राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ राजतरंगिणी
पाश्रित उस राजा को उसके मन्त्रियों ने वन्दी बना लिया। ऐसा कुछ लोग कहते हैं।' (२) मन्त्री : मन्त्री तथा मन्त्रि परिषद् पर टिप्पणी पांचवें श्लोक की मन्त्रि तथा मन्त्री परिषद द्रष्टव्य है । ४ (३) दुर्गागलिका : यह श्रीनगर में द्रगजन स्थान है । शंकराचार्य पर्वत के पश्चिम मूल से डल झोल के फाटक के मध्य का स्थान दुर्गागलिका नाम से प्रसिद्ध था। द्रगजन मूल शब्द दुर्गागलिका का अप- भ्रंश है। श्रीनगर के कुछ लोगों को यह अभी तक याद है। कभी यहाँ कोई राजा बन्दी रखा गया था। इस लेक के दक्षिणी पूर्वी एक भाग को गगरी बल कहते हैं। शंकराचार्य पर्वत जिसका एक बाहू उत्तर की ओर निकलता है। डल लेक के समीप पहुँच जाता है। इसके तथा डल के मध्य का स्थान गगरी बल कहा जाता है । उसके उत्तर पूर्व के डल के अंचल को गगरी बल कहते हैं। गगरी बल स्थान भी गगरी बल जल संघटन से दक्षिण पश्चिम की ओर जल की चौड़ी नहर तुल्य जल प्रणाली चली गयी है। वितस्ता से एक नहर निकलकर उत्तर नवपुरा को ओर गयी है। और सेतु से पुनः पश्चिम दक्षिण की ओर मुड़ जाती है । गरु अर्थात् महा सरित पर जो पुल यहाँ बना था उसका नाम नवपुरासेतु कहा गया है। यहाँ से सेतु का बन्धा प्रारम्भ होता है। इस बन्धा के उत्तर दिशा में एक नहर डल लेक से आती है। उसे बारी नम्बल कहते हैं। इसके पूर्वीय छोर पर जहाँ यह श्री शंकराचार्य पर्वत के पादरोधी मूल भाग को स्पर्श करती है यहाँ पर कम से कम एक शताब्दी पूर्व एक द्वार था। जहाँ से प्रचुर कुल का जल लेक से बाहर बहता था। वह जल द्वार उस समय बन्द कर दिया जाता था, जब वितस्ता का जलस्तर, डल के जल स्तर से ऊँचा हो जाता था। यह निर्माण शताब्दियों पुराना है। जिस समय इसका निर्माण हुआ था वह सेतु अथवा बन्ध बनाया गया था। इसी के पास दुर्गागलिका की आबादी थी। यही पर अन्ध युधिष्ठिर बन्दी रखा गया था। ग्रोवर ने इस सेतु का उल्लेख जैनराज तरंगिणी चतुर्थ तरंग में किया है। इससे स्पष्ट होता है कि यह सेतु अत्यन्त प्राचीन निर्माण था। क्योकि ग्रोवर का काल ही ( सन् १४५०-१४८६ ई०) होता है। छिन्नेषु सेतुबन्धेषु तत्तन्नीपुरकादिषु । पूर्दुगँरचनेवाभूद् दुर्गमा तद्विरोधिनाम् ॥ ४:१२१॥ X X X अथ काश्मीरिणः प्रोचुः मैदांसीनीरान्तिकस्थितान् । नौसेतुबन्धरुङ्गाद्यैर्दष्ट्रिउन्नौ भयेन नः ॥४:२४२॥ इस समय यहाँ घनी आबादी हो गयी है। स्थान का पहचानना कठिन हो गया है। भ्रमण काल में मुझे कुछ पण्डितों ने दुर्गागलिका का स्थान श्री शंकराचार्य पर्वत से श्रीनगर-बनिहाल सड़क पर बनिहाल की ओर जाते समय वाम ओर एक दुर्गा का मन्दिर दिखाया गया। यहाँ कुण्ड भी हैं। उनकी संख्या दो है। एक ऊपर है। दूसरा नीचे है। स्थान सुरम्य है। ब्राह्मणो के कुल यहाँ रहते हैं। धर्मशालायें बनी हैं। यहाँ देवी का मन्दिर है। ऊपर शिव लिंग है। मैं यहाँ बहुत समय तक प्राचीन ध्वग्नावशेष- खोजता रहा। कुछ लिखने योग्य यहाँ पर वस्तुएं नहीं मिली। यहाँ भी एक नाग है। प्रतीत होता है कि कल्हण स्वयं निश्चित नहीं कर सका था कि राजा सचमुच बन्दी बनाया गया था या नहीं। अतएव उसने इस घटना का आधार कतिपय लोगों के कथन को माना है। उसे इस घटना की सत्यता का प्रमाण तत्कालीन किसी ग्रन्थ अथवा इतिहासके लेखकों की रचना मे नहीं मिल सका था।