भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 513

३८० राजतरंगिणी शकारिर्विक्रमादित्य इति स भ्रममाश्रितैः । अन्यैरन्यथाऽलेखि विसंवादकदर्थितम् ॥६॥ ६. 'वह शकारि विक्रमादित्य' था'—इस प्रकार विसंवाद कदर्थित को भ्रान्त अन्य लोगों ने अन्यथा लिखा है । इदं स्वभेदविधुरं हर्पादीनां धराभुजाम् । चिरकालमभूद्भोज्यं ततः प्रभृति मण्डलम् ॥७॥ ७. उस समय से पारस्परिक कलह ग्रस्त यह मण्डल१ हर्पादि२ राजाओं का चिर काल तक उपभोग्य बना रहा । श्री विवैउद्दीन तथा श्री नारायण कौल का मत है कि प्रतापादित्य मालवा के राजा विक्रमादित्य से सम्बन्धित था । अभी तक कोई ऐसा आधिकारिक प्रमाण प्राप्त नहीं हो सका है कि निष्कर्ष निकाला जाय कि वास्तव में प्रतापादित्य विक्रमादित्य का सम्बन्धी था । इस पर अभी अनुसन्धान की आवश्य- कता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ६ में 'रति सभ्रम' का 'स इति भ्रम', 'डति संभ्रम' तथा 'विसंवादक' का पाठभेद 'विसंवादिक' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ६ (१) विक्रमादित्य : द्वितीय तरंग में वर्णित ६ राजाओं का सम्बन्ध गोनन्द वंश से प्रतीत नहीं होता । शक संवत् का प्रारम्भ सन् ७८ ई० से होता है । किन्तु श्री स्टीन के नोट के अनुसार प्रतापादित्य का राज्यारोहण काल ईसापूर्व १८० वर्ष आता है । इस प्रकार दोनों समयों में २५८ वर्ष का अन्तर हो जाता है । विक्रम संवत् ईसा पूर्व ५७ वर्ष से आरम्भ होता है । यही कारण मालूम होता है जिससे कि इस विक्रमादित्य को शकारि विक्रमादित्य से भिन्न कल्हण मानता है । विक्रमादित्य के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां हैं । विक्रम संवत् चलाने वाले विक्रमादित्य कौन ऐति- हासिक व्यक्ति थे, इसका निर्णय इतिहास के विद्वानों ने एक मत से अभी तक नहीं किया है । अनेकवाद तथा सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है । ७(१) मण्डल : मण्डल शब्द का प्रयोग कल्हण ने राज्य के लिये किया है । शुक्र ने (शुक्र नीति १ : १८२-१८६) सामन्त, माण्डलिक, राजन्, महाराज, स्वराज, सम्राज, विराज, सार्वभौम के आधीन राज्य का वर्गीकरण किया है । मण्डल के अधिपति को माण्डलिक कहते थे । सामन्त को आय १ लाख से ३ लाख, मण्डल की आय ४ से ५०; स्वराज की ५१-१००; सम्राज की १ करोड़ से १०; विराज की ११ से ५० तथा सार्वभौम राज की ५१ करोड़ से ऊपर प्रतिवर्ष रजत कर्ष आय रखा है। हर्प को यहाँ मण्डलेश नहीं मानना चाहिये । कल्हण प्रायः कश्मीर राज्य के लिये मण्डल शब्द का प्रयोग कर देता है । लोक प्रकाश में कश्मीर मण्डल के सम्बन्ध में एक श्लोक आता है जिसमें उसके ग्रामों की संख्या दी गयी है । षष्टियामसहस्राणि षष्टियामशतानि च । षष्टिर्मात्रात्रयो ग्रामा ह्येतत्कश्मीरमण्डलम् ॥ —पृष्ठ ७८ श्लोक ४