राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ३७७ अथ प्रतापादित्याख्यस्तैरानीय दिगन्तरात् । विक्रमादित्यभूर्भर्तुर्जातिरत्राभ्यषिच्यत ॥५॥ ५. उन मन्त्रियों १ ने राजा विक्रमादित्य के वंशज प्रतापादित्य २ को दिगन्तर से लाकर यहाँ अभिषिक्त किया । पादटिप्पणियाँ : उनका परस्पर क्या सम्बन्ध था, इसका अध्ययन ५ (१) मन्त्री एवं मन्त्रि परिषद् : मन्त्रियों राजनीति विज्ञान की दृष्टि से उचित होगा । ने राजा को बाहर से बुलाकर राज्य सिंहासन पर महाभारत ( ३८ : ३० : ३८ : १६, २१ ) ने अभिषिक्त किया था यह कश्मीर के मन्त्रियों किंवा मन्त्री, मन्त्रि परिषद् किंवा मन्त्रिमण्डल को राज्य मन्त्रिपरिषद् की शक्ति तथा अधिकार का एक की प्रकृति या महत्त्व पूर्ण अंग माना है । ज्वलन्त उदाहरण है । राजा मन्त्रिमण्डल पर उतना ही निर्भर था • राजा के निरंकुश होने पर मन्त्रियों का अधि- जितना पर्जन्य पर प्राणिमात्र निर्भर रहता है । कार था । ये उसे हटा सकते थे । अन्ध युधिष्ठिर के जितना स्त्रियाँ पति पर निर्भर रहती हैं। अर्थशास्त्र सम्बन्ध में मन्त्रियों ने यही किया था । राजा को राजा एवं मन्त्री की तुलना रथ के दो चक्रों से जो बैठा सकता है, वह राज सिंहासन से उतार भी करता है । सकता है; मन्त्रि परिषद् का यह अधिकार धर्म सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं न वर्तते । सम्मत माना गया है । कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च शृणुयान्मतम् । भारतीय राजशास्त्र मन्त्रि- मन्त्रि- —अर्थ० . १ १ : १ : ३ परिषद् को यह अधिकार देता है, या नहीं कि, वह मनु ने मन्त्रियों को राज्य कार्य के लिये नितान्त राजा को बन्दी बना ले, अथवा किसी दूसरे व्यक्ति आवश्यक माना है । को उसके स्थान पर राजा चुन ले; इस प्रश्न पर कुछ अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् । प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है । विशेषतोऽसहायेन किन्तु राज्यं महोदयम् ॥ • कश्मीर में मन्त्रियों ने प्रायः राजाओं को —मनु० : ८ : ५३ सिंहासन च्युत किया है । अन्य व्यक्ति को राज- शुक्राचार्य मन्त्रियों की अनिवार्यता और स्पष्ट सिंहासन पर बैठाया है । जनता ने भी राजा रूप से कहते हैं । उनके बिना राज्यपतन अवश्यं- चुना है । भावी हो जाता है । • कश्मीर में मन्त्रि परिषद् बड़ी शक्तिशाली विना प्रकृतिभ्यन्मंत्राद्राज्यताशो भवेन्मम । थी । राजा को निरंकुश नहीं होने देती थी । इस निरोधनं भवेद्देवं राज्ञस्ते स्युः सुमन्त्रिणः ॥ विषय पर भारतीय राजनीतिशास्त्र के विभिन्न —शु० नी० २ : ८२ युगकालीन विद्वानों तथा कल्हण का क्या मत है । स्मृतियों तथा पुराणों ने मन्त्रियों के अधिकार जानना उचित होगा । गुण, कर्तव्यों की विशद व्याख्या की है। वेद भी कल्हण ने मन्त्रियों द्वारा राजाओं को पद च्युत मन्त्री की अनिवार्यता स्पष्ट करता है । तथा प्रतिष्ठापित करने का बहुत उदाहरण उपस्थित ऋग् तथा अथर्ववेद में मन्त्री शब्द का उल्लेख किया है । राजा तथा मन्त्रियों के अधिकार सीमा तथा नही मिलना । यजुर्वेद संहिताओं एवं ब्राह्मण ग्रन्थों ४८