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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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उद्गम मैं शिशु था। शिशुओं के साथ सड़कों पर दौड़ता था। खेलता था। सफेद घोड़ों की जोड़ी आती। 'राजा राजा' कोलाहल होता। हम रुक जाते। देखते—राजा। लोग कह उठते— जम्बू के राजा, काश्मीर के राजा। श्वेत पगड़ी। नाटा कद। कुछ कम गोरा रंग। किन्तु मर्यादा की झलक। स्वाभिमान की कान्ति। स्थिर चित्तवृत्ति। वे अनायास आकर्षित करते—लोगों को। काशी निवासियों के कर बद्ध होते। मस्तक नत होते। गाड़ी को मार्ग देते। पीछे हट जाते। राजा हाथ उठाकर, मुस्कराकर, अभिवादन का उत्तर देते। लोग होते सन्तुष्ट। हमें लगता आश्चर्य। उनके सामने बैठते—सुन्दर-गौरवर्ण, श्वेत पगड़ी धारी, दो सज्जन। उनमें एक के कानों में होती, स्वर्ण तरकी। दोनों के भ्रू मध्य लगा रहता केसर चन्दन का तिलक। काशी में जहाँ लोगों का रंग गेहुआ और साँवला होता है उनके सर्वाङ्ग गौरवर्ण को देखकर आश्चर्य होता। प्रायः यह घटना प्रति वर्ष होती। यह बात लगभग ५८ वर्ष पुरानी होगी। हम बढ़ते गये। राजा की उमर ढलती गयी। बिलासपुर के राजा भी उन दिनो काशी आते थे। उनका विलास भवन मामूरगंज वाराणसी में अब भी है। यह बाग नेपाली कोठी के पूरब-उत्तर ओर है। नेपाल के राजा लोग, राणाओं द्वारा नेपाल से निर्वासित होने पर, यही जीवन व्यतीत किये थे। नेपाली कोठी के पश्चिम ओर सड़क के पार नेपाल की रानी लक्ष्मी देवी का बगीचा है। वहीं वे जीवन व्यतीत की थी। नेपाल की राज्य क्रान्ति के पूर्व, नेपाल के राजा, राणाओं के एक प्रकार से बन्दी थे। काशी नेपाल के राजा तथा राणाओं दोनो को प्रिय थी। बिलासपुर राजा के पास गाड़ी और घोड़ा जोड़ी थी। उनके बगीचा से सटा पूर्व ओर अस्तबल था। उन दिनों मोटरों का दर्शन दुर्लभ था। बिलासपुर के राजा का भी नाटा कद था। ये प्रतिदिन गङ्गा स्नान करते थे। वे मेरे बैठका के सम्मुख दशाश्वमेघ घाट पर आते थे। उनकी वेश-भूषा काशिराज से भिन्न थी। जिनको राजसी ठाट में देखने के हम आदी थे। महाराज काश्मीर का स्वर्गीय आनरेबुल सर राजा मोतीचन्द्र से बहुत स्नेह था। मेरे पिता के मामा स्वर्गीय ठाकुर विश्वनाथ सिंह उनके यहाँ कार्य करते थे। उनका परिचय राजा साहब के माध्यम से स्वर्गीय काश्मीरराज प्रताप सिंह से हो गया था। श्री प्रताप सिंह को एक पुत्र हुआ था। वह असमय में ही काल कवलित हो गया। वे पुत्र के इच्छुक थे। काशी के पण्डितों ने उनकी इस स्थिति से लाभ उठाया। उन्हें विश्वास दिलाया—पूजापाठ, दान पुण्य से सब कुछ हो सकता है। महाराज उनकी बातो में आ गये। यह काम गुप्त ढंग से करना था। राज्य में यह समाचार न फैले। इसकी विशेष सतर्कता रखी गयी। हमारे मामा के द्वारा पूजा पाठ आदि का प्रबन्ध हो जाता था।