राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
द्वितीय तरंग विहितमजगोशृङ्गाग्राभ्यां धनुर्घटितं नरकरटिनोर्देहार्धाभ्यां गणं प्रतिगृह्णतः । द्विविधघटनावल्लभ्यानां निधेश्चिता विभो- र्जयति लटभापुंभागाभ्यां शरीरविनिर्मितिः ॥१॥ अज एवं गो के शृङ्गाग्र द्वारा विनिर्मित धनुष¹ तथा मानव एवं मातंग के देहार्ध द्वारा निर्मित गणेश² को साथ में रखने वाले, द्विविध घटना प्रियता-निधि, भगवान् के नर एवं नारी³ अंश से शरीर का निर्माण सर्वोत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है।
पाठभेद: 'ओ' तथा 'ओ श्रीगणेशायनमः' का भी पाठ प्रारम्भ में मिलता है। श्लोक संख्या १ में 'गोशृङ्गा' वा 'अजशृङ्गा' 'गोः शृङ्गा'; 'गण' का 'गणे', 'गणैः'; 'प्रति- गृह्णतः' का 'प्रतिगृह्णतः', 'प्रतिगूह्णतः' ; 'द्विविध' का 'विविध' ; 'उचिता' का 'अभ्यरस्ता' और 'लटभा', का पाठभेद 'ललना' मिलता है। शैली : कह्लण ने द्वितीय तरंग में नूतन उपमा, नवीन शब्दावली तथा सुगठित पदों की रचना की है। प्रथम तरंग में कह्लण ने प्रचलित शब्दों, प्रचलित उपमाओं एवं सरल भाषा का आश्रय लिया है। प्रथम तरंग के ३७३ श्लोकों की रचना के पश्चात् अभिव्यक्ति एवं भाव व्यंजना अधिक परिष्कृत तथा प्रौढ़ हो गयी है। उसके विचारों में कल्पना के स्थान पर गम्भीरता एवं प्रौढ़ता के मुकुलित स्वरूप का दर्शन होता है। प्रथम तरंग में घटनावली, काल गणना, तथा राजाओं के वर्णन के समय उसमें एक प्रकार की झिझक मालूम होती है। वह इतिहास लिख रहा था। परन्तु सामग्री पर्याप्त न होने पर वह विश्रृंखलांत और टूटी कड़ियों को इधर उधर से लाकर जोड़ रहा था।, किसी प्रकार ग्रन्थ को इतिहास का रूप दे रहा था। इस तरंग में वह झिझक कम हो गयी है। उसकी भाषा संयत हो गयी है। वह किंचित् आत्मविश्वास के साथ वर्णन करता है जिसका अभाव प्रथम तरंग में स्पष्ट मिलता है। श्री रणजीत सीताराम पण्डित के अनुवाद में पृष्ठ ५८१ पर इस तरंग में वर्णित ६ राजाओं का वर्गीकरण विक्रमादित्य वंश दिया गया है। श्री स्टीन इस वर्ग का कोई नामकरण नहीं करते। इस वर्ग के राजा एक ही वंश के नहीं थे। अतएव उनका वर्गीकरण किसी नाम से करना उचित नहीं होगा। कह्लण प्रशंसा द्वारा ही द्वितीय तरंगका प्रारम्भ करता है। अर्ध नारीश्वर भगवान् शिव की वन्दना करता है। यह श्लोक द्विविध घटनापूर्ण है। अर्ध नारीश्वर का शरीर पुरुष एवं स्त्री से बना है, और धनुष भी अज एवं गो शृंग से बना है। इस प्रकार कह्लण ने तीन द्विविध घटनाओं का वर्णन कर भगवान् का जय किया है। १ (१) धनुष : शृंगधनुष का कह्लण ने उल्लेख किया है। चाणक्य चार प्रकार के धनुषों का वर्णन करता है। चौथे प्रकार का धनुपदण्ड हड्डी, सींग किंवा शृंग का बनता था। श्रीकृष्ण का धनुष सींग अर्थात् शृंग का था। बाँस, सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा, इस्पात तथा ४७
३७० राजतरंगिणी
अन्य धातुओ से भी धनुष बनाये जाते थे । धनुष का दण्ड बनाने में भैस, गंडा, शरभ की सींग तथा चन्दन, शाल, बेंत, ककुभ अथवा धवल की लकड़ी का भी प्रयोग होता था। अग्निपुराण में धनुष का विशद वर्णन किया गया है। धनुष की डोरी को प्रत्यंचा कहते हैं। प्रत्यंचा तांत, बाँस या अन्य रेशेदार पदार्थों से बनायी जाती थी। चाणक्य ने मुर्वी, मुंज, पास, अर्क, सन, गवेधु तथा स्नायु तन्तुओ से प्रत्यंचा बनाने का वर्णन किया है। धनुष का दण्ड ६ फुट का उत्तम माना जाता है। उससे कम का निम्न श्रेणी का होता है। आर्ष काव्य कालीन धनुष का दण्ड ५॥ फुट तथा बाण ३ फिट का होता था। धनुष का दण्ड दो प्रकार का होता था। साधारण धनुष में दण्ड के दोनों छोरों को प्रत्यचा से सम्बन्धित कर दिया जाता है। यह सुगमता से बन जाता है। दूसरा प्रकार दण्ड में दोनों छोर अर्ध वृत्ताकार धनुष के दोनों ओर दण्ड वैदिक आर्यों का मुख्य आयुध धनुष था। उसका इतना महत्त्व था कि मृतक के दाहिने हाथ में धनुष रख दिया जाता था। दाह क्रिया के पूर्व, उसके हाथ से धनुष ले लिया जाता था ताकि वह भस्म न हो जाय। उसे मृतक द्वारा प्रदत्त थाती समझते थे। धनुर्ज्या को रूप देने पर धनुष के दोनों अग्र भागों को अर्त्नी कहते थे। अप्रयोगावस्था में प्रत्यंचा उतार देते थे। चलाने के समय रूप दिया जाता था। (ऋ० १० : १६६ : ३) कान के समीप तक धनुर्ज्या को खींचकर छोड़ते थे। अतएव उसे कर्णयोनि कहा जाता था। ऋ० ६:७५ : २ तथा ऋ० : २:२४ :८ ग्रीक अर्थात् यूनानी कवि होमर के वर्णन के अनुसार धनुष को वक्षस्थल तक खींचकर छोड़ते थे। अर्थात् भारतीय तथा पाश्चात्य धनुष चलाने में यह भेद था। (इलियाड :४:१२५) धनुष भारत से विश्व में चारों ओर फैला था। भारत से ईरान होता पश्चिमी एशिया तथा वहाँ से यूनान, रोम, मिस्र तथा यूरोप में पहुँचा था।
प्रथम तरंग ३७१ एक अनुवादकर्ता ने शिव के धनुष का नाम 'अजगव' दे दिया है। किन्तु शिव के धनुष अर्थ में यहाँ यह शब्द बैठता नहीं। गणेश तथा धनुष दोनों शिव के पास थे। इसे हम एक रूपक भी इस प्रकार मान सकते हैं कि भगवान् शिव के पार्श्व में बुद्धि के प्रतीक गणेश तथा शक्ति का प्रतीक धनुष दोनो उपस्थित हैं। वह शास्त्र एवं शस्त्र दोनो से समन्वित हैं। शिव ने किरात रूप में अर्जुन से युद्ध कर अपनी अपार शक्ति का परिचय दिया था। बुद्धि अर्थात् गणेश तो उनके पुत्र ही हैं। गणेश : गणेश वैदिक शब्दो में ब्रह्मणस्पति भी है। वह शंकर तथा पार्वती की सन्तान होने पर भी अयोनिज है। (ब्रह्म वै० पु० ८ तथा लिंग० १०२, पार्वती ने अपने शरीर के उबटन की मूर्ति बनाकर उसे सजीव किया था। (पद्म० सृः ४३ ; स्कन्द० ७:१:३८ ; मत्स्य० १५३) । प्रत्येक युगों में गणेश के अवतार, उनका नामादि भिन्न माना गया है। कृत अर्थात् सत्युग में गणेश कश्यप पुत्र विनायक थे। उनका वाहन सिंह था। इस अवतार काल में देवांतक नरांतक का दलन किया था। त्रेतायुग में शिवपुत्र मयूरेश्वर तथा वाहन मयूर था। सिंधू का संहार किया था। द्वापर युग में शिवपुत्र गजानन हुए थे। सिंदूर का विनाश किया था। अरण्य राजा को गणेश गीता सुनाया था। कलियुग में अश्वारूढ धूम्रकेतु नाम नाग में अदिति के गर्भ से जन्म लेंगे। महोत्कट रूप में म्लेच्छों का संहार करेंगे। (गणेशः २:१-६)। गणेश के एकदंत होने का कारण दिया गया है। भगवान् परशुराम ने शंकर-द्वारा प्रदत्त परशु गणेश पर फेंका। परशु शंकर का था। पिता का था अतएव उसका प्रतिकार नही किया जा सकता था। दाँत पर आक्रमण सह लिया। एक दाँत टूट गया। परशु हाथ में ले लिया। उस समय से उनका एक आयुध हो गया। यही कारण है। गणेश के हाथों में परशु आयुध बना मिलता है। कश्मीर में प्राप्त मूर्तियों में परशु आयुध दिखाया गया है। हाथी का मस्तक लगने की भी एक कथा है। भगवती पार्वती स्नान कर रही थी। गणेश द्वार पर बैठे थे। गणेश द्वारपाल किंवा रक्षक का कार्य कर रहे थे। शंकर का प्रवेश रोक दिया। शंकर क्रुद्ध हो गये। पिता-पुत्र का संघर्ष होने लगा। शंकर ने गणेश का मस्तक तोड दिया। पार्वती के आग्रह पर, शंकर ने मानव मस्तक के स्थान पर इन्द्र के गज का मस्तक लाकर, लगा दिया। उस समय से उनका नाम गजानन हो गया। (शिव० कु० १६) एक कथा और है। शनि के दृष्टिपात से गणपति का मस्तक भस्म हो गया। देवताओं ने उसके स्थान पर हाथी का मस्तक लगा दिया। (ब्रह्मवै० ३:१८ भवि०, प्रति० ४:१२) गणपति को सिंदूर प्रिय है। हनुमान की मूर्ति के समान उनकी मूर्ति पर सिंदूर का लेपन किया जाता है। गणपति वध करेंगे, यह कल्पना उठते ही, सिन्दूरासुर ने गणपति को उठाकर नर्मदा में डाल दिया। गणपति के रक्त से नर्मदा का जल रक्तिम हो गया। कालान्तर में गणपति ने सिन्दूरा- सुर का वध किया। उसका लाल रक्त शरीर में लेप किया। उनका समस्त शरीर सिन्दूर के रक्त से रक्त वर्ण हो गया। (गणेश० २:१३७) गणेश की सिद्धि तथा बुद्धि दो पत्नियां हैं। (गणेश० : १:१५) इनकी उपासना से कार्तवीर्य अद्यंग हुआ था। (गणेश० : २ : ७३-८३) गणेश चतुर्भुज है। उनका वाहन मूषक है। गणपति का एक रूप निकुंभ है। वाराणसी स्थित निकुंभ की उपासना करने पर भी दिवोदास की पत्नी सुयशा को पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। दिवोदास क्रोधित हो गया। निकुंभ मन्दिर ध्वस्त करा दिया।
३७० राजतरंगिणी अन्य धातुओं से भी धनुष बनाये जाते थे। धनुष का दण्ड बनाने में भैंस, गंडा, शरभ की सींग तथा चन्दन, शाल, बेंत, ककुभ अथवा धवल की लकड़ी का भी प्रयोग होता था। अग्निपुराण में धनुष का विशद वर्णन किया गया है। धनुष की डोरी को प्रत्यंचा कहते हैं। प्रत्यंचा तांत, बाँस या अन्य रेशेदार पदार्थों से बनायी जाती थी। चाणक्य ने मुर्वी, मुंज, घास, अर्क, सन, गवेधु तथा स्नायु तन्तुओं से प्रत्यंचा बनाने का वर्णन किया है। धनुष का दण्ड ६ फुट का उत्तम माना जाता है। उससे कम का निम्न श्रेणी का होता है। आर्ष काव्य कालीन धनुष का दण्ड ५॥ फुट तथा बाण ३ फिट का होता था। धनुष का दण्ड दो प्रकार का होता था। साधारण धनुष में दण्ड के दोनों छोरों को प्रत्यंचा से सम्बन्धित कर दिया जाता है। यह सुगमता से बन जाता है। दूसरा प्रकार दण्ड में दोनों छोर अर्ध वृत्ताकार धनुष के दोनों ओर दण्ड अर्धचन्द्राकार से उठे रहते थे। उनके छोर पर प्रत्यंचा लगा दी जाती थी। धनुष छोड़ते समय प्रत्यंचा दोनों छोरों पर घूमे अर्धचन्द्राकार दण्ड पर शक्ति से चढ़ायी जाती थी। इसे प्रत्यंचा का चढ़ाना कहते हैं। यह धनुष दण्ड बाँस का भी बनता था। उसे अग्नि से सिकाकर अर्धवृत्ताकार दोनों छोरों पर बना देते थे। किन्तु इस प्रकार का धनुष धातु का अधिक होता था। मध्ययुग में इस प्रकार धातु निर्मित धनुष बहुत प्रचलित थे। धनुष के झुकाव अर्थात् चाप का भी वर्णन मिलता है। चाप के अनुसार प्रत्यंचा भारी या हल्की होती थी। 'कोदण्ड मण्डन' में १८ प्रकार के धनुषों का उल्लेख मिलता है। चाप का विभिन्न भार भी दिया गया है। योगिन् के धनुष का भार २०० पल तथा दूर प्रहार वाले धनुष का भार ९५० या १००० पल दिया गया है। नीति प्रकाशिका में १४ प्रकार के चापों का वर्णन मिलता है। वैदिक आर्यों का मुख्य आयुध धनुष था। उसका इतना महत्त्व था कि मृतक के दाहिने हाथ में धनुष रख दिया जाता था। दाह क्रिया के पूर्व, उसके हाथ से धनुष ले लिया जाता था ताकि वह भस्म न हो जाय। उसे मृतक द्वारा प्रदत्त धातो समझते थे। धनुर्ज्या को कस देने पर धनुष के दोनों अग्र भागों को अर्त्नी कहते थे। अप्रयोगावस्था में प्रत्यंचा उतार देते थे। चलाने के समय कस दिया जाता था। (ऋ० १० : १६६ : ३) कान के समीप तक धनुर्ज्या को खींचकर छोड़ते थे। अतएव उसे कर्णयोनि कहा जाता था। ऋ० ६:७५ : २ तथा ऋ० : २ : २४ : ८ ग्रीक अर्थात् यूनानी कवि होमर के वर्णन के अनुसार धनुष को वक्षस्थल तक खींचकर छोड़ते थे। अर्थात् भारतीय तथा पाश्चात्य धनुष चलाने में यह भेद था। ( इलियड ४:१२५ ) धनुष भारत से विश्व में चारों ओर फैला था। भारत से ईरान होता पश्चिमी एशिया तथा वहाँ से यूनान, रोम, मिश्र तथा यूरोप में पहुँचा था। भारतीय सैन्य विज्ञान का नाम ही धनुर्वेद दे दिया था। यूनानियों के साथ पर्शिया का युद्ध प्राचीन काल में कई बार हुआ था। उसमें भारतीय धनुष विद्या विशारदों ने भाग लिया था। उन्हें सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना गया था। धनुष विद्या भारत में अत्यन्त विकसित थी। कल्हण यहाँ पर धनुष के अग्र भाग में अज तथा गाय के सींग अर्थात् श्रृंग लगने का उल्लेख करता है। प्राचीन काल में धनुष के दोनों सिरों को दृढ़ और मजबूत बनाने के लिए, सींग तथा किसी धातु को जड़ कर, उसे अधिक टिकाऊ बना देते थे। डोरी अथवा प्रत्यंचा को चढ़ाने के लिये उसमें खाँचा बना रहता था। उसमें प्रत्यंचा लगा दी जाती थी। कश्मीर में गाय तथा अज का सींग, भैस, भैंसा, गैंडा तथा शरभ की अपेक्षा छोटा होता था। वह धनुष दण्ड बनाने के अयोग्य था। अतएव उसे दोनों छोरों पर लगाया जाता था।
प्रथम तरंग ३७१ एक अनुवादकर्ता ने शिव के धनुष का नाम 'अजगव' दे दिया है। किन्तु शिव के धनुष अर्थ में यहाँ यह शब्द बैठता नही। गणेश तथा धनुष दोनो शिव के पास थे। इसे हम एक रूपक भी इस प्रकार मान सकते है कि भगवान् शिव के पार्श्व मे बुद्धि के प्रतीक गणेश तथा शक्ति का प्रतीक धनुष दोनो उपस्थित है। वह शास्त्र एवं शस्त्र दोनो से समन्वित है। शिव ने किरात रूप में अर्जुन से युद्ध कर अपनी अपार शक्ति का परिचय दिया था। बुद्धि अर्थात् गणेश तो उनके पुत्र ही है। गणेश : गणेश वैदिक शब्दो में ब्रह्मणस्पति भी है। वह शंकर तथा पार्वती की सन्तान होने पर भी अयोनिज है। (ब्रह्म वै० पु० ८ तथा लिंग० १०२) पार्वती ने अपने शरीर के उबटन की मूर्ति बनाकर उसे सजीव किया था। (पद्म० सृः ४३ ; स्कन्द० ७:१:३८; मत्स्य० १५३ ।) प्रत्येक युगों मे गणेश के अवतार, उनका नामादि भिन्न माना गया है। कृत अर्थात् सत्ययुग में गणेश कश्यप पुत्र विनायक थे। उनका वाहन सिंह था। इस अवतार काल में देवांतक नरातक का दलन किया था। त्रेतायुग मे शिवपुत्र मयूरेश्वर तथा वाहन मयूर था। सिन्धू का संहार किया था। द्वापर युग मे शिवपुत्र गजानन हुए थे। सिंदूर का विनाश किया था। वरेण्य राजा को गणेश गीता सुनाया था। कलियुग में अश्वारूढ धूमकेतु नाम भाग में अदिति के गर्भ से जन्म लेंगे। महोत्कट रूप में म्लेच्छो का सहार करेंगे। (गणेशः २:५-६)। गणेश के एकदंत होने का कारण दिया गया है। भगवान् परशुराम ने शंकर-द्वारा प्रदत्त परशु गणेश पर फेंका। परशु शंकर का था। पिता का था अतएव उसका प्रतिकार नही किया जा सकता था। दाँत पर आक्रमण सह लिया। एक दाँत टूट गया। परशु हाथ में ले लिया। उस समय से उनका एक आयुध हो गया। यही कारण है। गणेश के हाथों मे परशु आयुध बना मिलता है। कश्मीर में प्राप्त मूर्तियों में परशु आयुध दिखाया गया है। हाथी का मस्तक लगने की भी एक कथा है। भगवती पार्वती स्नान कर रही थी। गणेश द्वार पर बैठे थे। गणेश द्वारपाल किंवा रक्षक का कार्य कर रहे थे। शंकर का प्रवेश रोक दिया। शंकर क्रुद्ध हो गये। पिता-पुत्र का संघर्ष होने लगा। शंकर ने गणेश का मस्तक तोड दिया। पार्वती के आग्रह पर, शंकर ने मानव मस्तक के स्थान पर इन्द्र के गज का मस्तक लाकर, लगा दिया। उस समय से उनका नाम गजानन हो गया। (शिव० कु० १६) एक कथा और है। शनि के दृष्टिपात से गणपति का मस्तक भस्म हो गया। देवताओं ने उसके स्थान पर हाथी का मस्तक लगा दिया। (ब्रह्मवै० ३:१८ भवि०, प्रति० ४:१२) गणपति को सिंदूर प्रिय है। हनुमान की मूर्ति के समान उनकी मूर्ति पर सिंदूर का लेपन किया जाता है। गणपति वध करेंगे, यह कल्पना उठते ही, सिन्दूरासुर ने गणपति को उठाकर नर्मदा में डाल दिया। गणपति के रक्त से नर्मदा का जल रक्तिम हो गया। कालान्तर में गणपति ने सिन्दूरा- सुर का वध किया। उसका लाल रक्त शरीर में लेप किया। उनका समस्त शरीर सिन्दूर के रक्त से रक्त वर्ण हो गया। (गणेश० २:१३७) गणेश की सिद्धि तथा बुद्धि दो पत्नियां हैं। (गणेश० : १ : १५) इनकी उपासना से कार्तवीर्य अव्यंग हुआ था। (गणेश० : २:७३-८३) गणेश चतुर्भुज हैं। उनका वाहन मूषक हैं। गणपति का एक रूप निकुंभ है। वाराणसी स्थित निकुंभ की उपासना करने पर भी दिवोदास की पत्नी सुयशा को पुत्र प्राप्ति नही हुई। दिवोदास क्रोधित हो गया। निकुंभ मन्दिर ध्वस्त करा दिया।
३७२ राजतरंगिणी निकुंभ ने वाराणसी नष्ट होने का शाप दिया । तालजंघादि दैत्यों ने वाराणसी नगर ध्वस्त किया । दिवोदास पलायन कर गया । अन्त में निकुंभ की पुनः स्थापना की गयी । वाराणसी समृद्धिशाली हो गयी । इस कथा में वर्णित निकुंभ ही गणपति नाम से प्रख्यात हुए । ( वायु० : ९२ : ३९-५१ ) गणेश ओंकार स्वरूप हैं । उनकी उपासना का अर्थ ब्रह्म की उपासना मानी गयी है । (गणेश० : १ : १३-१५ ) एतदर्थ सर्व विद्या एवं कलाओं का उन्हें अधिपति माना जाता है । किसी भी देवता की उपासना के पूर्व सर्वप्रथम गणेश की पूजा की जाती है । (पद्म० : सृ० : ९३ ) अ-उ-म् से ओंकार बनता है । यह प्रणव है । तुरीय नाम चतुर्थ भाग भी ॐ कार में समाविष्ट है । जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय चारों अवस्थाओं का ॐ कार द्योतक है । वाच्य तथा वाचक दोनों रूपों से ॐ कार वर्णित है । अतएव वेदों का ॐ कार से प्रारम्भ करने की प्रथा प्रचलित हुई थी । कालान्तर में गजमुख गणेश का स्वरूप ॐ कार से ही विकसित हुआ । ॐ कार तथा गणेश की प्रचलित एवं प्राचीन मूर्तियों के रूपों में साम्य मिलता है । गणेश की गजमुख मूर्ति अबतक पांचवीं शताब्दी के पूर्व की नहीं प्राप्त हो सकी है । सन्त ज्ञानेश्वर ने गीता की ज्ञानेश्वरी टीका में गजमुख तथा ॐ कार की एकता स्पष्ट की है । इस एकता के कारण उपनिषद् प्रतिपादित ॐ कार वेद एवं सार्वत्रिक, सर्व कार्यारम्भ में आद्य स्थान प्राप्त कर लिया । बाल गणपति, तरुण गणपति, भक्ति विघ्नेश्वर, शक्ति गणेश, उच्छिष्ट गणपति, नृत्त गणपति, हेरंब गणपति, प्रसन्न गणपति आदि रूपों में गणपति की मूर्तियाँ मिलती हैं । इसी प्रकार विनायक के आठ रूपों की कल्पना की गयी है । (३) अर्धनारीश्वर : एक कथा है । बाइबिल के आदम तथा हौवा की कथा से मिलती है । बाइ- बिल के अनुसार सर्व प्रथम आदम को भगवान् ने बनाया । तत्पश्चात् उसकी एक पसली से हौवा को बनाया । इस प्रकार मानव एक ही मनुष्य का अंग है । शिव पुराण में कथा मिलती है । ब्रह्मा ने प्रजा उत्पत्ति निमित्त तपस्या की । शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न हो गये । उनके शरीर से अर्द्ध- नारी-नरेश्वर उत्पन्न हुए । ( शिव० स० १०१ ) स्कन्द पुराण में एक और कथा का वर्णन है । महिषासुरमर्दिनी ने महिषासुर का वध किया । शिव संतुष्ट हुए । प्रसन्न हुए । मन्दराचल पर पार्वती तपस्या कर रही थीं । पार्वती को वामांग पर शिव ने ले लिया । शंकर के इस प्रेम प्रदर्शन से प्रफुल्लित होकर, पार्वती भगवान् शंकर के वामांग में लीन हो गयीं । शंकर एवं पार्वती एक ही शरीर के दक्षिण तथा वामांग हो गये । शिव का शुद्ध दक्षिणांग शुक्लवर्ण रह गया । पार्वती का शरीर वामांग ताम्रवर्ण युक्त हो गया । अर्धभाग में कंचुकी तथा हार आदि आभूषण रह गये और यथावत् पुरुष स्वरूप रह गया । यह शिव पार्वती का अर्ध नारीश्वर किंवा अर्धनारी-नरेश्वर रूप हो गया । (स्कन्द० १ : २ : ३-२१; मत्स्य० २६०) मनुस्मृति में भी इसी प्रकार की एक कथा दी गयी है । हिरण्यगर्भ को सृष्टि रचना की इच्छा हुई । उसने अपने शरीर को दो भाग किये । अर्ध भाग से स्त्री तथा दूसरे अर्ध भाग से पुरुष शरीर की रचना हुई । एक ही शरीर के दो अंश थे । मिलने पर, अर्ध नारीश्वर रूप अर्थात् पुरुष तथा स्त्री एक में हो गये । ( मनु० : १ : ३२ ) देवी भागवत में और एक कथा इसी से मिलती- जुलती दी गयी है । ईश्वर अपनी स्वेच्छा से विविध रूप हो गये । दायां भाग पुरुष तथा वाम भाग स्त्री का हो गया । उसने यह कार्य सृष्टि रचना की दृष्टि एवं इच्छा से किया । (दे० भा० २ : २७ ) किष्किन्धा काण्ड वाल्मीकीय रामायण में इस
सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है कि स्त्री का मूल पुरुष से भिन्न नहीं है। (कि० : ३४ : ३८) ऋग्वेद में यद्यपि अर्धनारीश्वर शब्द का उल्लेख नहीं मिलता, तथापि उसकी कल्पना मिलती है। पुरुष एवं प्रकृति इस सृष्टि प्रक्रिया के केन्द्र बिन्दु हैं। प्रतीकात्मक स्वरूप हैं। इसकी व्यंजना स्पष्ट प्रतीत होती है। द्यावा-पृथ्वी लोक की मध्यवर्ती सृष्टि हैं। माता-पिता, योषा-वृषा प्राण हैं। अग्नि-सोम, पुरुष-स्त्री हैं। पति-पत्नी के द्वन्द्व द्वारा प्राणी जगत् का सृजन होता है। पुरुष में अग्नि तत्त्व तथा स्त्री में सोम तत्त्व प्रधान है। स्त्री के आभ्यंतर में अर्धभाग पुरुष का विद्यमान रहता है। जहाँ अग्नि है। वहीं अर्धभाग सोम है। अतएव ऋग्वेद (१ : १६४ : १६) कहता है—'स्त्रियः सतींस्वा उ मे पुंस आहुः।' स्त्री का शोणित आग्नेय एवं पुरुष का शुक्र सौम्य भाव से युक्त रहता है। शुक्र एवं शोणित ही वैज्ञानिक भाषा में वृषा एवं योषा अर्थात् नर-नारी है। स्त्री तथा पुंलिंग हैं। सृष्टि के इस आदि भूत मातृत्व एवं पितृत्व को प्रतीक रूप में पुराणों में पार्वती एवं परमेश्वर कहा गया है। शिव पार्वती ही रुद्र एवं अम्बिका हैं। शतपथ ब्राह्मण (५ : ३ : १ : १०) में उल्लेख है—'अग्निर्वै श्नितः।' इसी को तैत्तिरीय ब्राह्मण दुहराता है—'एवं रुद्र. यदग्निः।' (१:१:५:८-६) ऋग्वेद कितनी वैज्ञानिक भाषा में कहता है - 'अग्निर्जगतितमयं सोम आह तवाह्मस्मि सहर् न्योकाः।' (५ : ४४ : १५) अग्नि एवं सोम जगत् के माता पिता है। अग्नि अन्नाद है। सोम उसका अन्नरूप द्वारा संभरण करता है। सृष्टि रचना के लिये पुरुष एवं स्त्री दोनों तत्त्व अनिवार्य हैं। वनस्पति से लेकर समस्त प्राणधारियों की उत्पत्ति इन दोनों तत्त्वों के मिलन का परिणाम हैं। पुरुष नारी में बीज वपन करता है। नारी गर्भ में पुरुष के अग्निकण को लेकर सम्वर्धन करती है। वह बीज विराट रूप धारण करता है। बीज की शक्ति के अनुसार, जो मात्रा का आधान करती है, वही माता है। वही पिता एवं माता शिव एवं शक्ति के प्रतीक हैं। शक्ति विहीन शिव रुद्र हैं। उनका स्वरूप घोर हो जाता है। शक्ति के साथ मिलने पर उनका स्वरूप शिव होता हैं। इसे दूसरी तरह से समझे तो अर्थ होगा। यदि अग्नि को सोम स्वरूप अन्न प्राप्त नही होता, तो वह जिसमें रहती हैं, उसी को भस्म करती हैं। यह रुद्र रूप है। यह संहार का स्वरूप है। किन्तु अग्नि में सोम की आहुति याग है। इस यज्ञ का स्वस्ति भाव होता है। वह स्वस्ति भाव शिव-शक्ति किंवा अग्नि-सोम का समन्वित रूप है। यही अर्धनारीश्वर है। वैदिक साहित्य में नैसर्गिक एवं व्याधि-जनित उत्पात-संहारक देवता को रुद्र कहा गया है। किन्तु उन्हीं उत्पातों का शमनकारी देवता शिव बन गया है। अतएव रुद्र एवं शिव एक ही देव के रौद्र एवं शान्त स्वरूप हैं। कालान्तर में रुद्र के नाम, रुद्र, भव, शर्व (शिव) पशुपति, भीम, ईशान, उग्र एवं महादेव पड़ गये। रुद्र की पत्नी सुवर्चला किंवा सती, पुत्र शनिश्चर तथा निवास स्थान सूर्य, भव की पत्नी उमा (उषा) पुत्र शुक्र निवास स्थान जल; शर्व (शिव) की पत्नी विकेशी, पुत्र मंगल, निवास स्थान मही, पशुपति की पत्नी शिवा, पुत्र मनोजव, निवास स्थान वायु, भीम की पत्नी स्वाहा (स्वधा) पुत्र स्कन्द निवास स्थान अग्नि; ईशान की पत्नी दिशा, पुत्र स्वर्ग, निवास स्थान आकाश; उग्र की पत्नी दीक्षा, पुत्र संतान, निवास स्थान यशीय ब्राह्मण तथा महादेव की पत्नी रोहिणी, पुत्र बुध और निवास स्थान चन्द्र कहा गया है। यही अष्ट रुद्र हैं। (विष्णु० १:८; माव० ४९; पद्म०, सृ० ३; वायु, २७; स्कन्द ७ : १ : ८७) इस रूप में प्रत्येक के साथ शक्ति स्वरूप पत्नी है। सभी पार्वती किंवा आदि शक्ति की प्रतीक हैं।
३७४ राजतरंगिणी भूयो राज्यार्जनोद्योगस्तेनात्यज्यत भूभुजा । जरसा शमिशवाण्या च कर्णमूलमवाप्तया ॥२॥ २. अपनी जरावस्था तथा शमियों १ की श्रुत वाणी के कारण उस राजा ने पुनः राज्य प्राप्ति का उद्योग त्याग दिया। अनयद्विनयोदातः समं स्वविषयेण तान् । विषयान्वशिनाग्र्यः स तान्पश्चादपि विस्मृतिम् ॥३॥ ३. जितेन्द्रियों में अग्र एवं विनयोदात्त उस राजा ने विषय१ (स्वदेश) के साथ अपने पंचेन्द्रिय विषयों को भी विस्मृत कर दिया।
[बायाँ स्तम्भ] शिव के साथ उनकी अर्धांगिनी हैं। वह अलग नहीं सचमुच एक ही शरीर, एक ही विश्व, एक ही ब्रह्माण्ड के पुरुष एवं शक्ति, सृष्टि के मूल कारण नर-नारी हैं। मूलतः प्रजापति एक थे। अकेले थे। उनमें सृष्टि रचना का संकल्प उदय हुआ। उन्होंने अपने शरीर के दो खण्ड कर दिये। उसमें एक अर्धभाग स्त्री एवं दूसरा भाग पुरुष हुआ। अर्ध- नारीश्वर सृजन स्रोत के प्रतीक हैं। वह मिलन के साकार स्वरूप हैं। अर्धनारीश्वर की अनेक मूर्तियाँ मिलती हैं। एक प्रभावशाली मूर्ति एलोरा के कैलास मन्दिर में हैं। अब तक उपलब्ध सबसे प्राचीन मूर्ति मथुरा संग्रहालय में प्रथम शती कुशान कालीन है। दक्षिण पूर्व एशिया का मैंने पर्याप्त पर्यटन किया हैं। यह आदि शक्ति हैं कम्बूज के एंगकोर वाट में दारु, पाषाण एवं मृण्मयी अनेक मूर्तियाँ मैंने अर्धना- रेश्वर की देखीं हैं। श्याम अर्थात् थाईलैण्ड में अर्ध- नारीश्वर की मूर्ति तथा उसका पूजन किसी समय खूब प्रचलित था। (द्रष्टव्य हैं दक्षिण पूर्व एशिया ) पाठभेद : श्लोक संख्या २ में 'जरसा' का 'रजसा' और 'शमि' का 'दमि' पाठभेद मिलता है। २. (१) शमी : शमी का अर्थ शान्त, संयमी तथा जितेन्द्रिय होता है। स्वदोषों को शमन करने वालो को शमी कहते हैं।
[दायाँ स्तम्भ] पाठभेद : श्लोक संख्या ३ मे 'दातः' का पाठभेद 'दातुः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३ (१) विषय, विशः-विषय : वैदिक काल में एक समिति थी। समिति का अर्थ एक स्थान पर सबका एकत्रित होना था। एक समिति जन- साधारण की 'विशः' थी। राष्ट्रीय सभा थी। वैदिक काल में हिन्दू समाज जनो अथवा वर्गों में विभक्त था। यथा-मनु, यदु, कुरु। साथ ही वे लोग यह भी समझते थे। हमलोग एक ही जाति के हैं। क्योकि वे सब लोग अपने आपको आर्य कहते थे। वर्गों के लोग 'विशः' कहलाते थे। जिससे वैश्य शब्द निकला है। यूनानियों ने भारत पर आक्रमण किया। भारतीयों के सम्पर्क में आये। परन्तु पंजाब से आगे नहीं बढ़ सके। यूनानी लेखको ने राष्ट्र एवं विशः को एक ही माना है। ये प्रत्येक राज्य के नागरिको को विशः की संज्ञा देते हैं। सिन्ध तथा पंजाब के प्रायः सभी राज्यों के विषय में उन्होंने यही कहा है। किन्तु भारतीय लेखक उन्हें जनपद तथा देश कहते थे। (पाणिनि : ४ : १ : १६८-१७०) कल्हण ने विषय शब्द का प्रयोग देश किंवा उसके राजा के सम्बन्ध में किया है। विषय, विश्य अथवा विशः निसन्देह देश एवं राज्य
प्रथम तरंग ३७५ धावन्राज्येच्छया दुर्गाङ्गलिकायां स्वमन्त्रिभिः । कालेन स्थापितो यद्वद्वेत्यभ्यधायि तु कैरपि ॥४॥ ४. राज्येच्छा से दौड़ते१हुए राजा को उसके मन्त्रियों२ ने दुर्गाङ्गलिका३ में बन्दी बना दिया। ऐसा कुछ लोगों ने कहा है।
से छोटा माना जाने लगा था। उसका अर्थ समय की गति से बदलता गया। मूल में विषय शब्द के समानार्थक शब्द देश, विषय एवं उपवर्तन थे। सुदूर प्राचीन काल से ही कश्मीर उपत्यका छोटे प्रशासकीय विभागों में विभाजित थी। उन्हें प्रचलित भाषा में परगना कहते हैं। उनका प्राचीन नाम विषय था। लोक प्रकाश में उल्लेख आता है कि २७ विषयों में कश्मीर राज्य विभक्त था— —'एषां सप्तविंशतिविषयाणां अन्तरालोप- वेषणकः'—पृष्ठ ७७ 'खोयाश्रमि, एकेन, क्रोधन, द्राविशति, चालन, समाला, देवसुची (र), भृंग, वितस्ता, सत्रव, खरवारि, नील, हारी, जलहट्टीय, खड्वीय, फग्णा, लहर, षोलडोय, नीलाश्व ।' उक्त १६ विषयों का नाम लोकप्रकाश में मिलता है। उनका आधुनिक नाम निम्नलिखित रूप से हो गया है। खोयाश्रमी = खुयाशम, खायाध (हा) मी, शमाला = समाला, औलिदिय = होल्डा, लूहरो = लहर; नीलाश = नीलाश्व; खड्वीय = खदुवी; एकेन = एकेनक, देवसुवी = देवसरस; क्रोधन = क्रुहिन परगना, देवाविसती = द्रुन्त परगना भृंग = ब्रिँग परगना, फग्णा = फक; तथा चालन, वि स्ता, सतरव, स्वनवारी नील, हारी, जलहट्टिय, क्या थे और है निश्चित पता नहीं चलता । लोक प्रकाश से यह पता नहीं लगता कि ये विभाग कब बनाये गये तथा उनका वास्तविक रूप क्या था। वे किस समय तक अपने पूर्व एवं परिव- र्तित रूप में स्थित थे।
अबुल फजल के समय में ३८ परगना थे। उसके पूर्व काजी अली के अनुसार ४१ परगना थे । सिखों के राज्य काल में कश्मीर में करीब ३६ परगना थे। मूर क्राफ्ट (स० १८२८ ई०) बैरन हुगेल (स० १८३५ ई०) तथा वाइन (स० १८४० ई०) ने परगनों की संख्या ३६ दी है। परन्तु उनके दिये नाम नहीं मिलते। परगनों की सीमा तथा नाम डोगरा राज काल तक बदलता रहा है। मेजर बेट्स (स० १८६५ ई०) ने परगनों की संख्या ४३ दी है। कालान्तर में भारत के समान परगनों के स्थान पर तहसीलों में कश्मीर बांटा गया। डोगरा राज्य काल में ११ तहसीलें थी । आज कल जम्मू कश्मीर राज्य का राजनीतिक विभाजन पूर्णतया बदल गया है। दूसरे विषय का अर्थ काम वासना यहाँ लगना चाहिए। विषय, रूप, शब्द, गन्ध, रस एवं स्पर्श हैं। इन्ही को विषय गोचर इन्द्रियां भी कहा जाता हैं। विषय शब्द आश्रय के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। इन्द्रियों का नाम विषयिन् कहा गया है। विषय इन्द्रियों के द्वाराहोते हैं। इन्द्रियों के वशीभूत जो हो जाता है, वही विषयो है। कल्हण के कहने का यहाँ तात्पर्य यही है कि राजा विषय युवत अर्थात् विषयो हो गया था। वह इन्द्रियजयी नहीं इन्द्रियो के वशीभूत था । पाठभेद : श्लोकसंख्या ४ मे 'बद्ध्वे' का 'बद्धे' तथा 'बद्धै' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४ (१) धावन : इस श्लोक का एक अर्थ यह भी हो सकता है—'राज्येच्छा से दुर्गांगलिका में
३७६ राजतरंगिणी
पाश्रित उस राजा को उसके मन्त्रियों ने वन्दी बना लिया। ऐसा कुछ लोग कहते हैं।' (२) मन्त्री : मन्त्री तथा मन्त्रि परिषद् पर टिप्पणी पांचवें श्लोक की मन्त्रि तथा मन्त्री परिषद द्रष्टव्य है । ४ (३) दुर्गागलिका : यह श्रीनगर में द्रगजन स्थान है । शंकराचार्य पर्वत के पश्चिम मूल से डल झोल के फाटक के मध्य का स्थान दुर्गागलिका नाम से प्रसिद्ध था। द्रगजन मूल शब्द दुर्गागलिका का अप- भ्रंश है। श्रीनगर के कुछ लोगों को यह अभी तक याद है। कभी यहाँ कोई राजा बन्दी रखा गया था। इस लेक के दक्षिणी पूर्वी एक भाग को गगरी बल कहते हैं। शंकराचार्य पर्वत जिसका एक बाहू उत्तर की ओर निकलता है। डल लेक के समीप पहुँच जाता है। इसके तथा डल के मध्य का स्थान गगरी बल कहा जाता है । उसके उत्तर पूर्व के डल के अंचल को गगरी बल कहते हैं। गगरी बल स्थान भी गगरी बल जल संघटन से दक्षिण पश्चिम की ओर जल की चौड़ी नहर तुल्य जल प्रणाली चली गयी है। वितस्ता से एक नहर निकलकर उत्तर नवपुरा को ओर गयी है। और सेतु से पुनः पश्चिम दक्षिण की ओर मुड़ जाती है । गरु अर्थात् महा सरित पर जो पुल यहाँ बना था उसका नाम नवपुरासेतु कहा गया है। यहाँ से सेतु का बन्धा प्रारम्भ होता है। इस बन्धा के उत्तर दिशा में एक नहर डल लेक से आती है। उसे बारी नम्बल कहते हैं। इसके पूर्वीय छोर पर जहाँ यह श्री शंकराचार्य पर्वत के पादरोधी मूल भाग को स्पर्श करती है यहाँ पर कम से कम एक शताब्दी पूर्व एक द्वार था। जहाँ से प्रचुर कुल का जल लेक से बाहर बहता था। वह जल द्वार उस समय बन्द कर दिया जाता था, जब वितस्ता का जलस्तर, डल के जल स्तर से ऊँचा हो जाता था। यह निर्माण शताब्दियों पुराना है। जिस समय इसका निर्माण हुआ था वह सेतु अथवा बन्ध बनाया गया था। इसी के पास दुर्गागलिका की आबादी थी। यही पर अन्ध युधिष्ठिर बन्दी रखा गया था। ग्रोवर ने इस सेतु का उल्लेख जैनराज तरंगिणी चतुर्थ तरंग में किया है। इससे स्पष्ट होता है कि यह सेतु अत्यन्त प्राचीन निर्माण था। क्योकि ग्रोवर का काल ही ( सन् १४५०-१४८६ ई०) होता है। छिन्नेषु सेतुबन्धेषु तत्तन्नीपुरकादिषु । पूर्दुगँरचनेवाभूद् दुर्गमा तद्विरोधिनाम् ॥ ४:१२१॥ X X X अथ काश्मीरिणः प्रोचुः मैदांसीनीरान्तिकस्थितान् । नौसेतुबन्धरुङ्गाद्यैर्दष्ट्रिउन्नौ भयेन नः ॥४:२४२॥ इस समय यहाँ घनी आबादी हो गयी है। स्थान का पहचानना कठिन हो गया है। भ्रमण काल में मुझे कुछ पण्डितों ने दुर्गागलिका का स्थान श्री शंकराचार्य पर्वत से श्रीनगर-बनिहाल सड़क पर बनिहाल की ओर जाते समय वाम ओर एक दुर्गा का मन्दिर दिखाया गया। यहाँ कुण्ड भी हैं। उनकी संख्या दो है। एक ऊपर है। दूसरा नीचे है। स्थान सुरम्य है। ब्राह्मणो के कुल यहाँ रहते हैं। धर्मशालायें बनी हैं। यहाँ देवी का मन्दिर है। ऊपर शिव लिंग है। मैं यहाँ बहुत समय तक प्राचीन ध्वग्नावशेष- खोजता रहा। कुछ लिखने योग्य यहाँ पर वस्तुएं नहीं मिली। यहाँ भी एक नाग है। प्रतीत होता है कि कल्हण स्वयं निश्चित नहीं कर सका था कि राजा सचमुच बन्दी बनाया गया था या नहीं। अतएव उसने इस घटना का आधार कतिपय लोगों के कथन को माना है। उसे इस घटना की सत्यता का प्रमाण तत्कालीन किसी ग्रन्थ अथवा इतिहासके लेखकों की रचना मे नहीं मिल सका था।
द्वितीय तरंग ३७७ अथ प्रतापादित्याख्यस्तैरानीय दिगन्तरात् । विक्रमादित्यभूर्भर्तुर्जातिरत्राभ्यषिच्यत ॥५॥ ५. उन मन्त्रियों १ ने राजा विक्रमादित्य के वंशज प्रतापादित्य २ को दिगन्तर से लाकर यहाँ अभिषिक्त किया । पादटिप्पणियाँ : उनका परस्पर क्या सम्बन्ध था, इसका अध्ययन ५ (१) मन्त्री एवं मन्त्रि परिषद् : मन्त्रियों राजनीति विज्ञान की दृष्टि से उचित होगा । ने राजा को बाहर से बुलाकर राज्य सिंहासन पर महाभारत ( ३८ : ३० : ३८ : १६, २१ ) ने अभिषिक्त किया था यह कश्मीर के मन्त्रियों किंवा मन्त्री, मन्त्रि परिषद् किंवा मन्त्रिमण्डल को राज्य मन्त्रिपरिषद् की शक्ति तथा अधिकार का एक की प्रकृति या महत्त्व पूर्ण अंग माना है । ज्वलन्त उदाहरण है । राजा मन्त्रिमण्डल पर उतना ही निर्भर था • राजा के निरंकुश होने पर मन्त्रियों का अधि- जितना पर्जन्य पर प्राणिमात्र निर्भर रहता है । कार था । ये उसे हटा सकते थे । अन्ध युधिष्ठिर के जितना स्त्रियाँ पति पर निर्भर रहती हैं। अर्थशास्त्र सम्बन्ध में मन्त्रियों ने यही किया था । राजा को राजा एवं मन्त्री की तुलना रथ के दो चक्रों से जो बैठा सकता है, वह राज सिंहासन से उतार भी करता है । सकता है; मन्त्रि परिषद् का यह अधिकार धर्म सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं न वर्तते । सम्मत माना गया है । कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च शृणुयान्मतम् । भारतीय राजशास्त्र मन्त्रि- मन्त्रि- —अर्थ० . १ १ : १ : ३ परिषद् को यह अधिकार देता है, या नहीं कि, वह मनु ने मन्त्रियों को राज्य कार्य के लिये नितान्त राजा को बन्दी बना ले, अथवा किसी दूसरे व्यक्ति आवश्यक माना है । को उसके स्थान पर राजा चुन ले; इस प्रश्न पर कुछ अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् । प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है । विशेषतोऽसहायेन किन्तु राज्यं महोदयम् ॥ • कश्मीर में मन्त्रियों ने प्रायः राजाओं को —मनु० : ८ : ५३ सिंहासन च्युत किया है । अन्य व्यक्ति को राज- शुक्राचार्य मन्त्रियों की अनिवार्यता और स्पष्ट सिंहासन पर बैठाया है । जनता ने भी राजा रूप से कहते हैं । उनके बिना राज्यपतन अवश्यं- चुना है । भावी हो जाता है । • कश्मीर में मन्त्रि परिषद् बड़ी शक्तिशाली विना प्रकृतिभ्यन्मंत्राद्राज्यताशो भवेन्मम । थी । राजा को निरंकुश नहीं होने देती थी । इस निरोधनं भवेद्देवं राज्ञस्ते स्युः सुमन्त्रिणः ॥ विषय पर भारतीय राजनीतिशास्त्र के विभिन्न —शु० नी० २ : ८२ युगकालीन विद्वानों तथा कल्हण का क्या मत है । स्मृतियों तथा पुराणों ने मन्त्रियों के अधिकार जानना उचित होगा । गुण, कर्तव्यों की विशद व्याख्या की है। वेद भी कल्हण ने मन्त्रियों द्वारा राजाओं को पद च्युत मन्त्री की अनिवार्यता स्पष्ट करता है । तथा प्रतिष्ठापित करने का बहुत उदाहरण उपस्थित ऋग् तथा अथर्ववेद में मन्त्री शब्द का उल्लेख किया है । राजा तथा मन्त्रियों के अधिकार सीमा तथा नही मिलना । यजुर्वेद संहिताओं एवं ब्राह्मण ग्रन्थों ४८
३७६ राजतरंगिणी धावित उस राजा को उसके मन्त्रियों ने बन्दी बना लिया। ऐसा कुछ लोग कहते हैं।' (२) मन्त्री : मन्त्री तथा मन्त्रि परिषद् पर टिप्पणी पाँचवें श्लोक की मन्त्रि तथा मन्त्री परिषद् द्रष्टव्य है। ४ (३) दुर्गांगलिका : यह ब्रोनगर में द्रगज्रन स्थान है। शंकराचार्य पर्वत के पश्चिम मूल से डल झील के फाटक के मध्य का स्थान दुर्गांगलिका नाम से प्रसिद्ध था। द्रगजन मूल शब्द दुर्गांगलिका का अप- भ्रंश है। ब्रोनगर के कुछ लोगों को यह अभी तक याद है। कभी यहाँ कोई राजा बन्दी रखा गया था। डल लेक के दक्षिणी पूर्वी एक भाग को गगरी बल कहते हैं। शंकराचार्य पर्वत जिसका एक बाहु उत्तर की ओर निकलता है। डल लेक के समीप पहुँच जाता है। इसके तथा डल के मध्य का स्थान गगरी बल कहा जाता है। उसके उत्तर पूर्व के डल के अंचल को गगरी बल कहते हैं। गगरी बल स्थान भी गगरी बल जल संचय से दक्षिण पश्चिम की ओर जल की छोटी नहर तुल्य जल प्रणाली चली गयी है। वितस्ता से एक नहर निकलकर उत्तर नवपुरा की ओर गयी है। और सेतु से पुनः पश्चिम दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। सर अर्थात् महा सुरित पर जो पुल यहाँ बना था उसका नाम नवपुरासेतु कहा गया है। यहाँ से सेतु का बन्धा प्रारम्भ होता है। इस बन्धा के उत्तर दिशा में एक नहर इस लेक से अभी है। उसे वारी नम्बल कहते हैं। इसके पूर्वीय छोर पर जहाँ यह भी शंकराचार्य पर्वत के पच्छिमी मूल भाग को स्पर्श करती है वहाँ पर कम से कम एक शताब्दी पूर्व एक द्वार था। वहाँ से सुरूप कुल का जल लेक से बाहर बहता था। यह जल द्वार उस समय बन्द कर दिया जाता था, जब वितस्ता का जलस्तर, डल के जल स्तर से ऊँचा हो जाता था। यह निर्माण शताब्दियों पुराना है। उस समय इसका निर्माण हुआ था जब सेतु बन्धा रूप बनाया गया था। इसी के पास दुर्गांगलिका की आबादी थी। यहीं पर अन्ध युधिष्ठिर बन्दी रखा गया था। श्रोवर ने इस सेतु का उल्लेख जैनराज तरंगिणी चतुर्थ तरंग में किया है। इससे स्पष्ट होता है कि यह सेतु अत्यन्त प्राचीन निर्माण था। क्योकि श्रोवर का काल ही (सन् १४५०-१४८६ ई०) होता है। छिन्नेषु सेतुबन्धेषु तत्तन्नौपूरकादिषु । पूर्दुगंरचनेवाभूद् दुर्गमा तद्विरोधिनाम् ॥ ४:१२१॥ × × × अथ काश्मीरीकाः प्रोचुः मैद्रांस्तीरान्तिकस्थितान् । नौसेतुबन्धरुज्जैर्यदक्ष्विछन्नो भयेन नः ॥४:१४२॥ इस समय यहाँ घनी आबादी हो गयी है। स्थान का पहचानना कठिन हो गया है। भ्रमण काल में मुझे कुछ पण्डितों ने दुर्गांगलिका का स्थान श्री शंकराचार्य पर्वत से ब्रोनगर-बनिहाल सड़क पर बनिहाल की ओर जाते समय वाम ओर एक दुर्गा का मन्दिर दिखाया गया। यहाँ कुण्ड भी हैं। उनकी संख्या दो है। एक ऊपर है। दूसरा नीचे है। स्थान सुरम्य है। ब्राह्मणों के कुल यहाँ रहते हैं। धर्मशालायें बना है। यहाँ देवी का मन्दिर है। ऊपर शिव लिंग है। मैं यहाँ बहुत समय तक प्राचीन ध्वंसावशेष- खोजता रहा। कुछ लिखने योग्य यहाँ पर वस्तुएँ नहीं मिली। यहाँ भी एक नाग है। प्रतीत होता है कि कल्हण स्वयं निश्चित नहीं कर सका था कि राजा सचमुच बन्दी बनाया गया था या नहीं। अतएव उसने इस घटना का आधार कतिपय लोगों के कथन को माना है। उसे इस घटना की सत्यता का प्रमाण तत्कालीन किसी ग्रन्थ अथवा इतिहास के लेखकों की रचना में नहीं मिल सका था।
द्वितीय तरंग ३७७ अथ प्रतापादित्याख्यस्तैरानीय दिगन्तरात् । विक्रमादित्यभृभर्तुर्ज्ञातिरत्राभ्यषिच्यत ॥५॥ ५. उन मन्त्रियों ने राजा विक्रमादित्य के वंशज प्रतापादित्य को दिगन्तर से लाकर यहाँ अभिषिक्त किया ।
पादटिप्पणियाँ : [Left Column] ५ (१) मन्त्री एवं मन्त्रि परिषद् : मन्त्रियों ने राजा को बाहर से बुलाकर राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त किया था यह कश्मीर के मन्त्रियों किंवा मन्त्रिपरिषद् की शक्ति तथा अधिकार का एक ज्वलन्त उदाहरण है । राजा के निरंकुश होने पर मन्त्रियों का अधि- कार था। वे उसे हटा सकते थे । अन्ध युधिष्ठिर के सम्बन्ध में मन्त्रियों ने यही किया था। राजा को जो बैठा सकता है, वह राज सिंहासन से उतार भी सकता है; मन्त्रि परिषद् का यह अधिकार धर्म सम्मत माना गया है। भारतीय राजशास्त्र मन्त्रि... मन्त्रि- परिषद् को यह अधिकार देता है, या नहीं कि, वह राजा को बन्दी बना ले, अथवा किसी दूसरे व्यक्ति को उसके स्थान पर राजा चुन ले; इस प्रश्न पर कुछ प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है । कश्मीर में मन्त्रियों ने प्रायः राजाओं को सिंहासन च्युत किया है। अन्य व्यक्ति को राज- सिंहासन पर बैठाया है। जनता ने भी राजा चुना है । कश्मीर में मन्त्रि परिषद् बड़ी शक्तिशाली थी। राजा को निरंकुश नहीं होने देती थी। इस विषय पर भारतीय राजनीतिशास्त्र के विभिन्न युगकालीन विद्वानों तथा कल्हण का क्या मत है। जानना उचित होगा । कल्हण ने मन्त्रियों द्वारा राजाओं को पद च्युत तथा प्रतिष्ठापित करने का बहुत उदाहरण उपस्थित किया है। राजा तथा मन्त्रियों के अधिकार सीमा तथा ४८
[Right Column] उनका परस्पर क्या सम्बन्ध था, इसका अध्ययन राजनीति विज्ञान की दृष्टि से उचित होगा । महाभारत ( ३८ : ३० : ३८ : १६, २१) ने मन्त्री, मन्त्रि परिषद् किंवा मन्त्रिमण्डल को राज्य की प्रकृति का महत्व पूर्ण अंग माना है। राजा मन्त्रिमण्डल पर उतना ही निर्भर था जितना पर्जन्य पर प्राणिमात्र निर्भर रहता है । जितना स्त्रियाँ पति पर निर्भर रहती है। अर्थशास्त्र राजा एवं मन्त्री की तुलना रथ के दो चक्रों से करता है। सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं न वर्तते । कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च शृणुयान्मतम् । —अर्थ० : १ ३ : १ : ३ मनु ने मन्त्रियों को राज्य कार्य के लिये नितान्त आवश्यक माना है । अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् । विशेषतोऽसहायेन किन्तु राज्यं महोदयम् ॥ —मनु० : ८ : ५३ शुक्राचार्य मन्त्रियों की अनिवार्यता और स्पष्ट रूप से कहते हैं। उनके बिना राज्यपतन अवश्यं- भावी हो जाता है । विना प्रकृतिसन्मंत्राद्राज्यनाशो भवेन्मम । निक्षोधनं भवेद्देवं राज्ञस्ते स्युः सुमन्त्रिणः ॥ —शु० नी० २ : ८२ स्मृतियों तथा पुराणों ने मन्त्रियों के अधिकार गुण, कर्तव्यों की विशद व्याख्या की है। वेद भी मन्त्री की अनिवार्यता स्पष्ट करता है । ऋग् तथा अथर्ववेद में मन्त्री शब्द का उल्लेख नहीं मिलता । यजुर्वेद संहिताओं एवं ब्राह्मण ग्रन्थों
३७८ राजतरंगिणी में 'रत्नी' शब्द का उल्लेख मिलता है। (पं०ब्रा० १९ : १ : ४) 'रत्नी' को 'वीर' की पदवी से सम्बोधित किया गया है। कालान्तर में यही 'रत्नी' 'राजरत्न' 'नवरत्न' आदि की सर्व श्रेष्ठ उपाधि रूप से प्रयुक्त होने लगा। वैदिक काल के 'रत्न' परिषद् में—पुरोहित, पट्टरानी, युवराज, राजन्य, अक्षावाप, क्षत्ता, सेनानी, सूत, संग्रहीता, रथकार आदि प्रमुख राज्याधिकारी होते थे। 'रत्नियों' का स्थान बहुत ऊँचा माना जाता था। वाजपेय यज्ञ काल में राजा 'रत्न बलि' प्रदान हेतु स्वयं 'रत्नियों' के निवास स्थान पर जाता था। वैदिक यज्ञों का प्रचार क्षीण होने के साथ ही साथ, रत्नो वर्ग का अन्त हो गया। वायु पुराण में रत्नियों को दो वर्गों में विभक्त किया गया था। उन्हें सजीव तथा निर्जीव की संज्ञा दी गयी थी। सजीव वर्ग में पट्टरानी, पुरोहित, सेनानी, सूत, मन्त्री, आदि का समावेश होता था। निर्जीव वर्ग में मणि, कृपाण, धनुष, भाला, रत्न, पताका एवं कोपादि थे। (वायु० ५७ : ६८-७१) कालान्तर में 'रत्नी' का स्थान एक अत्यन्त प्रभावशाली संस्था ने ग्रहण कर लिया था उसे 'मन्त्रि परिषद्', 'अमात्य परिषद्' एवं 'साँचव परिषद्' कहते थे। मगधराज अजातशत्रु, कोसल- राज प्रसेनजित के समय मन्त्रियों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। जातक कथाओ में भी इस प्रकार का उल्लेख मिलता है। (जातक स० ५२८ तथा ५५३) मौर्य एवं शुंग राजाओ की 'मन्त्रि परिषद्' थी, (अर्थ शास्त्र : १; अशोक के अभिलेख स० ३ तथा ६ एवं मालविकाग्निमित्र नाटक अंक ५) पश्चिम भारत में शक राजा मन्त्रिपरिषद् की मन्त्रणा से राज्य शासन करते थे। उसके 'मन्त्रि सचिव' तथा 'कर्म सचिव' सदस्य होते थे। (रुद्रदामा का जूनागढ़ शिलालेख) गुप्त राजाओ के अभिलेखों में भी मन्त्रियों का उल्लेख मिलता है। मन्त्रियों का अधिकार असीमित होता गया है। शक्तिशाली राजा का मन्त्रिमण्डल उसका सलाह- कार था। राजा उनकी मन्त्रणा की अवहेलना कर सकता था। दुर्बल राजा पर मन्त्रिपरिषद् हावी हो जाती थी। मौखरि वंश के निस्संतान होने पर, मौखरिसामान्य का सिंहासन मन्त्रियों द्वारा हर्षवर्धन को दिया गया था। मन्त्रि परिषद् की संख्या निश्चित नहीं थी। मनु के मतानुसार मन्त्रियों की संख्या सात या आठ होनी चाहिए। (म० ७ : ५४) महाभारत का मत है कि मन्त्रियों की संख्या आठ होनी चाहिए। 'अष्टानां मन्त्रिणां मध्ये मन्त्रं राजोपधारयेत्।' अर्थशास्त्र में उल्लेख आता है—मानव सम्प्र- दाय १२; बार्हस्पत्य पंथी १६; औशनस पंथी २० मन्त्रियों की संख्या देते हैं। (अ १ : १५) शुक्रा- चार्य १० राज्य की प्रकृति में मन्त्रियों की गणना करते हैं। (शु० २ : ६९-७९) किन्तु मनु एवं कौटिल्य इस विषय पर एक मत हैं कि मन्त्रियों की संख्या देश के विस्तार एवं समय की आवश्यकता- नुसार होनी चाहिए। शुक्राचार्य मन्त्रिमण्डल में पुरोहित का रखना आवश्यक नही मानते हैं। (शुक्र० : २ : ७२) किन्तु शुक्र का कथन है कि पुरोहित का भय प्रदर्शन ही राजा को सुपथ पर लाने के लिये पर्याप्त था। (शुक्र० २ : ९९) अशोक के तृतीय तथा षष्ठ अभिलेखों से 'मन्त्रि परिषद्' की कार्य प्रणाली पर प्रकाश पड़ता है। षष्ठ लेख से स्पष्ट पता चलता है कि अमात्यों के निर्णय पर, मन्त्रि परिषद् पुनर्विचार कर सकती था। सम्राट् के आदेशो में भी परिषद् आवश्यकतानुसार संशोधन करती थी। परिषद् में मत वैभिन्नय होने पर सम्राट् अशोक का निर्णय अन्तिम माना जाता था। एक स्थान पर अशोक के दान पर उसकी मन्त्रि- परिषद् ने सीमा लगा दी थी। युवान च्वांग ने पर्यटन संस्मरण में लिखा है कि श्रावस्ती का राजा
[द्वितीये तरंग] [३७९]
[बायाँ स्तम्भ] विक्रमादित्य ५ लाख मुद्रा दान देना चाहता था। परन्तु मन्त्रि परिषद् ने रोक दिया कि प्रजा का अप- शब्द सुनना पड़ेगा। वार्दजलि जातक में कथा मिलती है कि मन्त्रियों ने वार्दजलि को उसकी मूर्खता के कारण युवराज नहीं बनने दिया। अशोक कश्मीर का राजा था। अतएव कश्मीर के शासन में वह मन्त्रि परिषद् जैसी संस्था को किसी न किसी रूप में अवश्य रखा होगा। शक राजाओं के समय में भी मन्त्रि परिषद् थी। शक राजाओं ने कश्मीर पर शासन किया था। गुप्त काल के पश्चात् उत्तर भारत में मन्त्रि परिषद् का उल्लेख नही मिलता। कल्हण के वर्णन से पता चलता है कि कश्मीर में मन्त्रि परिषद् का कभी लोप नहीं हुआ। वह अत्यन्त शक्तिशाली संस्था थी। निस्सन्देह उत्तर भारत, उत्तर गुप्त काल में, केवल कश्मीर ही अपवाद था। जहाँ मन्त्रि परिषद् सक्रिय थी। शुंग काल में भी राजाओं ने मन्त्रि परिषद् को कायम रखा था। दक्षिण भारत में चोल राज्य में दसवीं शताब्दी तक कश्मीर के समान मन्त्रि परिषद् सक्रिय एवं शक्तिशाली थी। मन्त्रि परिषद् को राजा नियुक्त करता था। नियुक्त मन्त्रियों के समवेत रूप का नाम मन्त्रि- परिषद् था। कश्मीर में राजा ही मन्त्री नियुक्त करते थे। सब मन्त्री मिलकर मन्त्रि परिषद् अर्थात् मन्त्रि मण्डल बनाते थे। मन्त्री राजा के प्रति और अप्रत्यक्ष रूप से जनता के प्रति उत्तरदायी था। मन्त्रियों की शक्ति एवं प्रतिष्ठा उनके व्यक्तित्व पर निर्भर थी। धर्मशास्त्र ही उनका विधि ग्रन्थ था। नीति तथा स्मृतियों का उल्लंघन न तो मन्त्री कर सकता था और न राजा। दोनों ही अपने अधिकार की सीमा तत्कालीन प्रचलित नीति, स्मृति तथा धर्म शास्त्रों से निर्धारित करते थे।
[दायाँ स्तम्भ] राजा के शक्तिशाली होने पर 'राजयत्त तन्त्र' तथा मन्त्रियों के शक्तिशाली होने पर 'सचिवायत्त- तन्त्र' शासन कहा जाता था। सामान्य स्थिति का नामकरण 'उभयायत्त' शासन कहा जाता था। ('मुद्राराक्षसः अंक ३; कथासरित्सागर १ : ५८-५९) कश्मीर में मन्त्रियों ने अनेक राजाओं को राज- सिंहासन पर बैठाया, अनेकों को सिंहासन से उतारा है उनका उल्लेख यथा स्थान किया गया है। मन्त्रियों ने राजा युधिष्ठिर को बन्दी गृह में रखा और इसी वंश के प्रथित को राजसिंहासन पर बैठाया। यह मन्त्रि परिषद् के अधिकार सीमा के अन्तर्गत था। जिसका प्रयोग समय समय पर कश्मीर में होता रहा है। यह नीति, स्मृति व्यवहार एवं न्याय सम्मत था। (२) प्रतापादित्य : श्री विलसन ने अभिषेक का समय ईसापूर्व १६८ वर्ष ९ मास तथा समांकृत काल ईसा पूर्व १० वर्ष तथा राज्य काल ३२ वर्ष माना है। श्री स्टीन ने राज्याभिषेक काल कल्हण के वर्ष गणनानुसार लौकिक संवत् २८९६ वर्ष तथा राज्यकाल ३२ वर्ष रखा है। श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय ईसापूर्व १६९ वर्ष रखा है। श्री चन्द्रकान्त बाली ने अपनी ज्योतिषगणना के अनुसार प्रतापादित्य का सप्तर्षि संवत् ३७८५ तथा सन् १५ ई० दिया है। आइने अकबरी में प्रतापादित्य का नाम परतोपदत्त लिखा है। उसमें लिखा है कि वह विक्रमादित्य का वंशज था। उसका राज्यकाल अबुल फजल २३ वर्ष देता है। हसन प्रतापादित्य के सन्दर्भ में लिखता है— राजा प्रतापादित्य २८८६ क० बहुक्म सिकन्दर और महल कश्मीर के इत्तफाक से हुकूमत कश्मीर पर सरफरोज हुआ। और ममलकत और फौज और रैय्यत को आराइश में जान दिल से कोशिश की। तीस साल हुकूमत में गुजरे। (पृ०५२-५३)
३८० राजतरंगिणी शकारिर्विक्रमादित्य इति स भ्रममाश्रितैः । अन्यैरन्यथाऽलेखि विसंवादकदर्थितम् ॥६॥ ६. 'वह शकारि विक्रमादित्य' था'—इस प्रकार विसंवाद कदर्थित को भ्रान्त अन्य लोगों ने अन्यथा लिखा है । इदं स्वभेदविधुरं हर्पादीनां धराभुजाम् । चिरकालमभूद्भोज्यं ततः प्रभृति मण्डलम् ॥७॥ ७. उस समय से पारस्परिक कलह ग्रस्त यह मण्डल१ हर्पादि२ राजाओं का चिर काल तक उपभोग्य बना रहा । श्री विवैउद्दीन तथा श्री नारायण कौल का मत है कि प्रतापादित्य मालवा के राजा विक्रमादित्य से सम्बन्धित था । अभी तक कोई ऐसा आधिकारिक प्रमाण प्राप्त नहीं हो सका है कि निष्कर्ष निकाला जाय कि वास्तव में प्रतापादित्य विक्रमादित्य का सम्बन्धी था । इस पर अभी अनुसन्धान की आवश्य- कता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ६ में 'रति सभ्रम' का 'स इति भ्रम', 'डति संभ्रम' तथा 'विसंवादक' का पाठभेद 'विसंवादिक' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ६ (१) विक्रमादित्य : द्वितीय तरंग में वर्णित ६ राजाओं का सम्बन्ध गोनन्द वंश से प्रतीत नहीं होता । शक संवत् का प्रारम्भ सन् ७८ ई० से होता है । किन्तु श्री स्टीन के नोट के अनुसार प्रतापादित्य का राज्यारोहण काल ईसापूर्व १८० वर्ष आता है । इस प्रकार दोनों समयों में २५८ वर्ष का अन्तर हो जाता है । विक्रम संवत् ईसा पूर्व ५७ वर्ष से आरम्भ होता है । यही कारण मालूम होता है जिससे कि इस विक्रमादित्य को शकारि विक्रमादित्य से भिन्न कल्हण मानता है । विक्रमादित्य के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां हैं । विक्रम संवत् चलाने वाले विक्रमादित्य कौन ऐति- हासिक व्यक्ति थे, इसका निर्णय इतिहास के विद्वानों ने एक मत से अभी तक नहीं किया है । अनेकवाद तथा सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है । ७(१) मण्डल : मण्डल शब्द का प्रयोग कल्हण ने राज्य के लिये किया है । शुक्र ने (शुक्र नीति १ : १८२-१८६) सामन्त, माण्डलिक, राजन्, महाराज, स्वराज, सम्राज, विराज, सार्वभौम के आधीन राज्य का वर्गीकरण किया है । मण्डल के अधिपति को माण्डलिक कहते थे । सामन्त को आय १ लाख से ३ लाख, मण्डल की आय ४ से ५०; स्वराज की ५१-१००; सम्राज की १ करोड़ से १०; विराज की ११ से ५० तथा सार्वभौम राज की ५१ करोड़ से ऊपर प्रतिवर्ष रजत कर्ष आय रखा है। हर्प को यहाँ मण्डलेश नहीं मानना चाहिये । कल्हण प्रायः कश्मीर राज्य के लिये मण्डल शब्द का प्रयोग कर देता है । लोक प्रकाश में कश्मीर मण्डल के सम्बन्ध में एक श्लोक आता है जिसमें उसके ग्रामों की संख्या दी गयी है । षष्टियामसहस्राणि षष्टियामशतानि च । षष्टिर्मात्रात्रयो ग्रामा ह्येतत्कश्मीरमण्डलम् ॥ —पृष्ठ ७८ श्लोक ४
द्वितीय तरंग ३८१ असपूर्वाऽपि तेनोर्वी सपूर्वेव महीभुजा। लालिता हृदयज्ञेन पत्या नववधूरिव ॥८॥ ८. इस राजा ने परम्परा प्राप्त सदृश अपरम्परा प्राप्त इस पृथ्वी को भी, हृदयज्ञ पति के नववधू तुल्य लालित¹ किया। भुक्त्वा द्वात्रिंशतं वर्षान्भुवं तस्मिन्दिवं गते। जलौकास्तत्सुतो भूमेर्भूषणं समपद्यत ॥६॥ जलोकास्¹ ९. बत्तीस¹ वर्ष पृथ्वी को भोग कर उसके दिवंगत होने पर उसका पुत्र जलौकास्² भूमि भूषण हुआ।
(२) हर्ष : भारतीय इतिहास में कई हर्षों का उल्लेख मिलता है। उज्जैन के एक राजा विक्रमादित्य को भी हर्ष कहा गया है। उसका उल्लेख कल्हण ने तृतीय तरंग के श्लोक १२५ में किया है। यह कश्मीर राजा मातृगुप्त के समय में हुआ था। कल्हण की काल गणना के अनुसार उसका समय २६८ वर्ष पश्चात् पड़ता है। यदि इस हर्ष को कन्नौज का राजा हर्षवर्धन मान लिया जाय, जिसका उल्लेख हुएन सांग करता है, तो उसका समय प्राप्त लेखों के अनुसार सन् ६०६-६५० ई० आयेगा। इस प्रकार कल्हण की काल गणना में, जिस प्रकार मिहिरकुल की गणना में अन्तर पडता है, उसी प्रकार इस काल में भी पड़ जाता है। कन्नौज के हर्ष का काल प्रतापादित्य का समय नहीं हो सकता। अलबेरुनी लिखता है—कश्मीर की समय सारणी के अनुसार श्रीहर्ष ६६४ वर्ष विक्रमादित्य के पश्चात् हुए थे। उस समय देश में श्रीहर्ष, विक्रमादित्य, शक, वल्लभ, तथा गुप्त पांच प्रकार के संवतो का प्रचलन था। विक्रम संवत् मानने वाले दक्षिण, तथा पश्चिमी भारत भूखण्ड मे निवास करते थे। (अलबेरुनी: साचू : २ : ६-९) ८ (१) लालित : लालन-पालन शब्द प्रायः एक साथ आता है। कल्हण ने यहाँपर नववधू और पृथ्वी की तुलना की है। जिस प्रकार अपनी प्रियतमा नव- वधू के प्रति पति हार्दिक प्रेम करता उसका दुलार करता है उसी प्रकार पृथ्वीपति राजा प्रतापादित्य ने पृथ्वी का प्रेम तथा स्नेह से अपने में अभिन्न समझते हुए लालन किया। मनुष्य किसी से प्रेम न करते हुए भी, उसका पालन करता है। राजा प्रजा से अत्यन्त स्नेह न करते हुए भी, प्रजा पालक हो सकता है। परन्तु प्रजा के साथ स्नेह करना, उसे अभिन्न समझना, उसका दुलार करना सर्वथा भिन्न बात है। लालन में पालन शब्द भी समाविष्ट हो जाता है। परन्तु पालन में लालन का अर्थ समाविष्ट नहीं होता। कल्हण ने यहाँ उपमा बहुत ही सुन्दर दी है। उसकी यह नयी सूझ है। ९ (१) श्री विल्सन ने अभिषेक का समय ईसा पूर्व १३६ वर्ष ९ मास तथा समीकृत काल सन् २२ ई० और राज्यकाल ३२ वर्ष दिया है। श्री स्टीन राज्याभिषेक काल कल्हण के गणनानुसार लौकिक संवत् २६२८ वर्ष तथा राज्यकाल ३२ वर्ष दिया है। श्री एस० पो० पण्डित ने यह समय ईसा पूर्व १३७ वर्ष तथा राज्यकाल ३२ दिया है। श्री वाशी ने सप्तर्षि संवत् ३८१७ तथा सन् ४७ वर्ष यह समय दिया है। आइने अक्बरी में जलोक को 'जुलूक' लिखा गया है। राज्यकाल ३० वर्ष दिया गया है।
३८२ राजतरंगिणी पितुरेव समं कालं वृद्धिहेतोः स दिद्युते । विषुवत्पूर्णशीतांशुरिव शीतेतराचिषः ॥१०॥ १०. सूर्य के समकाल¹ तक शरदकालीन पूर्ण शशि तुल्य वह वृद्धि हेतु, पिता के ही बराबर समय तक प्रकाशित रहा । अथ वाक्पुष्टया सार्धं देव्या दिव्यप्रभावया । भुवं तत्प्रभवो भुञ्जंस्तुञ्जीनोऽरञ्जयत्प्रजाः ॥११॥ तुंजीनः ११. तदुपरान्त इसका पुत्र तुंजीन दिव्य प्रभाव युक्त देवी वाक्पुष्टा के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ प्रजारंजन किया । हसन लिखता है—बाद अजई ( प्रतापादित्य ) राजा जलोक शानो ने वादशाहत की पोशाक जैवतन करके ३२ साल हकूमत में गुजारे । ( १ ) जलौक, जलौकस्, जलौकास् : प्रसिद्ध अनुवादकारो ने नाम को भिन्न प्रकार से लिया है । श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अपने अनुवाद में जलौक तथा जलोकाः दिया है । श्री स्टीन ने भूमिका के पृष्ठ १२५ पर 'जलौकस्' दिया है । अनुवाद में पृष्ठ ५७ पर पुनः 'जलौकस्' दिया है । श्री पण्डित ने अनुवाद के पृष्ठ प्रान्त ४२ पर 'जलो- कस्' तथा अनुवाद में 'जलौक' और पुनः पृष्ठ ५८१ पर 'जलौकस्' दिया है। कल्हण ने मूल श्लोक में 'जलोकास्तत्सुतो' दिया है । क्रिया के अनुसार 'जलौकम्' शुद्ध प्रतीत होता है । इसके पूर्व (तरं० १ : १०८) कल्हण ने 'भूभूज्जलोको' का प्रयोग कर अशोक के पुत्र 'जलौक' का वर्णन किया है । प्रतीत होता है कि अशोकपुत्र 'जलोक' तथा प्रतापा- दित्य-पुत्र में भेद जाहिर करने के लिए 'जलौकम्' किंवा 'जलौकास्' नाम दिया है । १० (१) समकाल-ज्योतिष ज्ञान : कल्हण को ज्योतिष का ज्ञान था इस श्लोक से प्रगट होता है । दिन एवं रात्रि वर्ष में २३ सितम्बर तथा २२ मार्च को बराबर होते हैं । इस समय सूर्य निरक्ष पर जाता है । भारतीय माग की गणना से कात्तिक एवं चैत्र विषुव २२ या २३ सितम्बर तथा महा विषुव या हरिद्विष २० मार्च को होता है । चन्द्रमा की वृद्धि तथा ह्रास का कारण विज्ञान के अनुसार सूर्य है । यहाँ पर भी वृद्धि हेतु सूर्य को कहा है । पिता भी पुत्र के लिये वृद्धि का हेतु है । यहाँ पर पिता को सूर्य तथा पुत्र को चन्द्रमा की उपमा दी गयी है । चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य का ही प्रति- बिम्ब है और पिता का प्रकाश या प्रतिबिम्ब पुत्र । कल्हण ने यहाँ काव्य एवं ज्योतिष का संक्षेप में समन्वय किया है । ११(१) श्री विल्सन ने अभिषेक का काल ईसा पूर्व १०४ वर्ष ९ मास तथा समीकृत का सन् ५४ ईस्वी तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया है । श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् २९६० वर्ष तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया है श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय ईसा पूर्व १०५ वर्ष तथा राज्य काल ३६ वर्ष रखा है । श्री वाली ने सप्तर्षि सं० ३८५३ तथा सन् ८३ ई. यह काल दिया है । आइने अकबरी में तुंजन राजा को 'थुनजिर' नाम से सम्बोधित तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया गया है । हसन लिखता है—राजा तुंजीन २९५० क० में बाप की जगह सल्तनतनशीन हुआ । उसकी रानी वाक्पुष्ता नाम एक निहायत ही अकलमन्द और दाना औरत थी, उसी की रहनुमाई में फौज और रैयत के खुश करने में मसरूफ रहता । उनके साथ
द्वितीय तरंग ३८३ दम्पतिभ्यामिदं ताभ्यामभृप्यत वसुन्धरा । गङ्गामृगाङ्कखण्डाभ्यां जटाभूरिव धूर्जटेः ॥१२॥ १२. यह वसुन्धरा उस दम्पति द्वारा, गंगा एवं मृगाङ्क खण्ड से शिव-जटा तुल्य शोभित हुई । मण्डलं साध्वधत्तां तौ नानावर्णमनोरमम् । शतह्रदापयोवाहौ माहेन्द्रमिव कार्मुकम् ॥१३॥ १३. उन दोनों ने नाना वर्णों से मनोरम मण्डल को समुचित रूप से उसी प्रकार धारण किया जैसे विद्युत् एवं मेघ नाना वर्ण से मनोरम इन्द्रधनुष को धारण करता है । अदल और इन्साफ से पेश आता । तुंगेश्वर और 'वाक्पुस्ता ने रामू और केमूह के देहात आबाद बैजवरह के पास हरदास का मन्दिर तामीर कराया करके बरहमनों को जागीर के तौर पर बख्श दिये । और एक निहायत ही आलीशान इमारतों वाला यह औरत अपने पेट से कोई औलाद नहीं रखती थी शहर कंग बनवाया । शहर के इर्द गिर्द समाधी का राजा के अन्त काल के वक्त उसकी लाश पर सती मन्दिर बनवाया । इसके शिखर पर एक लाख अशर- हो गयी । राजा तुंजीन की मुद्दत हकूमत ३६ बरस फियों का सोना बतौर मुलम्मा के चढ़वाया । थी।' (पृष्ठ ५३) (पृष्ठ ५३) 'कहते हैं कि मराज की हदूद में बहुत पाठभेद : से पौधे लगवाए जिसमें कि राजा की हुस्न नीयत श्लोक संख्या १३ में 'धत्तां' का 'दत्ता', 'दृप्ता' की बदौलत लगाते ही फल निकल आये । माह तथा 'नाना वर्ण' का 'नानार्णव' पाठभेद मिलता है । भादों में इस कदर बर्फबारी हुई कि फसलें सारी पादटिप्पणियाँ : की सारी तबाह व बरबाद हो गयीं । सख्त क़हत पड़ा । राजा ने अपने खजाने के मुँह खोल दिये । १३ (१) वर्ण : यहाँ 'वर्ण' शब्द श्लिष्ट है । और उनमें जिस कदर भी हीरे जवाहिरात और बह्वण वर्ण का अर्थ अनेक जातियों से पूर्ण कश्मीर सोना चाँदी थे गरीबों और मसकीनों की नज़र कर मण्डल तथा अनेक रंगों अर्थात् वर्णों से युक्त इन्द्र- दी लेकिन इस के बावजूद भी कहत दूर न हुआ । धनुष किया है । 'नेकखसलत राजा यह देखकर सख्त लाचार (२) शतह्रद-इस शब्द को विल्सन ने नदी हुआ और अपने आप को कत्ल करने पर आमादह समझा है तथा पादटिप्पणी में 'शतह्रद' को शतलज हो गया । उसको रानी इस मक़सद से आगाह हो नदी माना है । यह अर्थ गलत है । (पृष्ठ २९) गयी और उसने उसे ऐसा करने से रोका । रात के वक्त दोनों मियाँ बीबी बारगाह रब थाला हज़रत (३) पयोवहा-इसको भी विल्सन ने नदी में आजिजी और इन्कसारी में मसरूफ हुए । उनकी माना है । पादटिप्पणी में पयोवहा को व्यास नदी दुआ की कबूलियत के निशान में दो कबूतर हर सुबह समझाने का प्रयास किया है । यह अर्थ भी गलत आसमान से हरेक आदमी के घर पहुँचते । यहाँ तक है । (पृष्ठ २९) यह अर्थ स्वरसाम्यता के कारण कि क़हत की मुसीबत रफ़ा दफ़ा हो गयी । लगाने का प्रयास किया गया है ।
३८४ राजतरंगिणी चक्राते च महाभागौ विभ्रमाभरणं भुवः । तुङ्गे श्वरं हरावासं कतिकाख्यं च पत्तनम् ॥१४॥ १४. उन दोनों महाभागों ने भूमि विलास आभरण हर का आवास तुङ्गेश्वर १ तथा कतिका २ नामक पत्तन ३ का निर्माण कराया। १४ (१) तुङ्गेश्वर : यह मन्दिर कश्मीर में कहाँ पर है अभी तक पता नही चल सका है। तुङ्गेश्वर मन्दिर का उल्लेख नीलमत पुराण मे मिलता है। उसका वर्णन विष्णु, वाराह, तथा वाराह मूला के सन्दर्भ में किया गया है। देवं नारायणस्थाने पश्चिमे तु वरप्रदम् । गजेन्द्रमोक्षणं देवं वराहस्य समीपगम् ॥ 1158 : १३६९.७० वराहं नरसिंहं च बहुरूपं वरप्रदम् । सप्तर्षीणां तथैवार्थं सुमुङ्गस्य समीपगा ॥ 1159 : १३७०-१३७१ ॥ तुङ्गवासं च परदं च वरदं च स्वयंभुवम् । गुहावासं च योगीशं अनन्तं कपिलं मुनिम् ॥ 1160 : १३७१.७२ कल्हण ने तुंगेश का पुनः वर्णन तरंग ६ मे ‘तुङ्गेश्वरपणोपान्तादुज्जगाम’ किया है। (रा० ६: १९० ) तुङ्गशेष का भी उल्लेख नीलमत पुराण में आया है। यथा— बिन्दुनादेश्वरं तीर्थं सोमतीर्थं पृथूदकम् । तुङ्गेशतीर्थक्षेत्रं तु उतंकस्वामिनं तथा ॥ 1351 : १५६६ ‘तुङ्ग’ शब्द का अर्थ उन्नत, पर्वत, प्रलम्ब, मुख्य आदि होता है। तुंगेश शब्द चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कृष्ण के लिये भी प्रयुक्त होता है। तुंगनाथ हिमालय पर स्थित एक शिवलिंग है। उसके कारण वह स्थान तीर्थस्थान माना गया है। इसे भृगुतुंग भी कहते हैं। श्राद्ध तथा पितृ कार्य के लिये पवित्र माना गया है। राजा ययाति ने यहाँ पर तप किया था। तुंगशेखर एक पर्वत है। वनपर्व महाभारत में इसे महागिरि कहा गया है। भृगु महर्षि ने यहाँ तपस्या की थी। तुंगकारण्य का उल्लेख वनपर्व (८५ : ४६) तथा तुंग वेणु एक भारतीय नदी का भीष्म पर्व (७ : २९) में उल्लेख मिलता है। वाराह पुराण तुंगकूट तीर्थ का वर्णन करता है। कोकामुख तीर्थ के सन्दर्भ में इसका उल्लेख किया गया है। वनपर्व (८४ : १५८) में वर्णन मिलना है। तुंग- तीर्थ में स्नान करने पर पूर्व जन्म की स्मृति जागृत होती है। विष्णु के तीन प्रसिद्ध तीर्थ स्थान कहे गये हैं—कोकामुख बद्री नारायण तथा लोहागंल । कोकामुख क्षेत्र को वाराह क्षेत्र कहते हैं, यह नेपाल, में सुवर्ण कोसिशी अर्थात् सुनकोसी नदी के वाम तट पर, ‘वराह छत्र’ नगर अर्थात् वाराह क्षेत्र है। काठमांडू से १२४ मील दक्षिण है। यह धौलागिरि है। (२) कतिका-कतिक—यह वर्तमान ग्राम कई है। उत्तर परगना मे है। वितस्ता के दक्षिण तट पर है। नदी से बहुत दूर नहीं है। चचपोर ग्राम के समीप है। (३) पत्तन—लोक प्रकाश पत्तन की परिभाषा देता है : ग्रामायुतसहस्राणां पत्तनं शस्यते बुधैः । तत्रापि सारं नगरं तत्यौराः पुरवासिनः ॥ पृ० ५९ श्लोक सं० ४ [दस सहस्र ग्राम वाले स्थान को पत्तन कहते हैं उसमें भी मूल (सार) को नगर कहते हैं। वहाँ के रहने वाले को पौर (पुरवासी) कहते हैं।]