भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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( ७ ) सन् १९४० से मुस्लिम लीग का आन्दोलन प्रबल होता गया। स्व० जिन्ना साहब काश्मीर पहुँचने लगे । भविष्य ठीक न देखकर उन्होंने अपनी श्रीनगर की इमारत बेच दी। श्री राजेश दत्त जी के साथ प्रायः काश्मीर सम्बन्धी बातें हुआ करती थीं । मैं सन् १९५२ में संसद् में आया । श्री पंडित जवाहर लाल से पूर्व परिचय था । सन् १९२१ में आनन्द भवन से साइक्लोस्टाइल से इनडिपेन्डेन्ट अखबार निकलता था । वह पहले छप कर निकलता था। अंग्रेजी सरकार ने उसे सन् १९२२ में बन्द करा दिया था। मैं उसकी एक प्रति इलाहाबाद से काशी लाता था। उसी के आधार पर पुनः साइक्लोस्टाइल करके बेचा जाता था। किसी भी काश्मीरी कुटुम्ब में प्रवेश का यह मेरा पहला अवसर था। संसद् में काश्मीर स्टेट्स ग्रुप संसद् सदस्यों का बना। मैं उसका संयोजक सन् १९५४ से १९६३ तक था। इस समय के नेताओं तथा काश्मीर के लोगों से निकट सम्बन्ध हो गया। मैं चार बार संसद् सदस्यों का स्टडी ग्रुप लेकर काश्मीर गया। काश्मीर भ्रमण किया। बाल्यावस्था में स्वर्गीय विश्वनाथ सिंह कहा करते थे जाना हो तो काश्मीर जाओ। मैं अध्ययन काल में गर्मियों की छुट्टी में दार्जिलिंग, नैनीताल, मंसूरी और शिमला जाया करता था। किन्तु काश्मीर का अपना ही स्थान है। वह सचमुच नन्दन कानन है। सन् १९६० में प्रथम बार विचार उठा कि काश्मीर की राजतरंगिणियों के मूल संस्कृत का हिन्दी में अनुवाद करूँ। श्री स्टीन के राजतरंगिणियों से मुझे विशेष प्रेरणा मिली। सन् १९६७ का संसद् चुनाव हार जाने के कारण खाली था। अतएव इस कार्य में हाथ लगाया । इस समय मेरे एक मात्र सहायक एवं मित्र श्री पशुपतिप्रसाद द्विवेदी ही थे । सर्व श्री लल्लनजी गोपाल काशी हिन्दूविश्वविद्यालय, उपेन्द्र ठाकुर मगध विश्वविद्यालय तथा कृष्णदत्त वाजपेयी सागर विश्वविद्यालय ने राजतरङ्गिणी सम्बन्धी अनेक सुझाव दिये हैं, उसके लिये मैं उनका आभारी हूँ । यह पुस्तक मैंने स्व० श्री जवाहरलाल नेहरू तथा उनकी पुत्री श्रीमती इन्दिरागांधी को भेंट की है। उनका सम्पर्क मेरे परिवार से रहा है। काश्मीर को इस बात का गर्व होना चाहिए कि यदि उसने मेघवाहन, ललितादित्य, प्रवरसेन, जयापीड़, अवन्तिवर्मा जैसे महान् व्यक्तियों को उत्पन्न कर काश्मीर का मुख उज्ज्वल किया है तो उसी प्रकार स्व० पंडित मोती- लाल एवं श्री जवाहरलाल ने भारत का जीवन स्तर उठाने का कम प्रयास नहीं किया । काश्मीर की महिलाएँ यशोवती, सुगन्धा, दिद्दा केवल काश्मीर की शासिका थीं। किन्तु श्रीमती इन्दिरा गांधी को समस्त भारतवर्ष का शासन करने का गौरव प्राप्त हुआ है। निःसन्देह मेघवाहन ललितादित्य ने दिग्विजय किया था। परन्तु मोतीलाल ने सर्व- त्याग किया। पंडित जवाहरलाल ने महात्मा गांधी के आशीर्वाद के साथ भारतीय आजादी प्राप्त कर एक पराधीन देश को स्वाधीन बनाया है। पंडित मोतीलाल जी सेन्ट्रल एसेम्बली ( वर्तमान लोकसभा ) के नेता थे। पंडित जवाहरलाल भी उसके नेता थे । श्रीमती इन्दिरा गांधी भी उसकी नेता हैं। विश्व के किसी भी संसद् को यह गौरव नहीं प्राप्त है कि तीन पीढ़ियों तक एक ही कुटुम्ब के लोग एक के बाद दूसरे नेता होते गये हों। काश्मीर के दिग्-