राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ राजतरंगिणी तयोः प्रभावमाहात्म्यजिज्ञासार्थमिवोद्यता । भयंकर अकाल १ प्रजासु दुस्सहा जातु व्यापद्वैवी व्यजृम्भत ॥१७॥ १७. कदाचित् उन दोनों का प्रभाव माहात्म्य जानने के लिये ही मानो प्रजाओं में दुस्सह दैवी आपत्ति भयंकर रूप से प्रकट हुई ।
वायन, बभ्रु, और मंजुकेश हैं। अथर्ववेद की २ शाखाएं हैं। उनमें दोनों पिप्पलाद तथा शौनक प्राप्त हैं। समस्त पुराणों की श्लोक संख्या ४,२५,००० है। उनमें १० पुराण अपूर्ण हैं। केवल ८ पूर्ण हैं। नृसिंह, भागवत, वायु एवं शिव पुराण को महापुराण नहीं माना जाता। इन पुराणों में अग्नि पुराण के देवता अग्नि हैं। गुण तामस है। स्थल नैमिषारण्य है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के देवता सूर्य हैं। गुण राजस हैं। स्थान नैमिषारण्य है। पद्मपुराण के देवता ब्रह्मान हैं। गुण सात्त्विक है। स्थान नैमिषारण्य है। पाच पुराणों के देवता विष्णु हैं। गुण सात्विक है। उनमे गरुड़ एवं नारद का स्थान नैमिषारण्य, नृसिंह का स्थान प्रयाग, भागवत का स्थान सहस्र वार्षिक सत्र, और विष्णु का स्थान दृषद्वतीतीर दीर्घसत्र है। शेष पुराणों के देवता शिव हैं। उनमें वराह और कूर्म सात्त्विक है। मार्कण्डेय, लिंग, ब्रह्माण्ड, भविष्य, तथा वामन राजसिक है। स्कन्द, मत्स्य, तथा शिव तामसिक हैं। वायु पुराण का क्या प्रधान गुण है। निश्चित नही किया जा सकता। कूर्म, लिंग, स्कन्द, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य का स्थान नैमिषारण्य है। भविष्य का शतानीक नृप सभा, वराह का पृथ्वी और शिव का स्थान प्रयाग है। मारकण्डेय, वायु का स्थान निश्चित नहीं हैं। व्यास का जीवन संदेश था। चतुर्विध पुरुषार्थों में केवल धर्माचरण द्वारा ही अर्थ कामादि पुरुषार्थ प्राप्य हो सकते हैं। केवल धर्म ही शाश्वत है। चिरंतन है। नित्य है। शेष सुखोपभोग एवं पुरुषार्थ अनित्य हैं। वे कितना मार्मिक वचन कहते हैं :— ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति माम् । धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥ (म० स्व० २२४९)
'मैं हाथ उठाकर समस्त विश्व से कहता आ रहा हूँ कि अर्थ एवं काम से भी अधिक धर्म महत्व पूर्ण है। किन्तु कोई भी मनुष्य मेरे इस कथन की ओर ध्यान नहीं देता है।' द्रष्टव्य है पृष्ठ १८३ पादटिप्पणी-व्यास। (२) चन्द्रक : सुभाषितावलो में चन्द्रक चन्द्रगोपी नाम से सम्बोधित किया गया है। पाश्चात्य लेखक साइलवियन लेवी का मत है कि चीनी पर्यटक इत्सिंग द्वारा उल्लिखित चन्द्र ही चन्द्रक कवि हैं। तिब्बती भाषा में एक नाटक मिला है। उसमें चन्द्र- गोपिन का वर्णन है। महाकवि कल्हण ने उसकी तुलना महाभारतकार से की है। सुभाषितावली में उसके पद प्राप्त होते हैं। प्रसीदे चेतस्य प्रकटय मुदं सन्त्यज रुषम् प्रिये क्षुव्यन्त्यङ्गान्यमृतमिव ते सिञ्चतु वचः। निधानं सौख्यानां क्षणमभिमुखं स्थापय मुखं न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः॥ ॥ १६२९ ॥ एषा हि मे रणगतस्य दृढा प्रतिज्ञा द्रक्ष्यन्ति यन्न रिपवो जघनं हयानाम्। युद्धेषु भाग्यचपलेषु न मे प्रतिज्ञा दैवं यदिच्छति जयं च पराजयं च ॥२२०५ ॥ पाठभेद : श्लोक संख्या १७ में 'दैवी' का पाठभेद 'देवी' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १७ (१) अकाल : कल्हण ने कश्मीर के अनेक अकालों का वर्णन किया है। सम्राट् अकबर के समय में भी भीषण अकाल पड़ा था। कल्हण ने अपने काल के समीप पड़ने वाले अकालों का अर्थ भी दिया है। अकबर के समय कश्मीर में पर्यटन करने