थान में आना, उसकी यात्रा तथा कश्मीर का वर्णन यूनानी इतिहासकारों का नहीं करना, जब कि उन्होंने छोटी-से-छोटी बातें लिखी हैं, आश्चर्यजनक तथा असम्भव कही जायेगी। हसन तथा वाकए कश्मीर के लेखकने कुछ नही बताया है कि उन्होंने सिकन्दर के कश्मीर में दाखिल करने की बात कहाँ से पाई है। यदि सिकन्दर कश्मीर में प्रवेश किया होता तो उसका समय अशोक के काल के पूर्व हसन की गणना तथा राजाओं की तालिका के अनुसार होना चाहिए। राजा शचीनर का काल हसन के अनुसार क० संवत् १२३३ बैठता है। राजा स्वर्ण का समय क० संवत् ११६६ होता है। हसन राजा शचीनर का राज्यकाल नही देता। परन्तु तीनों का समय मिलाकर १०४ वर्ष अर्थात् कलयुग १२७३ होता है। हसन राजा शचीनर के पश्चात् राजा गल- गन्दर जिसे शचीनर का भतीजा कहता है कलि संवत् १३४३ मे राज्य करना बताता है। राजा अशोक का राज्यकाल क० संवत् १६५५ लिखता है यह भी लिखता है कि अशोक राजा शचीनर वल्द