राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 498, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग विहितमजगोशृङ्गाग्राभ्यां धनुर्घटितं नरकरटिनोर्देहार्धाभ्यां गणं प्रतिगृह्णतः । द्विविधघटनावल्लभ्यानां निधेश्चिता विभो- र्जयति लटभापुंभागाभ्यां शरीरविनिर्मितिः ॥१॥ अज एवं गो के शृङ्गाग्र द्वारा विनिर्मित धनुष¹ तथा मानव एवं मातंग के देहार्ध द्वारा निर्मित गणेश² को साथ में रखने वाले, द्विविध घटना प्रियता-निधि, भगवान् के नर एवं नारी³ अंश से शरीर का निर्माण सर्वोत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है।
पाठभेद: 'ओ' तथा 'ओ श्रीगणेशायनमः' का भी पाठ प्रारम्भ में मिलता है। श्लोक संख्या १ में 'गोशृङ्गा' वा 'अजशृङ्गा' 'गोः शृङ्गा'; 'गण' का 'गणे', 'गणैः'; 'प्रति- गृह्णतः' का 'प्रतिगृह्णतः', 'प्रतिगूह्णतः' ; 'द्विविध' का 'विविध' ; 'उचिता' का 'अभ्यरस्ता' और 'लटभा', का पाठभेद 'ललना' मिलता है। शैली : कह्लण ने द्वितीय तरंग में नूतन उपमा, नवीन शब्दावली तथा सुगठित पदों की रचना की है। प्रथम तरंग में कह्लण ने प्रचलित शब्दों, प्रचलित उपमाओं एवं सरल भाषा का आश्रय लिया है। प्रथम तरंग के ३७३ श्लोकों की रचना के पश्चात् अभिव्यक्ति एवं भाव व्यंजना अधिक परिष्कृत तथा प्रौढ़ हो गयी है। उसके विचारों में कल्पना के स्थान पर गम्भीरता एवं प्रौढ़ता के मुकुलित स्वरूप का दर्शन होता है। प्रथम तरंग में घटनावली, काल गणना, तथा राजाओं के वर्णन के समय उसमें एक प्रकार की झिझक मालूम होती है। वह इतिहास लिख रहा था। परन्तु सामग्री पर्याप्त न होने पर वह विश्रृंखलांत और टूटी कड़ियों को इधर उधर से लाकर जोड़ रहा था।, किसी प्रकार ग्रन्थ को इतिहास का रूप दे रहा था। इस तरंग में वह झिझक कम हो गयी है। उसकी भाषा संयत हो गयी है। वह किंचित् आत्मविश्वास के साथ वर्णन करता है जिसका अभाव प्रथम तरंग में स्पष्ट मिलता है। श्री रणजीत सीताराम पण्डित के अनुवाद में पृष्ठ ५८१ पर इस तरंग में वर्णित ६ राजाओं का वर्गीकरण विक्रमादित्य वंश दिया गया है। श्री स्टीन इस वर्ग का कोई नामकरण नहीं करते। इस वर्ग के राजा एक ही वंश के नहीं थे। अतएव उनका वर्गीकरण किसी नाम से करना उचित नहीं होगा। कह्लण प्रशंसा द्वारा ही द्वितीय तरंगका प्रारम्भ करता है। अर्ध नारीश्वर भगवान् शिव की वन्दना करता है। यह श्लोक द्विविध घटनापूर्ण है। अर्ध नारीश्वर का शरीर पुरुष एवं स्त्री से बना है, और धनुष भी अज एवं गो शृंग से बना है। इस प्रकार कह्लण ने तीन द्विविध घटनाओं का वर्णन कर भगवान् का जय किया है। १ (१) धनुष : शृंगधनुष का कह्लण ने उल्लेख किया है। चाणक्य चार प्रकार के धनुषों का वर्णन करता है। चौथे प्रकार का धनुपदण्ड हड्डी, सींग किंवा शृंग का बनता था। श्रीकृष्ण का धनुष सींग अर्थात् शृंग का था। बाँस, सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा, इस्पात तथा ४७