भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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लोग शहर से तर्क वितर्क करते चलते थे । हम लोग यहाँ के विद्यार्थियों की फहराती लम्बी शिखा और पीली धोती देख कर कभी-कभी उनका मजाक उड़ाते थे—'काश्मीर से केसर आई है । उसी से रंग कर धोती पहने हैं ।' सन् १९२१ में असहयोग आन्दोलन आरम्भ हो गया। मैने स्कूलत्याग दिया । आन्दोलन में भाग लिया । उस समय मेरी ११ वर्ष की अवस्था थी । मेरी सजा और फैसला तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट श्री खरे घाट आई. सी. एस. ने किया था । वे कालान्तर में काश्मीर में किसी उच्च पद पर चले गये थे । सन् १९२१ में ही श्री विश्वनाथ सिंह को दो गोलियाँ लगी । उन्होंने मारने वालों से बन्दूक छीन ली । राजा विलासपुर की कोठी समीप ही थी । वे फाटक कूद कर डाक गये । उन्हें खून से लथपथ देखकर विलासपुर राजा के स्थानीय दीवान तत्काल मर गये । मेरे कुटुम्ब में सभी लोग राजनीतिक आन्दोलन में जेलयात्रा कर चुके थे । श्री बैजनाथ सिंह छः बार और श्री विश्वनाथ सिंह तीन बार । श्री मूडी आइ. सी. एस. जो कालान्तर में भारत के होम मेम्बर और पंजाब के गवर्नर थे उन दिनों काशी में ज्वाइन्ट मजिस्ट्रेट थे । उन्होंने फैसला सुनाया । विश्वनाथ सिंह तिलक स्वराज्य फंड का रुपया एकत्रित कर रहे थे, डाकुओं ने उन पर हमला किया और उल्टे उन्हीं के ऊपर दूसरा मुकदमा चला दिया । यह मुकदमा श्री दयाल, जो कालान्तर में इलाहाबाद के जज तथा काश्मीर के चीफ जस्टिस हो गये थे, इजलास में चला । श्री विश्वनाथ सिंह छूट गये । सन् १९३० में उन्हें नमक सत्याग्रह में अढ़ाई वर्ष का जेल हुआ । उनका स्वास्थ्य ढलता गया और सन् १९४४ में उनकी मृत्यु हो गई । इस प्रकार काश्मीर किसी न किसी प्रकार अपनी स्मृति मुझमें हरी रखता था । मैं आन्दोलन में पड़ गया । फिर भी जब कभी काश्मीर के राजा आते तो मैं उन्हें अवश्य देखता । बहुत सी बातें याद आती है । अखबारों में काश्मीर का समाचार रुचि से पढ़ता । मेरे घर में काश्मीरराज ने जो पत्र श्री विश्वनाथ सिंह को लिखे थे उनकी एक पूरी फाइल थी । सैकड़ों पत्र थे । हिन्दी नागरी में लिखे थे, मैं कभी-कभी उनको पढ़ता था। मैं उस ओर से उदासीन था । मेरे निवास स्थान की तलाशी राजनैतिक कार्यकर्त्ता होने के कारण वर्ष में दो तीन बार होती थी । उन पत्रों में राजा सर मोतीचन्द के नाम लिखे पत्र थे । उन्हें बाँधकर रख दिया था । एक बार तलाशी आई । मैं घर पर नही था । अचानक तलाशी हुई । गंगा जी खूब बढ़ी थी। मेरे बैठके की पहली मंजिल तक पानी आ गया था। हल्ला हुआ—पुलिस आई। नौकर ने कागजों का बंडल तीसरी मंजिल से धारा में फेंक दिया । उनमें वे पत्र भी समाप्त हो गये । उस समय तक श्री प्रताप सिंह तथा राजा सर मोतीचन्द का देहान्त हो चुका था । मैने वकालत शुरू की। मेरे साथ श्री राजेशदत्त पाण्डेय तथा चतुर्भुज दास पारिख, जज हाईकोर्ट इलाहाबाद, कार्य करते थे। हम लोग फौजदारी के वकील थे। एक साथ सभी मुकदमे में काम करते थे। राजेशदत्त पाण्डेय के पिता रमेशदत्त पाण्डेय महाराजा काश्मीर के यहाँ तीस वर्षों तक उच्च पदों पर कार्य किये थे। स्वर्गीय डॉ० श्रीमती एनिवेसन्ट ने रमेशदत्त जी को राजा के आग्रह पर भेजा था। उनकी श्रीनगर में पाण्डेय बिल्डिंग थी। राजेशदत्त जी का काश्मीर में ही अध्ययन हुआ था।