राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ राजतरंगिणी चक्राते च महाभागौ विभ्रमाभरणं भुवः । तुङ्गे श्वरं हरावासं कतिकाख्यं च पत्तनम् ॥१४॥ १४. उन दोनों महाभागों ने भूमि विलास आभरण हर का आवास तुङ्गेश्वर १ तथा कतिका २ नामक पत्तन ३ का निर्माण कराया। १४ (१) तुङ्गेश्वर : यह मन्दिर कश्मीर में कहाँ पर है अभी तक पता नही चल सका है। तुङ्गेश्वर मन्दिर का उल्लेख नीलमत पुराण मे मिलता है। उसका वर्णन विष्णु, वाराह, तथा वाराह मूला के सन्दर्भ में किया गया है। देवं नारायणस्थाने पश्चिमे तु वरप्रदम् । गजेन्द्रमोक्षणं देवं वराहस्य समीपगम् ॥ 1158 : १३६९.७० वराहं नरसिंहं च बहुरूपं वरप्रदम् । सप्तर्षीणां तथैवार्थं सुमुङ्गस्य समीपगा ॥ 1159 : १३७०-१३७१ ॥ तुङ्गवासं च परदं च वरदं च स्वयंभुवम् । गुहावासं च योगीशं अनन्तं कपिलं मुनिम् ॥ 1160 : १३७१.७२ कल्हण ने तुंगेश का पुनः वर्णन तरंग ६ मे ‘तुङ्गेश्वरपणोपान्तादुज्जगाम’ किया है। (रा० ६: १९० ) तुङ्गशेष का भी उल्लेख नीलमत पुराण में आया है। यथा— बिन्दुनादेश्वरं तीर्थं सोमतीर्थं पृथूदकम् । तुङ्गेशतीर्थक्षेत्रं तु उतंकस्वामिनं तथा ॥ 1351 : १५६६ ‘तुङ्ग’ शब्द का अर्थ उन्नत, पर्वत, प्रलम्ब, मुख्य आदि होता है। तुंगेश शब्द चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कृष्ण के लिये भी प्रयुक्त होता है। तुंगनाथ हिमालय पर स्थित एक शिवलिंग है। उसके कारण वह स्थान तीर्थस्थान माना गया है। इसे भृगुतुंग भी कहते हैं। श्राद्ध तथा पितृ कार्य के लिये पवित्र माना गया है। राजा ययाति ने यहाँ पर तप किया था। तुंगशेखर एक पर्वत है। वनपर्व महाभारत में इसे महागिरि कहा गया है। भृगु महर्षि ने यहाँ तपस्या की थी। तुंगकारण्य का उल्लेख वनपर्व (८५ : ४६) तथा तुंग वेणु एक भारतीय नदी का भीष्म पर्व (७ : २९) में उल्लेख मिलता है। वाराह पुराण तुंगकूट तीर्थ का वर्णन करता है। कोकामुख तीर्थ के सन्दर्भ में इसका उल्लेख किया गया है। वनपर्व (८४ : १५८) में वर्णन मिलना है। तुंग- तीर्थ में स्नान करने पर पूर्व जन्म की स्मृति जागृत होती है। विष्णु के तीन प्रसिद्ध तीर्थ स्थान कहे गये हैं—कोकामुख बद्री नारायण तथा लोहागंल । कोकामुख क्षेत्र को वाराह क्षेत्र कहते हैं, यह नेपाल, में सुवर्ण कोसिशी अर्थात् सुनकोसी नदी के वाम तट पर, ‘वराह छत्र’ नगर अर्थात् वाराह क्षेत्र है। काठमांडू से १२४ मील दक्षिण है। यह धौलागिरि है। (२) कतिका-कतिक—यह वर्तमान ग्राम कई है। उत्तर परगना मे है। वितस्ता के दक्षिण तट पर है। नदी से बहुत दूर नहीं है। चचपोर ग्राम के समीप है। (३) पत्तन—लोक प्रकाश पत्तन की परिभाषा देता है : ग्रामायुतसहस्राणां पत्तनं शस्यते बुधैः । तत्रापि सारं नगरं तत्यौराः पुरवासिनः ॥ पृ० ५९ श्लोक सं० ४ [दस सहस्र ग्राम वाले स्थान को पत्तन कहते हैं उसमें भी मूल (सार) को नगर कहते हैं। वहाँ के रहने वाले को पौर (पुरवासी) कहते हैं।]