भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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द्वितीय तरंग १३७ का पाठभेद ‘चम्बूको’ और ‘चर्मंको’ मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १६( १ ) द्वैपायन : व्यास पाराशर्य का नाम द्वैपायन है । इनका जन्म यमुनाद्वीप में हुआ था । अतएव नाम ‘द्वैपायन’ पड़ा था । (म० आ० ५४:२) इनकी माता का नाम काली था । अस्तु नाम ‘कृष्ण द्वैपायन’ भी रखा गया था । भागवत पुराण में उल्लेख आता है । वह स्वयं कृष्ण वर्ण थे । वर्ण के कारण नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ गया था । वैशाख पूर्णिमा इनका जन्म दिन है । आषाढ़ पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा मनायी जाती है । व्यास ने वेदों की पुनर्रचना की थी । इसलिए उन्हें वेदव्यास कहा जाता है । ‘विव्यास वेदान् यस्मात्स तस्माद्व्यास इति स्मृतः।’ ( म० आ० ३७ : ७३ । ) वायु पुराण में इन्हें ‘पुराण प्रवक्ता’ कहा गया है ( वायु ६० : ११-२१; विष्णु धर्म : १७४ ) अत्यन्त कठोर तपस्या करने के कारण अनेकानेक सिद्धियाँ प्राप्त किये थे। इन्होंने दूरश्रवण, दूर दर्शन अनेक विद्याओं में प्रवीणता प्राप्त की थी । ( म० आ० : ३७:१६ । ) कौरव पाण्डवों के पितामह थे । उनके महान् हितचिन्तक रूप में उनका चरित्र चित्रण किया गया है । जनमेजय के यज्ञ मण्डप में सर्प यज्ञ के समय उपस्थित थे । वैशम्पायन ने अपने शिष्य को स्वरचित महाभारत सुनाने का आदेश दिया था । ( म० आ० ५४ ) पाण्डवों के वनवास काल में युधिष्ठिर को ‘प्रतिस्मृति विद्या’ का उपदेश दिया था । ( म० व० ३७:२७-३० ) संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी । संजय महाभारत युद्ध का आँखों देखा वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाते थे । ( म० भी० २:९ ) संजय की दिव्य दृष्टि युद्ध के पश्चात् नष्ट हो गयी थी । (म० सौ० : ९:५८) घृताची अप्सरा से इनको शुक नामक पुत्र प्राप्त हुआ था । ( म. आ. ५७:७४ ) किन्तु स्कन्द पुराण में शुक को जाबालि ऋषि की कन्या वटिका से उत्पन्न कहा गया है । ( स्कन्द : ६८ : १४७-१४८ ) द्वैपायन चिरंजीवी हैं। वेदरक्षणार्थ उसका विभाजन किये थे । पौराणिक साहित्य तथा महाभारत का निर्माण किया था । (वायु०६०:१-१६) वेद की चार स्वतंत्र संहिताओं को बनाया था । ततः स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदमकल्पयत् । ( वायु० ६०:१९ ब्रह्माण्ड० ३:३४:१९) व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है । ऋग्वेद की शिष्य परम्परा मे, पैल, वाष्कल ( इन्द्रप्रमति ) बोध्य, याज्ञवल्क्य, पराशर, माण्डूकेय; सत्यश्रवस्, सत्यहित, सत्यश्री, शाकल्य, बाष्कलि, शाकपूर्ण, पन्नगारि, शैशिरेय, वत्स, तथा शत बलाक हैं । ऋग् वेद की २१ शाखाएँ हैं । उनमे केवल शाकल, वाष्कल एवं सांख्यायन की संहिताएँ उपलब्ध हैं । शेष दो जिनका निर्देश प्राप्त है आश्वलायन एवं मण्डूकायन है । आश्वलायन एवं सांख्य़ायन शाखाओं के प्रवर्तक कौन आचार्य थे कहना कठिन है । व्यास की यजुर्वेद की वैदिक शिष्य परम्परा में, वैशंपायन, याज्ञवल्क्य, ब्रह्मणति, तित्तिरी, माध्यंदिन, काण्व, श्यामाययाति, आसुरि एवं अलिम्प हैं । कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखाम्रो में तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ एव कापिष्ठल की संहिताएँ प्राप्त हैं । शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाएँ हैं । उनमे केवल काण्व एवं माध्यंदिन उपलब्ध हैं । सामवेद की वैदिक शिष्य परम्परा में, जैमिनि, सुमन्तु—जैमिनि, सुत्वन—जैमिनि, सुकर्मन्—जैमिनि, पौष्पिण्ड्य, लोगाक्षि, कुथुमि, कुनितिन्, लांगलि, राणायनीय, तण्डिपुत्र, पराशर, भागवित्ति, लोम- गायनी, पाराशर्य, प्राचीन योग, आसुरायण, तथा पतंजलि हैं । सामवेद की १०० शाखाएँ हैं । उनमें केवल कौथुम तथा राणायनीय संहिताएँ प्राप्त हैं । अथर्व वेद की शिष्य परम्परा में सुमन्त, कबंध, पथ्य, देवादर्श, पिप्पलाद, जाजलि—शौनक, सैन्ध-