भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 506

प्रथम तरंग ३७५ धावन्राज्येच्छया दुर्गाङ्गलिकायां स्वमन्त्रिभिः । कालेन स्थापितो यद्वद्वेत्यभ्यधायि तु कैरपि ॥४॥ ४. राज्येच्छा से दौड़ते१हुए राजा को उसके मन्त्रियों२ ने दुर्गाङ्गलिका३ में बन्दी बना दिया। ऐसा कुछ लोगों ने कहा है।

से छोटा माना जाने लगा था। उसका अर्थ समय की गति से बदलता गया। मूल में विषय शब्द के समानार्थक शब्द देश, विषय एवं उपवर्तन थे। सुदूर प्राचीन काल से ही कश्मीर उपत्यका छोटे प्रशासकीय विभागों में विभाजित थी। उन्हें प्रचलित भाषा में परगना कहते हैं। उनका प्राचीन नाम विषय था। लोक प्रकाश में उल्लेख आता है कि २७ विषयों में कश्मीर राज्य विभक्त था— —'एषां सप्तविंशतिविषयाणां अन्तरालोप- वेषणकः'—पृष्ठ ७७ 'खोयाश्रमि, एकेन, क्रोधन, द्राविशति, चालन, समाला, देवसुची (र), भृंग, वितस्ता, सत्रव, खरवारि, नील, हारी, जलहट्टीय, खड्‌वीय, फग्णा, लहर, षोलडोय, नीलाश्व ।' उक्त १६ विषयों का नाम लोकप्रकाश में मिलता है। उनका आधुनिक नाम निम्नलिखित रूप से हो गया है। खोयाश्रमी = खुयाशम, खायाध (हा) मी, शमाला = समाला, औलिदिय = होल्डा, लूहरो = लहर; नीलाश = नीलाश्व; खड्‌वीय = खदुवी; एकेन = एकेनक, देवसुवी = देवसरस; क्रोधन = क्रुहिन परगना, देवाविसती = द्रुन्त परगना भृंग = ब्रिँग परगना, फग्णा = फक; तथा चालन, वि स्ता, सतरव, स्वनवारी नील, हारी, जलहट्टिय, क्या थे और है निश्चित पता नहीं चलता । लोक प्रकाश से यह पता नहीं लगता कि ये विभाग कब बनाये गये तथा उनका वास्तविक रूप क्या था। वे किस समय तक अपने पूर्व एवं परिव- र्तित रूप में स्थित थे।

अबुल फजल के समय में ३८ परगना थे। उसके पूर्व काजी अली के अनुसार ४१ परगना थे । सिखों के राज्य काल में कश्मीर में करीब ३६ परगना थे। मूर क्राफ्ट (स० १८२८ ई०) बैरन हुगेल (स० १८३५ ई०) तथा वाइन (स० १८४० ई०) ने परगनों की संख्या ३६ दी है। परन्तु उनके दिये नाम नहीं मिलते। परगनों की सीमा तथा नाम डोगरा राज काल तक बदलता रहा है। मेजर बेट्स (स० १८६५ ई०) ने परगनों की संख्या ४३ दी है। कालान्तर में भारत के समान परगनों के स्थान पर तहसीलों में कश्मीर बांटा गया। डोगरा राज्य काल में ११ तहसीलें थी । आज कल जम्मू कश्मीर राज्य का राजनीतिक विभाजन पूर्णतया बदल गया है। दूसरे विषय का अर्थ काम वासना यहाँ लगना चाहिए। विषय, रूप, शब्द, गन्ध, रस एवं स्पर्श हैं। इन्ही को विषय गोचर इन्द्रियां भी कहा जाता हैं। विषय शब्द आश्रय के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। इन्द्रियों का नाम विषयिन् कहा गया है। विषय इन्द्रियों के द्वाराहोते हैं। इन्द्रियों के वशीभूत जो हो जाता है, वही विषयो है। कल्हण के कहने का यहाँ तात्पर्य यही है कि राजा विषय युवत अर्थात् विषयो हो गया था। वह इन्द्रियजयी नहीं इन्द्रियो के वशीभूत था । पाठभेद : श्लोकसंख्या ४ मे 'बद्ध्वे' का 'बद्धे' तथा 'बद्धै' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४ (१) धावन : इस श्लोक का एक अर्थ यह भी हो सकता है—'राज्येच्छा से दुर्गांगलिका में