भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 514

द्वितीय तरंग ३८१ असपूर्वाऽपि तेनोर्वी सपूर्वेव महीभुजा। लालिता हृदयज्ञेन पत्या नववधूरिव ॥८॥ ८. इस राजा ने परम्परा प्राप्त सदृश अपरम्परा प्राप्त इस पृथ्वी को भी, हृदयज्ञ पति के नववधू तुल्य लालित¹ किया। भुक्त्वा द्वात्रिंशतं वर्षान्भुवं तस्मिन्दिवं गते। जलौकास्तत्सुतो भूमेर्भूषणं समपद्यत ॥६॥ जलोकास्¹ ९. बत्तीस¹ वर्ष पृथ्वी को भोग कर उसके दिवंगत होने पर उसका पुत्र जलौकास्² भूमि भूषण हुआ।

(२) हर्ष : भारतीय इतिहास में कई हर्षों का उल्लेख मिलता है। उज्जैन के एक राजा विक्रमादित्य को भी हर्ष कहा गया है। उसका उल्लेख कल्हण ने तृतीय तरंग के श्लोक १२५ में किया है। यह कश्मीर राजा मातृगुप्त के समय में हुआ था। कल्हण की काल गणना के अनुसार उसका समय २६८ वर्ष पश्चात् पड़ता है। यदि इस हर्ष को कन्नौज का राजा हर्षवर्धन मान लिया जाय, जिसका उल्लेख हुएन सांग करता है, तो उसका समय प्राप्त लेखों के अनुसार सन् ६०६-६५० ई० आयेगा। इस प्रकार कल्हण की काल गणना में, जिस प्रकार मिहिरकुल की गणना में अन्तर पडता है, उसी प्रकार इस काल में भी पड़ जाता है। कन्नौज के हर्ष का काल प्रतापादित्य का समय नहीं हो सकता। अलबेरुनी लिखता है—कश्मीर की समय सारणी के अनुसार श्रीहर्ष ६६४ वर्ष विक्रमादित्य के पश्चात् हुए थे। उस समय देश में श्रीहर्ष, विक्रमादित्य, शक, वल्लभ, तथा गुप्त पांच प्रकार के संवतो का प्रचलन था। विक्रम संवत् मानने वाले दक्षिण, तथा पश्चिमी भारत भूखण्ड मे निवास करते थे। (अलबेरुनी: साचू : २ : ६-९) ८ (१) लालित : लालन-पालन शब्द प्रायः एक साथ आता है। कल्हण ने यहाँपर नववधू और पृथ्वी की तुलना की है। जिस प्रकार अपनी प्रियतमा नव- वधू के प्रति पति हार्दिक प्रेम करता उसका दुलार करता है उसी प्रकार पृथ्वीपति राजा प्रतापादित्य ने पृथ्वी का प्रेम तथा स्नेह से अपने में अभिन्न समझते हुए लालन किया। मनुष्य किसी से प्रेम न करते हुए भी, उसका पालन करता है। राजा प्रजा से अत्यन्त स्नेह न करते हुए भी, प्रजा पालक हो सकता है। परन्तु प्रजा के साथ स्नेह करना, उसे अभिन्न समझना, उसका दुलार करना सर्वथा भिन्न बात है। लालन में पालन शब्द भी समाविष्ट हो जाता है। परन्तु पालन में लालन का अर्थ समाविष्ट नहीं होता। कल्हण ने यहाँ उपमा बहुत ही सुन्दर दी है। उसकी यह नयी सूझ है। ९ (१) श्री विल्सन ने अभिषेक का समय ईसा पूर्व १३६ वर्ष ९ मास तथा समीकृत काल सन् २२ ई० और राज्यकाल ३२ वर्ष दिया है। श्री स्टीन राज्याभिषेक काल कल्हण के गणनानुसार लौकिक संवत् २६२८ वर्ष तथा राज्यकाल ३२ वर्ष दिया है। श्री एस० पो० पण्डित ने यह समय ईसा पूर्व १३७ वर्ष तथा राज्यकाल ३२ दिया है। श्री वाशी ने सप्तर्षि संवत् ३८१७ तथा सन् ४७ वर्ष यह समय दिया है। आइने अक्बरी में जलोक को 'जुलूक' लिखा गया है। राज्यकाल ३० वर्ष दिया गया है।