राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ३८३ दम्पतिभ्यामिदं ताभ्यामभृप्यत वसुन्धरा । गङ्गामृगाङ्कखण्डाभ्यां जटाभूरिव धूर्जटेः ॥१२॥ १२. यह वसुन्धरा उस दम्पति द्वारा, गंगा एवं मृगाङ्क खण्ड से शिव-जटा तुल्य शोभित हुई । मण्डलं साध्वधत्तां तौ नानावर्णमनोरमम् । शतह्रदापयोवाहौ माहेन्द्रमिव कार्मुकम् ॥१३॥ १३. उन दोनों ने नाना वर्णों से मनोरम मण्डल को समुचित रूप से उसी प्रकार धारण किया जैसे विद्युत् एवं मेघ नाना वर्ण से मनोरम इन्द्रधनुष को धारण करता है । अदल और इन्साफ से पेश आता । तुंगेश्वर और 'वाक्पुस्ता ने रामू और केमूह के देहात आबाद बैजवरह के पास हरदास का मन्दिर तामीर कराया करके बरहमनों को जागीर के तौर पर बख्श दिये । और एक निहायत ही आलीशान इमारतों वाला यह औरत अपने पेट से कोई औलाद नहीं रखती थी शहर कंग बनवाया । शहर के इर्द गिर्द समाधी का राजा के अन्त काल के वक्त उसकी लाश पर सती मन्दिर बनवाया । इसके शिखर पर एक लाख अशर- हो गयी । राजा तुंजीन की मुद्दत हकूमत ३६ बरस फियों का सोना बतौर मुलम्मा के चढ़वाया । थी।' (पृष्ठ ५३) (पृष्ठ ५३) 'कहते हैं कि मराज की हदूद में बहुत पाठभेद : से पौधे लगवाए जिसमें कि राजा की हुस्न नीयत श्लोक संख्या १३ में 'धत्तां' का 'दत्ता', 'दृप्ता' की बदौलत लगाते ही फल निकल आये । माह तथा 'नाना वर्ण' का 'नानार्णव' पाठभेद मिलता है । भादों में इस कदर बर्फबारी हुई कि फसलें सारी पादटिप्पणियाँ : की सारी तबाह व बरबाद हो गयीं । सख्त क़हत पड़ा । राजा ने अपने खजाने के मुँह खोल दिये । १३ (१) वर्ण : यहाँ 'वर्ण' शब्द श्लिष्ट है । और उनमें जिस कदर भी हीरे जवाहिरात और बह्वण वर्ण का अर्थ अनेक जातियों से पूर्ण कश्मीर सोना चाँदी थे गरीबों और मसकीनों की नज़र कर मण्डल तथा अनेक रंगों अर्थात् वर्णों से युक्त इन्द्र- दी लेकिन इस के बावजूद भी कहत दूर न हुआ । धनुष किया है । 'नेकखसलत राजा यह देखकर सख्त लाचार (२) शतह्रद-इस शब्द को विल्सन ने नदी हुआ और अपने आप को कत्ल करने पर आमादह समझा है तथा पादटिप्पणी में 'शतह्रद' को शतलज हो गया । उसको रानी इस मक़सद से आगाह हो नदी माना है । यह अर्थ गलत है । (पृष्ठ २९) गयी और उसने उसे ऐसा करने से रोका । रात के वक्त दोनों मियाँ बीबी बारगाह रब थाला हज़रत (३) पयोवहा-इसको भी विल्सन ने नदी में आजिजी और इन्कसारी में मसरूफ हुए । उनकी माना है । पादटिप्पणी में पयोवहा को व्यास नदी दुआ की कबूलियत के निशान में दो कबूतर हर सुबह समझाने का प्रयास किया है । यह अर्थ भी गलत आसमान से हरेक आदमी के घर पहुँचते । यहाँ तक है । (पृष्ठ २९) यह अर्थ स्वरसाम्यता के कारण कि क़हत की मुसीबत रफ़ा दफ़ा हो गयी । लगाने का प्रयास किया गया है ।