राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 492, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंहसन—'अन्ध युधिष्ठिर के राज्यकाल में सिकन्दर का आना हसन लिखता है। मै उसे यहां उद्धृत इसलिए करना चाहता हूँ कि कम से कम इस एक घटना के उल्लेख के कारण रत्नाकर पुराण, उसके मुतरजम तथा हसन तीनो को इतिहास के साक्षियों तथा प्रमाणों के सम्मुख कही खड़े होने की जगह नही मिल सकेगी। हसन—'मुतरजम रत्नाकर लिखता है कि अन्ध युधिष्ठिर के आखिर दौर हकूमत के सिकन्दर फील कौस जिसे मशरिके वाशिन्दे महायोन कहते थे, बड़ी भारी लश्कर के साथ हिंदुस्तान की तसखीर के लिए आया । जब दरिया नीलाब से गुजरा तो हिंदुस्तान के तमाम राजे-महाराजाओं में जलजला पड गया। राजा युधिष्ठिर का भाई जिसका नाम अभीसतर और कश्मीर के बाहर वाले कोहिस्तानी इलाके का हुक्मरां था सिकन्दर की खिदमत मे तोहफे ले जाकर मुअजिज व मुकरम हुआ । सिकन्दर से अपने भाई के बर खिलाफ मदद मांगी । चुनाचः सिकन्दर ने एक भारी फौज उसकी इमदाद के लिए मुकर्रर कर दी । अन्ध युधिष्ठिर मुकाबला की नाव न लाकर हिन्दुस्तान की तरफ भाग खडा हुआ और उसकी जगह अभीसतर मुल्क कश्मीर का हाकिम क़रार पाया। दूसरी तरफ अन्ध युधिष्ठिर ने भी राजा पूरन से इमदाद मांगी। चूंकि पूरन खुद सिकन्दर के साथ मसरूफ जंग था। इस बिना पर युधिष्ठिर की इमदाद से कासिर रहा । यह देखकर अन्य युधिष्ठिर पूरन की तरफ से सिकन्दर के साथ मसरूफ पैकार हुआ । और नतीजतन दौरान जंग मारा गया। इस वाकया के बाद ही सिकन्दर ने कश्मीर के जनूबी पहाड़ी इलाके से खुद कश्मीर मे नजूल किया और कुछ अरसा सैल-शिकार में मसरूफ रहा । एक दिन खुदा के करने से मौक़ा पर एक तीर सिकन्दर के बाजू पर लगा । जब तीरन्दाज को गिरफ्तार कर लाये तो मालूम हुआ कि यह अबेस्तर का पढ़ाया आदमी था । और सिकन्दर के मारने पर मुतमइन था । सिकन्दर पर जब यह हाल खुला तो उसकी आतिश गजब की कोई हद न रही। और उसने जुर्म की पादाश मे अभीसतर को मय उसके रिश्तेदारों के क़तल कर डाला । इसके बाद मुल्क की हकूमत राजा परताप को जो मालवा के राजो में से था और राजा विक्रमाजीत अजदाद में से है अता करके खुद अपने मुल्क को वापस चला गया । वाल्हा आलम । सिकन्दर कश्मीर में नही आया था । (पृष्ठ ५० तथा ५१ ) इस विषय पर भारतीय इतिहासकारों की आलोचना करता हुआ हसन लिखता है : हिन्दुस्तानी तारीखदाँ लिखते है कि सिकन्दर फिलकोश ईसा की पैदा build-up/पैदाइश से साढ़े तीन सो साल कबल रूम के दारुल खलाफा से निकला और थोडे से मुद्दत में इराक, रूम, अरब और फिदगिस्तान वगैरह मुमालिक फतह कर लिए । ईसा से ३३१ साल पेस्तर फारस पर फ़तह करने की गरज से हमला किया और तीसरे हमले में वहाँ के बादशाह दारासन, दाराव बिन बहमन को क़तल करके ईरान और खुरासान की सलतनतें अपने क़ब्जा इकतदार में ले आया । और चूंकि हिन्दुस्तानी राजे-महाराजे दाराव के अहद हकूमत में सल्तनत ईरान के बाज गुजार थे इस ख़याल के पेश नजर सिकन्दर ने फतह हिन्द भी लाजमी और जरूरी समझे । चुनांचे : ३२७ क़बल मसीह में एक भारी लश्कर के हमराह दरयाए नीलम अबूर करके हिन्दुस्तान हुक्मरान राजे-महाराजों में संहलक मचा दिया । अरसा चार साल से सिकन्दर की शाही फौजो ने बर्फानी पहाड़ो में सफर की सख्तियां बरदास्त की थीं। इसके साथ ही लड़ाइयो और मुसलसल जंग व जदाल के बाथश थककर, चूर हो गयी थीं, और गरमियों में पंजाब में रहने की वजह से उनमें से अक्सर बुखार में मुवतिला हो गये थे । इस वजह से उन्होने हिन्दुस्तान पर हमला करने में जल्दी न की । उन दिनों हिन्दुस्तान में तीन राजे मशहूर थे । अभीसतर कश्मीर और उसके आसपास के पहाड़ी