राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५ ) दशाश्वमेध घाट, मेरे मकान और जम्मू हाउस के बीच एक फर्लाङ्ग का फासला था । अपने खानदानी मकान ओरङ्गावाद से दशाश्वमेध रोज जाया करता था । जम्मू हाउस की भवन रचना हमें आकर्षित करती थी । जम्मू हाउस के दक्षिण तरफ दशाश्वमेध की सड़क और उत्तर टेढ़ी नीम की गली थी । मैं बाल्यावस्था में अपनी मामी के साथ गंगा स्नान करने जाता था । जिस दिन गली में भिखमंगों का विशाल जन समूह एकत्रित रहता, हम समझ जाते थे । महाराज काश्मीर आ गये थे । मेरा कुटुम्ब प्रारम्भ से ही अंग्रेजों का द्रोही रहा है । मेरे पिता के दूसरे मामा स्वर्गीय श्री बैजनाथ सिंह काग्रेस स्थापना के दो वर्ष पश्चात् काग्रेस में सम्मिलित हुए । वे भंग भंग तथा स्वदेशी आन्दोलन में जेल यात्रा कर चुके थे । हमारे जन्म के पूर्व दो बार आन्दोलन में कारागार की सजा भुगत चुके थे । कलकत्ता उनका कार्य क्षेत्र था । यही कार्य करते थे । कवि थे । कविता करते थे । पुरानी शैली के थे । कविता लिखकर फाड़ देते थे । कभी कविता उन्होंने प्रकाशित करने का प्रयास नहीं किया । काश्मीर के राजा थे । उनकी सेना थी । उनका राज्य था । उस समय यह बातें स्वा- धीनता आन्दोलन काल में बहुत भली लगती थीं । भारत के मानचित्र पर काश्मीर, राजस्थान तथा अन्य भारतीय रियासतों का पीला रंग देखता तो मन में उत्साह उत्पन्न होता । काशी एवं काश्मीर का नाम समध्वनि होने के कारण रुचता था । दोनों राजाओ को देखकर मन प्रसन्न होता था । भारत की पुरानी स्मृति स्मरण हो आती थी । काशिराज प्रभुनारायण सिंह जी संस्कृत के उद्भट विद्वानो में थे । काशी के विद्वानों में उनकी गणना की जाती थी । संस्कृत के उच्च कोटि के लेखक थे । एक समय काशी विश्वविद्यालय के स्व० उप- कुलपति एवं गुजराती के प्रसिद्ध लेखक श्री आनन्द शंकर बापूभाई ध्रुव उनके यहाँ गये । ध्रुव जी संस्कृत के विद्वान् थे । उन्होने अकस्मात् कुछ पृष्ठ लिखित देखे । उठाकर पढ़ा । उन्हे आश्चर्य हुआ । ये नाटक के कुछ पृष्ठ थे । पद, अलंकार, उपमा आदि समन्वित थे । काव्य रचना कालिदास से कम नहीं थी । पद सरस थे, मधुर थे । ओजपूर्ण शैली थी । पुरानी शैली में मौलिक नूतनता थी । ध्रुव जी ने कहा—'महाराज आप इसे छपाते क्यों नहीं ?' उन्होंने हँस कर कहा—'यह मेरा काम नहीं है । ब्राह्मणों का काम है ।' और सब पृष्ठ फाड़ दिया । राजागण उस समय परम्परा का पालन करने में गौरव का अनुभव करते थे । महाराज काश्मीर गंगा स्नान करते थे । हमारे बैठका के ठीक सामने । दशाश्वमेध घाट पर । वे कभी- कभी दशाश्वमेध घाट से पंचगंगा घाट नाव से जाते थे । उनके सरल स्वभाव की सब प्रशंसा करते थे । साधारण जनता के साथ घाटो पर स्नान करते थे । जबकि छोटे-छोटे राजा आते थे तो अपने मिथ्या अभिमान के कारण अलग प्रबन्ध कराते थे । काश्मीरराज अपनी सरलता एवं नम्रता के कारण काशी में लोकप्रिय थे । मैं हिन्दू स्कूल का विद्यार्थी था । हिन्दू स्कूल में काशीनरेश हाल है । भव्य भवन रचना है । उसके ऊपर काश्मीर नरेश श्री रणबीर सिंह के नाम पर संस्कृत पाठशाला थी । संस्कृत पाठशाला के अध्यापक खूब बड़ी पगड़ी बाँधते थे । उस समय उधर आबादी नही थी । पंडित